तुम,
तुम ख़ुद को समझते जो,
वो तुम कहाँ हो!
तुम तो और भी कुछ हो!
तुम हमेशा ख़ुद को,
समझते हो 'वो'!
पर तुम,
तुम तो 'वो' भी नहीं हो!
तुम ख़ुद को समझते हो,
'क्या'...???
ये तुम कभी नहीं जानते!
तुम जो असलियत में हो...
वो तुम हो सकते हो!
तुम, तुम नहीं हो...
तुम सम्भावना हो!!
तुम प्रस्तावना हो!!
तुम विश्वास हो!!
तुम प्रयास हो!!
अनुपम निधि हो,
एक नई विधि हो!
तुम कभी अपने पास,
तो बैठो!
अपने कंधे पे,
अपना हाथ रखो!
दो क़दम अपने साथ,
चल देखो!
पाओगे तुम कि,
तुम हो अपने पास!
पाओगे तुम कि,
तुम हो कितने ख़ास!
तुम तुम्हारे लिए,
हो नूतन आस!!
-अंशुल।
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