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Tuesday, 22 January 2019

शौर्यगाथा: प्रार्थना।

।।प्रार्थना।।

मैं हाथ जोड़कर विनय करूँ, ये नमन मेरा स्वीकार करो।
हे देव! बुद्धि, विद्या, बल के, मेरे ऊपर उपकार करो।।
जो करूँ निवेदन चरणों में, हे दयानिधे! स्वीकार करो।
मेरे लघु तेज, आत्मबल का, हे नारायण! विस्तार करो।।

अपनी बातों को काव्य रूप में, सहज, सबल हो कह पाऊँ।
मैं कविता की निर्मल गंगा के, साथ-साथ ही बह पाऊँ।।
इस गहरे काव्य महासागर में, गोता सफल लगा पाऊँ।
अपने प्रयास से, उत्तम कविता का दुर्लभ मोती पाऊँ।।

कविता से प्रार्थना:

जैसे रण में जाने से पहले, वीर पुरुष यह करते हैं।
वे अपने अस्त्र, शस्त्र सब ही का, पूजन सादर करते हैं।।
वे रण से पहले देव प्रार्थना में निज शीष झुकाते हैं।
रण में भी अपना धर्म निबाहें बात यही दोहराते हैं।।

बस उसी तरह मैं नमन, निवेदन कविता तुमसे करता हूँ।
तुम साथ सदा देना मेरा, बस यही विनय मैं करता हूँ।।
मैं छंद, बन्ध, दोहे, चौपाई, सबको सिर पर धरता हूँ।
देना मुझको सह्हाय प्रार्थना इतनी तुमसे करता हूँ।।

हे कलम! सदा हो साथी तुम, मेरे लेखन के तुम प्रमाण।
मैं लेकर संग तुम्हारा ही चाहूँ लिखना यह विजयगान।।
तुम अतः, चलो अब साथ-साथ, अपना गर्जन घनघोर करो।
अपनी शैली में मानव हित की बातें चारों ओर करो।। 5 ।।

मेरा इतना ही है प्रयास मैं भी कुछ फूल उठा पाऊँ।
फिर उनको भारत के चरणों में अपने हाथ लुटा पाऊँ।।
मुझको असीस दो हे दाता! शब्दों से ऐसी बात कहूँ।
अपनी माटी की विजय कथा, हर दिवस, तथा हर रात कहूँ।।

ये शब्दाजंलि समर्पित उनको जो, भारत के रखवाले।
जो अमरकीर्ति पानेवाले, थे देशभक्ति के मतवाले।।
अनगिनत सुभीषण काम न जाने कैसे-कैसे कर डाले।
उनके आगे नीचे लगते हैं, पर्वत उच्च शिखर वाले।। 7 ।।

उनकी जयगाथा अजर, अमर, सदियों तक गाई जाएगी।
जब भी होगा गुणगान बहुत भारत माता मुस्काएगी।।
अपने पुत्रों से बार-बार यह धरती गौरव पाएगी।
उनपर अपने दुर्लभ रत्नों को भी वारी जाएगी।।

हम भी उनको सादर मन में कर स्मरण, चढ़ाएं प्रेम पुष्प।
जिनके कारण हम अपने घर में बैठे हैं सुख शांति युक्त।।
जो अपने जीवन को अपनों के हित में करते स्वयं होम।
उनका करने वंदन झुकता है, नत होता है स्वयं व्योम।। 9 ।।

हम भी उनकी जयगाथा को अभिव्यक्त चाहते हैं करना।
अपने मन की अभिलाषा को संतृप्त चाहते हैं करना।। 10 ।।

Monday, 21 January 2019

शौर्यगाथा भाग 02

।।शौर्यगाथा: भाग 02।।

मूल विषय प्रवेश: भारत का बंटवारा।

विस्मय है, है आश्चर्य बड़ा, जो था माता का एक भाग।
जो पहले था यूँ हिला मिला, अब रखता है विद्वेष, आग।।
जिसने होली में खेल रंग, सेवैयाँ ईद में खाई थीं।
रह साथ सदा, खेला, खाया, दीवाली साथ मनाई थी।।

जो एक रंग में रहता था, अब रंग बदलता फिरता है।
जो घात वार करने में भी, अब किञ्चित नहीं मुकरता है।।
पहले की बात अनोखी थी, थे लोग परस्पर स्नेह भरे।
ना कोई भेद, न द्वेष कोई, तृण मात्र नहीं सन्देह भरे।।

