कौन कहे, कहि जात न जाए, न वर्नन जीभ करै सक सोई।
नाहिं सकैं कवि कोविद लेखि, न वर्तनि की छमता कछु होई।।
सात पयोधि को कीन्ह मसि, सब ब्यर्थ गई, निज भाग पे रोई।
किन्तु न पाए तिलोकहुँ में, छबि कृष्ण की बाँचि सकै अस कोई।।
स्याम मुखाकृति ताल को नीर में, नील सरोरुह सम दुह लोचन।
कुंचित केस, सुतीछन नासिका, भाल पे चन्दन, ताप बिमोचन।।
कानन कुंडल झूल रहैं, गल फूल के माल, सुंगंध गोरोचन।
अधरन पै मुस्कान सुसीतल, स्याम को रूप सबै मन रोचन।।
पीत पिताम्बर मलमल को, तन सोहत संग सुवर्ण किनारी।
कन्ध धरै पटका मोतियन का, हिए पहिरें मुक्तामणि प्यारी।।
हाथ कड़े नग युक्त बड़े, मुंदरी नवरत्न जड़ी अति भारी।
श्यामल रंग त्रिभंग खड़े, मुरली संग शोभत रास बिहारी।।
नवग्रह, चौदह रत्न, जड़े अस करधनिया पहिरे अति न्यारी।
धोती बसन्त रँगी कस के, तिरछे पग कीन्ह खड़े बनवारी।।
नूपुर सुंदर स्वर्ण विनिर्मित, बाजत छम-छम, छम-छम, प्यारी।
बृजरज से अभिषिक्त किए चरनन, अस सोहत बाँके बिहारी।।
संग बिराजति मोहनी मूरत, भूमि बैकुंठ की जो महारानी।
जो हैं लली वृषभानु की सुंदर, हैं ब्रजधाम की जो ठकुरानी।।
जाको निवास है श्याम हिये, ब्रजराज के चित्त को एक लुभानी।
ठाकुर बाँके बिहारी की प्यारी, जो हैं बरसाने की राधिका रानी।।
श्यामल गौर मनोहर जोरि को देखत, अगणित हैं हिय हारे।
देखि ठगे से गए, सुधि आपनि भूलि गए, जग बोध बिसारे।।
एक ही दृष्टि में मुक्त हुए, सब सोक गए, भए लोग सुखारे।
स्याम-हरी द्युति को अवलोक, हुए अतिमुग्ध न जाए संभारे।।
स्याम सुहावैं घटावन-सों, अरु चन्द्र-सी शोभत राधिका रानी।
स्याम लगें वंशी सम ज्यों, धुन बाँसुरिया की श्री राधिका रानी।।
स्याम लगें जमुना तट-से, जमुना जल जैसी श्री राधिका रानी।
स्याम जु कल्पमणि सम हैं, द्युति ताकि अलौकिक राधिका रानी।।
मंगल मोद प्रदान करै, छबि राधिका-श्याम को जो नित ध्यावै।
प्रेम परस्पर नित्य बढ़ै, सुख सम्पति की बरखा घर आवै।।
कृष्ण कृपा की छटा अनुपम, तिन्ह के ऊपर सब काल सुहावै।
ताहि न दुर्लभ और कछू, जिन राधिकानाथ की कीरति गावै।।
।।इति श्री राधिका-कृष्ण रूप माधुरी।।
।।श्री श्री श्यामश्यामार्पणमस्तु।।
।।श्री बाँके बिहारी विजयते।।
(श्री राधिकावल्लभ प्रेरणोत्पन्नः)
- अंशुल तिवारी।।
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