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Tuesday, 15 January 2019

शौर्यगाथा भाग 01

।।शौर्यगाथा: भाग 01।।

प्रस्तावना:

तुम याद रखो, दो ध्यान यहाँ जो बात बताई जाती है।
भीषण, दुर्दम रण की गाथा ये यहाँ सुनाई जाती है।।
जब तोड़ भरोसा छल करके रिपुओं ने व्यूह रचाया था।
कुछ शेरों को गीदड़ समूह ने, कष्ट बड़ा पहुँचाया था।।

धोखे से पाकर जीत बड़े ही सुख में वो हर्षाए थे।
पर फल इसका क्या होगा, इतनी बात समझ न पाए थे।।
शेरों का जब धीरज डोला, जब सहन नहीं ये वार हुआ।
उत्तर देने इसका तब, भीषण, घोर बड़ा प्रतिकार हुआ।।

कर घोर नाद आकाश फटा, बरखा-सी बरसीं गोली थी।
जब गोले, बम, बारूद चले, रण में बंदूकें बोली थीं।।
घनघोर महारण में अमृतपुत्रों ने खेली होली थी।
जब अरिदल को दलने आई, कुछ दीवानों की टोली थी।।

भूमिका: भारत भूमि का गौरव।

यह बात विदित सारे जग में, हैं विनयशील भारतवासी।
हम शांति, प्रेम के परिचायक, हैं सहनशक्ति के विश्वासी।।
हम आदि सभ्यता के धारक, संस्कार धर्म के वाहक हैं।
अपने रस्ते चलते हैं हम, न व्यर्थ उलझते नाहक हैं।।

हमको ग्रन्थों ने समझाया, वेदों ने अनुपम ज्ञान दिया।
उपनिषदों ने शिक्षा दी है, दुर्लभ विद्या का दान दिया।।
ऋषियों के हम अनुयायी हैं, सन्तों की सेवा करते हैं।
हम जीव चराचर के भीतर, ईश्वर का दर्शन करते हैं।।

करुणा से सींच हृदय अपना, मित्रता, दया, से भरते हैं।
सबको अपना ही मान-जान, हम प्रेम सभी से करते हैं।।
अपने सौहार्द भाव से हम, जग में पहचाने जाते हैं।
निज स्वर्ण हृदय के कारण ही, जगती में जाने जाते हैं।।

हम पशु-पक्षी, वन, कानन,वट, सबकी ही पूजा करते हैं।
परहित में ही संलग्न सदा, हम काम न दूजा करते हैं।।
नर ही नारायण हैं अपने, आराध्य सदा जन मानस हैं।
जिसमें सबका हित निहित रहे, उस नीति नियम के साधक हैं।।

अपने पहले आगंतुक का हम ध्यान सदा ही धरते हैं।
घर की रोटी सबसे पहले हम उन्हें परोसा करते हैं।।
हम ख़ुद भूखे रह जाएँगे, संस्कार हमारा कहता है।
यदि एक बनी हो रोटी भी, मिलकर के उसको खाएँगे।।

जो घर आया सद्भाव लिए, भगवान हमारा होता है।
अतिथि की सेवा करने से ही मान हमारा होता है।।
ख़ुद धरती पे सोकर भी हम, आसन पर उसे सुलाते हैं।
कोई भी कमी न रह जाए, मन में यह बात मनाते हैं।।

जो प्रेम भरा हो सीस सदा, हम उसको गले लगाते हैं।
जो द्वार खड़ा मनुहार करे, उसको हिय में बैठाते हैं।।
जो कष्ट समय में याद करे, उसमें भागीदारी देंगे।
यदि मांगे हमसे जो सहाय, सर आँखों पे ही ले लेंगे।।

इतिहास पटा है तथ्यों से, ये बात नहीं है मुँहबोली।
अरि के मस्तक पर भी हमने, सबसे पहले दी थी रोली।।
स्वागत अपने ही वैरी का, यह नीति विलक्षण भारत की।
ऐसा औदार्य भरा मन है, ऐसी ही प्रीति है भारत की।।

हमने आघात सहे पहले, अवसर सुधार का सदा दिया।
हम जिये, दिया जीने सबको, यह दिव्य निवेदन सदा किया।।
यदि आँख के बदले आँख गई, दुनिया अंधी हो जाएगी।
यह सुंदर रचना दुनिया है, निश्चित गंदी हो जायेगी।।