सब एक दूसरे को निसदिन, भाई-भाई ही कहते थे।
मिलजुल कर, हँसते-गाते थे, सब साथ मुसीबत सहते थे।।
बँटवारा केवल सुख-दुख का, खुशियों की हिस्सेदारी थी।
जो गिरे उठाना उसको फिर, ये सबकी ज़िम्मेदारी थी।।

चाहे जिसका भी राज चले, जनता एकत्र, एकजुट थी।
मत एक सभी का, लक्ष्य एक, एकता शक्ति के संयुत थी।।
छोटी-मोटी बातों पर यों कुछ अनबन होती रहती थी।
पर पूर्ण चित्र में देखो तो वो न्यून, न्यून से लगती थी।।

फिर जब अंग्रेज़ी शासन को अहसास हुआ इस जनबल का।
अपनी कुनीतियों को मथ कर, पासा फेंक अपने छल का।।
कुछ कपटी, कायर लोगों को ढूँढा, फिर अपने साथ किया।
लालच से उनका घर भर कर, उनको अपने फिर साथ लिया।।

ये लोग विषैले तीर बने, जो प्रेम, स्नेह के बीच धँसे।
अनगिन जन को आखेट बना, अंतर को कुत्सित किये, ग्रसे।।
फिर वैमनस्य का विष काला, लोगों के अंतर में उतरा।
फिर भेद भाव अत्यंत बढ़ा, फिर वैरभाव अत्यंत चढ़ा।

जिसका फल इतना भीषण था, जिसमें थी कितनी पीर बड़ी।
जिससे भाई से भाई लड़े, मानव से मानव जाति लड़ी।।
किसने सोचा था, एक मुल्क, दो हिस्सों में बँट जाएगा।
इंसान छोड़ इंसानों को, ख़ुद दूर खड़ा हो जाएगा।।

इस तरह बँटा भारत टुकड़ों में, कुछ लोगों के कारण ही।
कितनों ने झेला दुख भीषण, इस बंटवारे के कारण ही।।
जो लोग साथ खुश रहते थे, वे दूर हुए ,मजबूर हुए।
पर दया न आई नीचों को, जो सिद्ध परम ही क्रूर हुए।।

अपने मतलब के लिए महज़, माता को काट दिया था यूँ।
भारत को खंडित किया, तथा हिस्सों में बाँट दिया था यूँ।।
अपने लालच की तृप्ति हेतु, अपने जन को ये त्रास दिया।
सुख, समृद्धि, वैभव सारा ही, क्रूर काल का ग्रास किया।।

जड़ से विच्छिन्न हुए नर यों, जैसे पेड़ों से झरें पात।
कितने दुख से बीते होंगे, सन्तप्त मनुज के दिवस रात।।
जो कल तक साथ विचरते थे, आनंद साथ ही करते थे।
जो सभी स्थिति में साथ खड़े, इक-दूजे का कर धरते थे।।

वे आज खड़े हो गए, एक सीमा रेखा के आर-पार।
भारत की अटल एकता पर, छल छंदों का था हुआ वार।।
वे एक दूसरे से जैसे हो गए विलग, अनजान हुए।
जो इसके कारण तथाकथित, वे ही बस वैभवान हुए।।

जन ने झेले कितने अंधड़, झंझा भयावने बड़े सहे।
फिर भी जैसे तैसे सहकर, अपने पैरों पे हुए खड़े।।
जो घाव लगा भारत को था, उसका कोई उपचार न था।
जो रिसता था, दुख देता था, जिसका कोई प्रतिकार न था।।

जब मरहम बनकर वक़्त चला, जब घाव सूखने लगा ज़रा।
जब कष्ट भूलने लगे लोग, कुछ ये देखा नहीं गया।।
वे नहीं चाहते थे जनता, दुख भूले कुछ उन्नति करे।
वे यही चाहते थे भारत के कष्ट बढ़ें, अवनति करे।। 13 ।।

इसलिए छद्म तब रूपों में, नित नए छलों के व्यूह रचे।
जो अन्यायी, आतंकी, नीचों के समूह को बड़े जँचे।।
जब लोगों का सम्बंध तोड़कर भी सुख ,चैन नहीं पाया।
तब आहत करने भारत को ये अस्त्र नया था अपनाया।। 14 ।।

