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Saturday, 12 January 2019

सूरज

हुई सुबह,
वह गली में आया,
अपनी गठरी लेकर!
भटका घर-घर,
कोठी-कोठी, द्वारे-द्वारे,
रहा पुकारे।
घूम चुका जब,
शहर ही सारा,
देखा खाली नहीं है कोई,
सब अटके हैं,
सब लटके है,
अपने-अपने काज काम में,
लगे हुए दिन-रात काम में,
भूले सुध-बुध,
अपनों को भी न पहचानें।
याद नहीं कुछ,
ऐसे हैं मतवाले सारे।
सच में बदल गया है सबकुछ।
सोच-सोच यह,
उल्टे पैरों, चला वो वापस!
अपनी नगरी, गठरी लेकर!
जो लाया था,
रत्न लुटाने जो आया था।
किसको दे वह?
वक़्त किसे है?
मन मसोसकर, सीस झुकाकर,
सूरज लौट गया अपने घर,
नीले-नीले नभ के ऊपर!!

-अंशुल तिवारी।
(हरिद्वार/13.01.19)

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