जो बने किसी भी कीमत पर, हम शांति बनाए रखते हैं।
संसार लाभ के लिए अतः, हम कालकूट भी चखते हैं।।
हमने जग में आदर्श दिया, सबके हित में मर जाने का।
जो कुछ सम्भव की सीमा है, उस से आगे कर जाने का।।

हमने हैं जग को दिए सदा, रघु, शिवि, दधीचि-से बलिदानी।
कवि वाल्मीकि, कवि कालिदास, उद्भट विद्वान, प्रखर ज्ञानी।।
गुण, ज्ञानवान, संकल्पवान, हम तो कहलाते आए हैं।
अपने कर्मों से सकल विश्व में विमल कीर्ति ये पाए हैं।।

साहित्य, कला, विज्ञान, ध्यान, आध्यात्म, युक्त भारत माटी।
अनगिन वर्षों से स्थापित है, गौरवमय इसकी परिपाटी।।
आयुर्विद्या, शस्त्रादि शास्त्र करतलगत जिनके वीर प्रवर।
कितने कितने अनमोल रत्न, इसने दुनिया को दिए प्रखर।।

सुश्रुत, पतंजलि, चरक, च्यवन, जैसे जीवन रक्षक महान।
आजीवन कर तप कठिन दिया, जिन ने हमको सुस्वास्थ्य दान।।
हमने ही दिए हैं आर्यभट्ट, भास्कर आचार्य, वराहमिहिर।
रामानुज, माधव, ब्रम्हगुप्त, सोम्याजी, पिङ्गल, महावीर।।

ये गणना के अनमोल रत्न, गणितज्ञ, विज्ञ, अद्भुत ज्ञानी।
जिनकी यश की गाथाओं को, जाने यूरोपी, यूनानी।।
पाश्चात्य देश भी जिनकी दुर्लभ रचनाओं से तृप्त हुए।
कर ग्रहण जिन्हें, कर आत्मसात वे उन्नति की सीढियाँ चढ़े।।

यह ज्ञान, ध्यान की बात हुई, अब बल की भी कुछ बात चले।
यह धरा अलौकिक है जिसमें हैं वीर अलौकिक बढ़े, पले।।
अर्जुन, अभिमन्यु, कर्ण आदि सम, जीवन को साकार किया।
कष्टों से तपा-तपा ख़ुद को, अद्भुत बल पे अधिकार किया।।

भारत भू ने हैं दिए अनेकों सुत अपने अति बलिदानी।
जिनके सामर्थ्यों की गाथा, दुनिया भर ने जानी-मानी।।
हैं दर्ज सुनहरे पन्नों में, जिनके यश की अद्भुत गाथा।
इतिहास स्वयं जिनके पद पर, नीचा करता अपना माथा।।

वे छत्रसाल, राणा प्रताप, दक्कन के वीर शिवा राजे।
चहुँ ओर वीरता के जिनकी, थे गूँजे तब गाजे-बाजे।।
चौहान वंश के पृथ्वीराज, स्वर पर जो बाण चलाते थे।
रिपुओं को रण में बार-बार, जो नाकों चने खिलाते थे।।

विक्रमादित्य, पोरस, आल्हा, औ' मौर्यवंश के रवि महान।
वे चन्द्रगुप्त सम्राट अजय, रणजीत सिंह, टीपू सुल्तान।।
ये प्रकट पराक्रम के स्वरूप, साहस जैसे हो मूर्तिमान।
विख्यात सकल जग में जिनके, अद्भुत अलौकिक कीर्तिमान।।

ऐसी अपार क्षमता रखकर भी कभी न हम इतराते हैं।
न व्यर्थ कभी आतंक हेतु, अपनी शक्ति दिखलाते हैं।।
हम सदा क्षमा के धर्मी हैं, मन से उदारता वादी हैं।
जो चरण शरण में आ जाए, उसके रक्षण के आदी हैं।।

इतिहास गवाही देता है, हमने अपना दिल साफ़ किया।
हमने आतंकी गौरी को सत्रहों बार ही माफ़ किया।।
अवतारी नर होकर भी अपने राम तितिक्षा करते हैं।
यदि सागर बिगड़े, अड़े, राम दिन तीन प्रतीक्षा करते हैं।।

हम सदा क्षमा के धर्मी हैं, दुश्मन के दोष भुलाते हैं।
जो चरण शरण में आ जाए, उसको निज हृदय लगाते हैं।।
हमको सिखलाया गया क्षमा वीरों का भूषण होती है।
तलवारों के रक्षण में रक्षित शांति पल्लवित होती है।।