वे भी थे दबे, दबावों में, पर छुप-छुप कर षडयंत्र किए।
अपनी सारी योजना लगाई केंद्रित सारे तंत्र किये।।
उनका ज्यों लक्ष्य यही बस था, सुख, चैन हमारा खो जाए।
ऐसी घटनाएँ हों भारत ना, नींद सुहानी सो पाए।। 15 ।।

भारत की सकल व्यवस्था को वे ध्वस्त चाहते थे करना।
इस आर्यभूमि के रवि पूरा अस्त चाहते थे करना।।
अपना तो जिनको भान नहीं, संसार समझता दीन जिन्हें।
न उनका कोई यश जग में, समझा जाता है हीन जिन्हें।।

जो अपने जन के पालन भी में सदा ही मुँह की खाते हैं।
जो अपनी जनता को कितना ही दीन बनाए जाते हैं।।
ख़ुद ही अपने पैरों पे जो न कभी खड़े हो पाए हैं।
वो क्या भारत को नष्ट करेंगे, सपना खूब सजाए हैं।।

जो बस लेकर ही दान सदा, अपना घर भरते आए हैं।
और सिर्फ़ चाकरी सदा विदेशों की ही करते आए हैं।।
जिनको स्वाभिमान की भाषा कभी समझ में न आई।
जिनके मन पर रही हमेशा द्वेष, द्रोह की परछाईं।।

वो जिनको उपहार के बदले वार ही करना आता है।
धोखे से, चुपके से, जिनको घात ही करना आता है।।
जो सर्वदा सामने आने में रण में कतराते हैं।
जो अपने मुँह मिट्ठू बनकर महावीर कहलाते हैं।।

जो मौके को देख बदल देते हैं अपनी चाल कहो।
कैसे वो सामने लड़ेंगे, होगा फिर क्या हाल कहो।।
मित्र बनाकर मुँह पर मीठी बात बड़ी जो करते हैं।
मन के भीतर मगर ज़हर के प्याले गहरे रखते हैं।।

वो जो अपनी विजय हेतु हर सीमा लाँघ भी सकते हैं।
जो रण में परचम लहराने, शील त्याग भी सकते हैं।।
वो जिनको तो छुरा पीठ में, सिर्फ़ घोंपना आता है।
हार को अपनी औरों के सर सिर्फ़ थोपना आता है।। 21 ।।

गले लगाकर गला काटने का फ़न जिनको आता है।
ज़हर पिलाकर सिंह मारना सदा ही जिनको भाता है।।
हम उनको भी जान सहोदर सदा, साथ देते आए।
सम्बन्धों को अच्छा करने हाथ सदा देते आए।। 22 ।।

वो हैं कुछ ही लोग मगर, वो जनता को बहकाते हैं।
शांति, मयत्री के फूलों को, कुचल, रौंद जो जाते हैं।।
अमन, चमन में अपने आग लगाना जिनको भाता है।
अपने जन को सिर्फ़ दुःख पहुँचाना जिनको आता है।।

जो ये नहीं देख सकते, सब साथ मिलें, सब साथ चलें।
जो ये नहीं देख सकते, बच्चे सुकून में बढ़ें ,पलें।।
जो आने वाली नस्लों में ज़हर सींचना चाहते हैं।
बढ़ते पैर तरक्की के जो सिर्फ़ खींचना चाहते हैं।। 23 ।।

जो जनता की ख़ुशी देखकर, मन ही मन पछताते हैं।
कैसे इसको नष्ट करें इस के षडयन्त्र बनाते हैं।।
वो जन मानस के शव पर चढ़कर, राजा कहलाते हैं।
मानवता की खाल सदा अपने आगे खिंचवाते हैं।। 24 ।।

जो इंसानों को इंसानों जैसा नहीं समझ सकते।
जो अपने सीने इंसानों सा हृदय नहीं रखते।।
जो पत्थर हैं, सदा रक्त से सने हुए, अन्यायी हैं।
मुँह पर कहते जनता को, हम सुनो तुम्हारे भाई हैं।। 25 ।।

अपने निहित स्वार्थ के हित लड़वाते भाई-भाई को।
मन पर उनके  फैलाते अपनी काली परछाईं को।।
वैमनस्य का विष काल जो सदा उगलते रहते हैं।
भड़काने को जनता को जो आग उगलते रहते हैं।।

