सुबह-सुबह,
जब सब शुरू कर रहे थे...
अपने-अपने काम!!
वो भी उठा..
और लग गया
अपने काम में...
वो भागने लगा...और,,
तेज़ी से भागता रहा!!
कभी आँगन में,
दौड़ती धूप के पीछे!!
कभी खिड़की पे फुदकती,
चिड़िया के पीछे!!
कभी, खेत में नाचती,
लहराती, सरसों को पकड़ने!!
कभी, गुनगुनाती,
बलखाती, नदी को जकड़ने!!
कभी,
गरजते, घुमड़ते बादल को थामने!!
या, इंद्रधनुष पर कोई डोरी बांधने!!
कभी,
क्षितिज की दूरी नापने! या,
अनगिन तारों की संख्या भाँपने!!
कभी,
चमकते, चढ़ते चाँद को रोकने!! या,
जल्दी में चलती रात को टोकने!!
कभी, इतनी जल्द आ-जाने पर,
सूरज को डाँटने!
कभी,
सुबह उगी, ताज़ी-ताज़ी किरणें, छाँटने!
या,
बिखरी रोशनी में अपना हिस्सा बाँटने!!
वो भागता रहा, पर नाकाम रहा!
हर कोशिश का हार ही अंजाम रहा!!
सफ़लता, जब उसके हाथ न आई,
दुखी हो, इस छलावे से,
उसने ये तरकीब लगाई,
योजना बनाई!!
लेने इस पराजय का प्रतिशोध,
कलम उठाई,
कागज़ पर शब्दों की, सेना बनाई!!
और इन ख़यालों पर कर दी चढ़ाई!!
छंद, बंध के व्यूह में आख़िर,
ये ख़्याल उलझ गए।
जाल में कविता के आख़िर, फँस गए,
सदा-सदा के लिए, डायरी में बस गए।
इस तरह, उदासी का वो पल बीत गया,
कल्पना हार गई ,रचनाकार जीत गया।
- अंशुल तिवारी।
23.12.18
हरिद्वार।
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