।।प्रार्थना।।
मैं हाथ जोड़कर विनय करूँ, ये नमन मेरा स्वीकार करो।
हे देव! बुद्धि, विद्या, बल के, मेरे ऊपर उपकार करो।।
जो करूँ निवेदन चरणों में, हे दयानिधे! स्वीकार करो।
मेरे लघु तेज, आत्मबल का, हे नारायण! विस्तार करो।।
अपनी बातों को काव्य रूप में, सहज, सबल हो कह पाऊँ।
मैं कविता की निर्मल गंगा के, साथ-साथ ही बह पाऊँ।।
इस गहरे काव्य महासागर में, गोता सफल लगा पाऊँ।
अपने प्रयास से, उत्तम कविता का दुर्लभ मोती पाऊँ।।
कविता से प्रार्थना:
जैसे रण में जाने से पहले, वीर पुरुष यह करते हैं।
वे अपने अस्त्र, शस्त्र सब ही का, पूजन सादर करते हैं।।
वे रण से पहले देव प्रार्थना में निज शीष झुकाते हैं।
रण में भी अपना धर्म निबाहें बात यही दोहराते हैं।।
बस उसी तरह मैं नमन, निवेदन कविता तुमसे करता हूँ।
तुम साथ सदा देना मेरा, बस यही विनय मैं करता हूँ।।
मैं छंद, बन्ध, दोहे, चौपाई, सबको सिर पर धरता हूँ।
देना मुझको सह्हाय प्रार्थना इतनी तुमसे करता हूँ।।
हे कलम! सदा हो साथी तुम, मेरे लेखन के तुम प्रमाण।
मैं लेकर संग तुम्हारा ही चाहूँ लिखना यह विजयगान।।
तुम अतः, चलो अब साथ-साथ, अपना गर्जन घनघोर करो।
अपनी शैली में मानव हित की बातें चारों ओर करो।। 5 ।।
मेरा इतना ही है प्रयास मैं भी कुछ फूल उठा पाऊँ।
फिर उनको भारत के चरणों में अपने हाथ लुटा पाऊँ।।
मुझको असीस दो हे दाता! शब्दों से ऐसी बात कहूँ।
अपनी माटी की विजय कथा, हर दिवस, तथा हर रात कहूँ।।
ये शब्दाजंलि समर्पित उनको जो, भारत के रखवाले।
जो अमरकीर्ति पानेवाले, थे देशभक्ति के मतवाले।।
अनगिनत सुभीषण काम न जाने कैसे-कैसे कर डाले।
उनके आगे नीचे लगते हैं, पर्वत उच्च शिखर वाले।। 7 ।।
उनकी जयगाथा अजर, अमर, सदियों तक गाई जाएगी।
जब भी होगा गुणगान बहुत भारत माता मुस्काएगी।।
अपने पुत्रों से बार-बार यह धरती गौरव पाएगी।
उनपर अपने दुर्लभ रत्नों को भी वारी जाएगी।।
हम भी उनको सादर मन में कर स्मरण, चढ़ाएं प्रेम पुष्प।
जिनके कारण हम अपने घर में बैठे हैं सुख शांति युक्त।।
जो अपने जीवन को अपनों के हित में करते स्वयं होम।
उनका करने वंदन झुकता है, नत होता है स्वयं व्योम।। 9 ।।
हम भी उनकी जयगाथा को अभिव्यक्त चाहते हैं करना।
अपने मन की अभिलाषा को संतृप्त चाहते हैं करना।। 10 ।।
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