उनके ही कारण जग में ये व्याप्त दुःख है, पीड़ा है।
समृद्धि का नाश ही करना ,जिनका मौलिक बीड़ा है।।
उन लोगों के कारण ही, जन-जन को त्रास हुआ भारी।
भारत की भी, शांति व्यवस्था का है ह्रास हुआ भारी।। 27 ।।

बनकर काले मेघ नाश के नभ में देखो छाए हैं।
बार-बार भारत में जिन ने आतंकी पहुँचाये हैं।।
उनकी कुत्सित सोच हमेशा यही कोशिशें करते है।
भारत को आहत करने के, नव संकल्प विचरती है।।

कितने बीते दशक मगर, उनका सपना बस सपना है।
चाहे सदियाँ हो जाएँ, उनको पर सिर्फ़ तड़पना है।।
वैरी ये ना भूले, भारत की सभ्यता पुरानी है।
वर्ष सहस्त्रों से चर्चित इसकी तो अमर कहानी है।।

यह देवों की धरा, नाश तो इसका ना हो पाएगा।
जितनी बार लड़ेगा वैरी, सदा ही मुँह की खाएगा।।
भारत नहीं भूमि का टुकड़ा, राष्ट्र पुरुष जीत जगता।
जो अमृत की धारा को है, वेदों से पीता, छकता।। 30 ।।

अतः, कोशिशें उनकी केवल जाएँगी मारी-मारी।
फिर भी वो ये न समझें तो, होगी भूल बड़ी भारी।।
भारत विमल कीर्ति का धारक, सदा विश्व में गुंजित है।
जिसके लोहू में विज्ञान, ज्ञान, बल, सभी तरंगित हैं।। 31 ।।

भारत के वैभव के आगे, स्वर्ग खड़ा सकुचाता है।
हम ये कहते नहीं, समय इसका वृत्तांत सुनाता है।।
पुण्यभरी इस धरती से टकराना भूल बड़ी भारी।
जो इस संकल्प करे, कर ले वो अपनी तैयारी।।

हमको रिपुओं को भी हरदम पार लगाना आता है।
उनको भी परलोक धाम पहुँचाना हमको आता है।। 32 ।।

Tuesday, 15 January 2019

शौर्यगाथा भाग 01

।।शौर्यगाथा: भाग 01।।

प्रस्तावना:

तुम याद रखो, दो ध्यान यहाँ जो बात बताई जाती है।
भीषण, दुर्दम रण की गाथा ये यहाँ सुनाई जाती है।।
जब तोड़ भरोसा छल करके रिपुओं ने व्यूह रचाया था।
कुछ शेरों को गीदड़ समूह ने, कष्ट बड़ा पहुँचाया था।।

धोखे से पाकर जीत बड़े ही सुख में वो हर्षाए थे।
पर फल इसका क्या होगा, इतनी बात समझ न पाए थे।।
शेरों का जब धीरज डोला, जब सहन नहीं ये वार हुआ।
उत्तर देने इसका तब, भीषण, घोर बड़ा प्रतिकार हुआ।।

कर घोर नाद आकाश फटा, बरखा-सी बरसीं गोली थी।
जब गोले, बम, बारूद चले, रण में बंदूकें बोली थीं।।
घनघोर महारण में अमृतपुत्रों ने खेली होली थी।
जब अरिदल को दलने आई, कुछ दीवानों की टोली थी।।

भूमिका: भारत भूमि का गौरव।

यह बात विदित सारे जग में, हैं विनयशील भारतवासी।
हम शांति, प्रेम के परिचायक, हैं सहनशक्ति के विश्वासी।।
हम आदि सभ्यता के धारक, संस्कार धर्म के वाहक हैं।
अपने रस्ते चलते हैं हम, न व्यर्थ उलझते नाहक हैं।।

हमको ग्रन्थों ने समझाया, वेदों ने अनुपम ज्ञान दिया।
उपनिषदों ने शिक्षा दी है, दुर्लभ विद्या का दान दिया।।
ऋषियों के हम अनुयायी हैं, सन्तों की सेवा करते हैं।
हम जीव चराचर के भीतर, ईश्वर का दर्शन करते हैं।।

करुणा से सींच हृदय अपना, मित्रता, दया, से भरते हैं।
सबको अपना ही मान-जान, हम प्रेम सभी से करते हैं।।
अपने सौहार्द भाव से हम, जग में पहचाने जाते हैं।
निज स्वर्ण हृदय के कारण ही, जगती में जाने जाते हैं।।