हम केवल स्वाभिमान के हित ही काम सुभीषण करते हैं।
इसलिए विश्व को हतप्रभ कर परमाणु परीक्षण करते हैं।।
ये है विश्वास अटल अपना, वसुधा जैसे परिवार बड़ा।
हम अतः सर्वहित के विचार का करते हैं सत्कार बड़ा।।

हम नहीं कभी अपने बल पर अभिमान प्रदर्शित करते हैं।
हम अपने कर्तव्यों से बस, जन-गण को हर्षित करते हैं।।
हमने सीखा है मानवता ही धर्म विलक्षण होता है।
जिसका रक्षण करने से सबका स्वतः सुरक्षण होता है।

हम शरण आ गए रिपु को भी सम्मान, यथोचित देते हैं।
उसके पुनर्स्थापन हेतु सम्भव सेवाश्रम देते हैं।।
यह इसीलिए कि हम सबमें, नारायण को ही भजते हैं।
हम व्यर्थ ज़रा सी बातों पर, भिड़ने से निश्चित बचते हैं।।

जो याचक बन के आ जाए, धन-धाम निछावर करते हैं।
जो अभिलाषी बन आ जाए, उसकी इच्छा सर धरते हैं।।
हम रण की जगह, विनय के पथ, का चयन सदा ही करते हैं।
हम शांति, प्रेम, सौहार्द, आदि को, नमन सदा ही करते हैं।।

हमने ही दिखलाया जग को, हम सहनशीलता वाले हैं।
फेंके पत्थर जो हमपर भी, हमने वो झेले सारे हैं।।
अपने पड़ोसियों को हम अपने घर का हिस्सा कहते हैं।
यह बात नहीं केवल, बीते युग इसका किस्सा कहते हैं।।

हम सदा पड़ोसी के घर पर त्योहार भेंट पहुंचाते हैं।
जो घर में बने मिठाई उसको बाँट-बाँट कर खाते हैं।।
जो कभी हुई गरमा-गरमी हम, ख़ुद पीछे झुक जाते हैं।
बल से विवाद को जीतें ऐसा करने से रुक जाते हैं।।

हम स्थापित करने सम्बन्धों को, आगे सबसे आते हैं।
गर दुश्मन भी हो देश, तो समझौता एक्सप्रेस चलवाते हैं।।
पर बदले में जो मिला उसे हम कभी भूल न पाएँगे।
कितने दिन तक यूँ क्षमा सर्प को कहो भला कर पाएँगे।।

जब-जब हम झुके बड़े बनकर, तब-तब ही दंश मिला हमको।
अपनी मिठाईयों के बदले ,विष का ही अंश मिला हमको।।
फिर भी हम थामे रहे खड्ग को, नहीं म्यान से काढ़ा है।
पर ये ना भूलो भारत भी रक्त गर्म है, गाढ़ा है।।

हम अगर स्वयं पर आ जाएँ, तो काल खड़ा भय खाएगा।
ऐसा रण होगा भीषण जिसमें नाश सकल हो जाएगा।।
ये मत समझो भारतवासी, केवल तप, भक्ति ही करते हैं।
हम अपनी रक्षा के हित परमाणुओं की शक्ति रखते हैं।।

इसलिए निवेदन करते हैं, जिससे मानवता बनी रहे।
देशों में सभी प्रेम की भीनी बरखा बरसे नमी रहे।।
पर कभी जो उकसाया हमको हम ये तुमको समझाते हैं।
हम केवल राम नहीं भजते, हम महाकाल को ध्याते हैं।।

हम वैसे तो सबकाल सदा शिव की पूजा ही करते हैं।
पर ये ना समझें कोई भी, हम महायुद्ध से डरते हैं।।
जब भी गर पड़े ज़रूरत हम, रुद्रावतार बन जाते हैं।
जो छुपी आग भीतर उसको तीसरे नेत्र में लाते हैं।।

फिर भी हमने कई बार शत्रुओं को हर युग में त्राण दिया।
पैंसठ, इकहत्तर, एकोंशत् , हर समय दान में प्राण दिया।।
पर फिर भी बार-बार, दुर्बुद्धि हमको छलता रहा सदा।
ये नाग विषैला, आस्तीन में रहकर पलता रहा सदा।। 36 ।।

क्रमशः....

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