हम पशु-पक्षी, वन, कानन,वट, सबकी ही पूजा करते हैं।
परहित में ही संलग्न सदा, हम काम न दूजा करते हैं।।
नर ही नारायण हैं अपने, आराध्य सदा जन मानस हैं।
जिसमें सबका हित निहित रहे, उस नीति नियम के साधक हैं।।

अपने पहले आगंतुक का हम ध्यान सदा ही धरते हैं।
घर की रोटी सबसे पहले हम उन्हें परोसा करते हैं।।
हम ख़ुद भूखे रह जाएँगे, संस्कार हमारा कहता है।
यदि एक बनी हो रोटी भी, मिलकर के उसको खाएँगे।।

जो घर आया सद्भाव लिए, भगवान हमारा होता है।
अतिथि की सेवा करने से ही मान हमारा होता है।।
ख़ुद धरती पे सोकर भी हम, आसन पर उसे सुलाते हैं।
कोई भी कमी न रह जाए, मन में यह बात मनाते हैं।।

जो प्रेम भरा हो सीस सदा, हम उसको गले लगाते हैं।
जो द्वार खड़ा मनुहार करे, उसको हिय में बैठाते हैं।।
जो कष्ट समय में याद करे, उसमें भागीदारी देंगे।
यदि मांगे हमसे जो सहाय, सर आँखों पे ही ले लेंगे।।

इतिहास पटा है तथ्यों से, ये बात नहीं है मुँहबोली।
अरि के मस्तक पर भी हमने, सबसे पहले दी थी रोली।।
स्वागत अपने ही वैरी का, यह नीति विलक्षण भारत की।
ऐसा औदार्य भरा मन है, ऐसी ही प्रीति है भारत की।।

हमने आघात सहे पहले, अवसर सुधार का सदा दिया।
हम जिये, दिया जीने सबको, यह दिव्य निवेदन सदा किया।।
यदि आँख के बदले आँख गई, दुनिया अंधी हो जाएगी।
यह सुंदर रचना दुनिया है, निश्चित गंदी हो जायेगी।।

जो बने किसी भी कीमत पर, हम शांति बनाए रखते हैं।
संसार लाभ के लिए अतः, हम कालकूट भी चखते हैं।।
हमने जग में आदर्श दिया, सबके हित में मर जाने का।
जो कुछ सम्भव की सीमा है, उस से आगे कर जाने का।।

हमने हैं जग को दिए सदा, रघु, शिवि, दधीचि-से बलिदानी।
कवि वाल्मीकि, कवि कालिदास, उद्भट विद्वान, प्रखर ज्ञानी।।
गुण, ज्ञानवान, संकल्पवान, हम तो कहलाते आए हैं।
अपने कर्मों से सकल विश्व में विमल कीर्ति ये पाए हैं।।

साहित्य, कला, विज्ञान, ध्यान, आध्यात्म, युक्त भारत माटी।
अनगिन वर्षों से स्थापित है, गौरवमय इसकी परिपाटी।।
आयुर्विद्या, शस्त्रादि शास्त्र करतलगत जिनके वीर प्रवर।
कितने कितने अनमोल रत्न, इसने दुनिया को दिए प्रखर।।

सुश्रुत, पतंजलि, चरक, च्यवन, जैसे जीवन रक्षक महान।
आजीवन कर तप कठिन दिया, जिन ने हमको सुस्वास्थ्य दान।।
हमने ही दिए हैं आर्यभट्ट, भास्कर आचार्य, वराहमिहिर।
रामानुज, माधव, ब्रम्हगुप्त, सोम्याजी, पिङ्गल, महावीर।।

ये गणना के अनमोल रत्न, गणितज्ञ, विज्ञ, अद्भुत ज्ञानी।
जिनकी यश की गाथाओं को, जाने यूरोपी, यूनानी।।
पाश्चात्य देश भी जिनकी दुर्लभ रचनाओं से तृप्त हुए।
कर ग्रहण जिन्हें, कर आत्मसात वे उन्नति की सीढियाँ चढ़े।।

यह ज्ञान, ध्यान की बात हुई, अब बल की भी कुछ बात चले।
यह धरा अलौकिक है जिसमें हैं वीर अलौकिक बढ़े, पले।।
अर्जुन, अभिमन्यु, कर्ण आदि सम, जीवन को साकार किया।
कष्टों से तपा-तपा ख़ुद को, अद्भुत बल पे अधिकार किया।।

भारत भू ने हैं दिए अनेकों सुत अपने अति बलिदानी।
जिनके सामर्थ्यों की गाथा, दुनिया भर ने जानी-मानी।।
हैं दर्ज सुनहरे पन्नों में, जिनके यश की अद्भुत गाथा।
इतिहास स्वयं जिनके पद पर, नीचा करता अपना माथा।।

वे छत्रसाल, राणा प्रताप, दक्कन के वीर शिवा राजे।
चहुँ ओर वीरता के जिनकी, थे गूँजे तब गाजे-बाजे।।
चौहान वंश के पृथ्वीराज, स्वर पर जो बाण चलाते थे।
रिपुओं को रण में बार-बार, जो नाकों चने खिलाते थे।।

विक्रमादित्य, पोरस, आल्हा, औ' मौर्यवंश के रवि महान।
वे चन्द्रगुप्त सम्राट अजय, रणजीत सिंह, टीपू सुल्तान।।
ये प्रकट पराक्रम के स्वरूप, साहस जैसे हो मूर्तिमान।
विख्यात सकल जग में जिनके, अद्भुत अलौकिक कीर्तिमान।।

ऐसी अपार क्षमता रखकर भी कभी न हम इतराते हैं।
न व्यर्थ कभी आतंक हेतु, अपनी शक्ति दिखलाते हैं।।
हम सदा क्षमा के धर्मी हैं, मन से उदारता वादी हैं।
जो चरण शरण में आ जाए, उसके रक्षण के आदी हैं।।

इतिहास गवाही देता है, हमने अपना दिल साफ़ किया।
हमने आतंकी गौरी को सत्रहों बार ही माफ़ किया।।
अवतारी नर होकर भी अपने राम तितिक्षा करते हैं।
यदि सागर बिगड़े, अड़े, राम दिन तीन प्रतीक्षा करते हैं।।

हम सदा क्षमा के धर्मी हैं, दुश्मन के दोष भुलाते हैं।
जो चरण शरण में आ जाए, उसको निज हृदय लगाते हैं।।
हमको सिखलाया गया क्षमा वीरों का भूषण होती है।
तलवारों के रक्षण में रक्षित शांति पल्लवित होती है।।

हम केवल स्वाभिमान के हित ही काम सुभीषण करते हैं।
इसलिए विश्व को हतप्रभ कर परमाणु परीक्षण करते हैं।।
ये है विश्वास अटल अपना, वसुधा जैसे परिवार बड़ा।
हम अतः सर्वहित के विचार का करते हैं सत्कार बड़ा।।

हम नहीं कभी अपने बल पर अभिमान प्रदर्शित करते हैं।
हम अपने कर्तव्यों से बस, जन-गण को हर्षित करते हैं।।
हमने सीखा है मानवता ही धर्म विलक्षण होता है।
जिसका रक्षण करने से सबका स्वतः सुरक्षण होता है।

हम शरण आ गए रिपु को भी सम्मान, यथोचित देते हैं।
उसके पुनर्स्थापन हेतु सम्भव सेवाश्रम देते हैं।।
यह इसीलिए कि हम सबमें, नारायण को ही भजते हैं।
हम व्यर्थ ज़रा सी बातों पर, भिड़ने से निश्चित बचते हैं।।

जो याचक बन के आ जाए, धन-धाम निछावर करते हैं।
जो अभिलाषी बन आ जाए, उसकी इच्छा सर धरते हैं।।
हम रण की जगह, विनय के पथ, का चयन सदा ही करते हैं।
हम शांति, प्रेम, सौहार्द, आदि को, नमन सदा ही करते हैं।।

हमने ही दिखलाया जग को, हम सहनशीलता वाले हैं।
फेंके पत्थर जो हमपर भी, हमने वो झेले सारे हैं।।
अपने पड़ोसियों को हम अपने घर का हिस्सा कहते हैं।
यह बात नहीं केवल, बीते युग इसका किस्सा कहते हैं।।

हम सदा पड़ोसी के घर पर त्योहार भेंट पहुंचाते हैं।
जो घर में बने मिठाई उसको बाँट-बाँट कर खाते हैं।।
जो कभी हुई गरमा-गरमी हम, ख़ुद पीछे झुक जाते हैं।
बल से विवाद को जीतें ऐसा करने से रुक जाते हैं।।

हम स्थापित करने सम्बन्धों को, आगे सबसे आते हैं।
गर दुश्मन भी हो देश, तो समझौता एक्सप्रेस चलवाते हैं।।
पर बदले में जो मिला उसे हम कभी भूल न पाएँगे।
कितने दिन तक यूँ क्षमा सर्प को कहो भला कर पाएँगे।।

जब-जब हम झुके बड़े बनकर, तब-तब ही दंश मिला हमको।
अपनी मिठाईयों के बदले ,विष का ही अंश मिला हमको।।
फिर भी हम थामे रहे खड्ग को, नहीं म्यान से काढ़ा है।
पर ये ना भूलो भारत भी रक्त गर्म है, गाढ़ा है।।

हम अगर स्वयं पर आ जाएँ, तो काल खड़ा भय खाएगा।
ऐसा रण होगा भीषण जिसमें नाश सकल हो जाएगा।।
ये मत समझो भारतवासी, केवल तप, भक्ति ही करते हैं।
हम अपनी रक्षा के हित परमाणुओं की शक्ति रखते हैं।।

इसलिए निवेदन करते हैं, जिससे मानवता बनी रहे।
देशों में सभी प्रेम की भीनी बरखा बरसे नमी रहे।।
पर कभी जो उकसाया हमको हम ये तुमको समझाते हैं।
हम केवल राम नहीं भजते, हम महाकाल को ध्याते हैं।।

हम वैसे तो सबकाल सदा शिव की पूजा ही करते हैं।
पर ये ना समझें कोई भी, हम महायुद्ध से डरते हैं।।
जब भी गर पड़े ज़रूरत हम, रुद्रावतार बन जाते हैं।
जो छुपी आग भीतर उसको तीसरे नेत्र में लाते हैं।।

फिर भी हमने कई बार शत्रुओं को हर युग में त्राण दिया।
पैंसठ, इकहत्तर, एकोंशत् , हर समय दान में प्राण दिया।।
पर फिर भी बार-बार, दुर्बुद्धि हमको छलता रहा सदा।
ये नाग विषैला, आस्तीन में रहकर पलता रहा सदा।। 36 ।।

क्रमशः....

Sunday, 13 January 2019

तुम आ जाओ!!

रात गहरी भी हो चली,
है अब,
और, हवा चल रही है,
ज़ोरों की।
सर्द मौसम है,
रास्ते ख़ाली!
है जगा शहर में,
नहीं कोई!
सिर्फ़ मैं, नींद से,
नहीं हारा।
जागता हूँ, ये रात,
काटता हूँ!
Ab, Khyaal

बोझिल-से हुए जाते हैं।
ऊँघकर, पलक भी झपकाते हैं।
ओस!
ख़्वाबों पे जम रही है अब!!
कल सुना है कि,
सुबह फिर होगी!
धूप बनकर ही,
तुम भी आ जाओ।

- अंशुल तिवारी
(13.01.19/हरिद्वार)Lll pp lo aa

Saturday, 12 January 2019

सूरज

हुई सुबह,
वह गली में आया,
अपनी गठरी लेकर!
भटका घर-घर,
कोठी-कोठी, द्वारे-द्वारे,
रहा पुकारे।
घूम चुका जब,
शहर ही सारा,
देखा खाली नहीं है कोई,
सब अटके हैं,
सब लटके है,
अपने-अपने काज काम में,
लगे हुए दिन-रात काम में,
भूले सुध-बुध,
अपनों को भी न पहचानें।
याद नहीं कुछ,
ऐसे हैं मतवाले सारे।
सच में बदल गया है सबकुछ।
सोच-सोच यह,
उल्टे पैरों, चला वो वापस!
अपनी नगरी, गठरी लेकर!
जो लाया था,
रत्न लुटाने जो आया था।
किसको दे वह?
वक़्त किसे है?
मन मसोसकर, सीस झुकाकर,
सूरज लौट गया अपने घर,
नीले-नीले नभ के ऊपर!!

-अंशुल तिवारी।
(हरिद्वार/13.01.19)

Wednesday, 9 January 2019

तुम???

तुम,
तुम ख़ुद को समझते जो,
वो तुम कहाँ हो!
तुम तो और भी कुछ हो!
तुम हमेशा ख़ुद को,
समझते हो 'वो'!
पर तुम,
तुम तो 'वो' भी नहीं हो!
तुम ख़ुद को समझते हो,
'क्या'...???
ये तुम कभी नहीं जानते!
तुम जो असलियत में हो...
वो तुम हो सकते हो!
तुम, तुम नहीं हो...
तुम सम्भावना हो!!
तुम प्रस्तावना हो!!
तुम विश्वास हो!!
तुम प्रयास हो!!
अनुपम निधि हो,
एक नई विधि हो!
तुम कभी अपने पास,
तो बैठो!
अपने कंधे पे,
अपना हाथ रखो!
दो क़दम अपने साथ,
चल देखो!

पाओगे तुम कि,
तुम हो अपने पास!
पाओगे तुम कि,
तुम हो कितने ख़ास!
तुम तुम्हारे लिए,
हो नूतन आस!!

-अंशुल।

Tuesday, 1 January 2019

!! राधिका-कृष्ण रूप माधुरी !!

कौन कहे, कहि जात न जाए, न वर्नन जीभ करै सक सोई।
नाहिं सकैं कवि कोविद लेखि, न वर्तनि की छमता कछु होई।।
सात पयोधि को कीन्ह मसि, सब ब्यर्थ गई, निज भाग पे रोई।
किन्तु न पाए तिलोकहुँ में, छबि कृष्ण की बाँचि सकै अस कोई।।

स्याम मुखाकृति ताल को नीर में, नील सरोरुह सम दुह लोचन।
कुंचित केस, सुतीछन नासिका, भाल पे चन्दन, ताप बिमोचन।।
कानन कुंडल झूल रहैं, गल फूल के माल, सुंगंध  गोरोचन।
अधरन पै मुस्कान सुसीतल, स्याम को रूप सबै मन रोचन।।

पीत पिताम्बर मलमल को, तन सोहत संग सुवर्ण किनारी।
कन्ध धरै पटका मोतियन का, हिए पहिरें मुक्तामणि प्यारी।।
हाथ कड़े नग युक्त बड़े, मुंदरी नवरत्न जड़ी अति भारी।
श्यामल रंग त्रिभंग खड़े, मुरली संग शोभत रास बिहारी।।

नवग्रह, चौदह रत्न, जड़े अस करधनिया पहिरे अति न्यारी।
धोती बसन्त रँगी कस के, तिरछे पग कीन्ह खड़े बनवारी।।
नूपुर सुंदर स्वर्ण विनिर्मित, बाजत छम-छम, छम-छम, प्यारी।
बृजरज से अभिषिक्त किए चरनन, अस सोहत बाँके बिहारी।।

संग बिराजति मोहनी मूरत, भूमि बैकुंठ की जो महारानी।
जो हैं लली वृषभानु की सुंदर, हैं ब्रजधाम की जो ठकुरानी।।
जाको निवास है श्याम हिये, ब्रजराज के चित्त को एक लुभानी।
ठाकुर बाँके बिहारी की प्यारी, जो हैं बरसाने की राधिका रानी।।

श्यामल गौर मनोहर जोरि को देखत, अगणित हैं हिय हारे।
देखि ठगे से गए, सुधि आपनि भूलि गए, जग बोध बिसारे।।
एक ही दृष्टि में मुक्त हुए, सब सोक गए, भए लोग सुखारे।
स्याम-हरी द्युति को अवलोक, हुए अतिमुग्ध न जाए संभारे।।

स्याम सुहावैं घटावन-सों, अरु चन्द्र-सी शोभत राधिका रानी।
स्याम लगें वंशी सम ज्यों, धुन बाँसुरिया की श्री राधिका रानी।।
स्याम लगें जमुना तट-से, जमुना जल जैसी श्री राधिका रानी।
स्याम जु कल्पमणि सम हैं, द्युति ताकि अलौकिक राधिका रानी।।

मंगल मोद प्रदान करै, छबि राधिका-श्याम को जो नित ध्यावै।
प्रेम परस्पर नित्य बढ़ै, सुख सम्पति की बरखा घर आवै।।
कृष्ण कृपा की छटा अनुपम, तिन्ह के ऊपर सब काल सुहावै।
ताहि न दुर्लभ और कछू, जिन राधिकानाथ की कीरति गावै।।

।।इति श्री राधिका-कृष्ण रूप माधुरी।।
।।श्री श्री श्यामश्यामार्पणमस्तु।।
।।श्री बाँके बिहारी विजयते।।

(श्री राधिकावल्लभ प्रेरणोत्पन्नः)

- अंशुल तिवारी।।