।।शौर्यगाथा: भाग 02।।
मूल विषय प्रवेश: भारत का बंटवारा।
विस्मय है, है आश्चर्य बड़ा, जो था माता का एक भाग।
जो पहले था यूँ हिला मिला, अब रखता है विद्वेष, आग।।
जिसने होली में खेल रंग, सेवैयाँ ईद में खाई थीं।
रह साथ सदा, खेला, खाया, दीवाली साथ मनाई थी।।
जो एक रंग में रहता था, अब रंग बदलता फिरता है।
जो घात वार करने में भी, अब किञ्चित नहीं मुकरता है।।
पहले की बात अनोखी थी, थे लोग परस्पर स्नेह भरे।
ना कोई भेद, न द्वेष कोई, तृण मात्र नहीं सन्देह भरे।।
सब एक दूसरे को निसदिन, भाई-भाई ही कहते थे।
मिलजुल कर, हँसते-गाते थे, सब साथ मुसीबत सहते थे।।
बँटवारा केवल सुख-दुख का, खुशियों की हिस्सेदारी थी।
जो गिरे उठाना उसको फिर, ये सबकी ज़िम्मेदारी थी।।
चाहे जिसका भी राज चले, जनता एकत्र, एकजुट थी।
मत एक सभी का, लक्ष्य एक, एकता शक्ति के संयुत थी।।
छोटी-मोटी बातों पर यों कुछ अनबन होती रहती थी।
पर पूर्ण चित्र में देखो तो वो न्यून, न्यून से लगती थी।।
फिर जब अंग्रेज़ी शासन को अहसास हुआ इस जनबल का।
अपनी कुनीतियों को मथ कर, पासा फेंक अपने छल का।।
कुछ कपटी, कायर लोगों को ढूँढा, फिर अपने साथ किया।
लालच से उनका घर भर कर, उनको अपने फिर साथ लिया।।
ये लोग विषैले तीर बने, जो प्रेम, स्नेह के बीच धँसे।
अनगिन जन को आखेट बना, अंतर को कुत्सित किये, ग्रसे।।
फिर वैमनस्य का विष काला, लोगों के अंतर में उतरा।
फिर भेद भाव अत्यंत बढ़ा, फिर वैरभाव अत्यंत चढ़ा।
जिसका फल इतना भीषण था, जिसमें थी कितनी पीर बड़ी।
जिससे भाई से भाई लड़े, मानव से मानव जाति लड़ी।।
किसने सोचा था, एक मुल्क, दो हिस्सों में बँट जाएगा।
इंसान छोड़ इंसानों को, ख़ुद दूर खड़ा हो जाएगा।।
इस तरह बँटा भारत टुकड़ों में, कुछ लोगों के कारण ही।
कितनों ने झेला दुख भीषण, इस बंटवारे के कारण ही।।
जो लोग साथ खुश रहते थे, वे दूर हुए ,मजबूर हुए।
पर दया न आई नीचों को, जो सिद्ध परम ही क्रूर हुए।।
अपने मतलब के लिए महज़, माता को काट दिया था यूँ।
भारत को खंडित किया, तथा हिस्सों में बाँट दिया था यूँ।।
अपने लालच की तृप्ति हेतु, अपने जन को ये त्रास दिया।
सुख, समृद्धि, वैभव सारा ही, क्रूर काल का ग्रास किया।।
जड़ से विच्छिन्न हुए नर यों, जैसे पेड़ों से झरें पात।
कितने दुख से बीते होंगे, सन्तप्त मनुज के दिवस रात।।
जो कल तक साथ विचरते थे, आनंद साथ ही करते थे।
जो सभी स्थिति में साथ खड़े, इक-दूजे का कर धरते थे।।
वे आज खड़े हो गए, एक सीमा रेखा के आर-पार।
भारत की अटल एकता पर, छल छंदों का था हुआ वार।।
वे एक दूसरे से जैसे हो गए विलग, अनजान हुए।
जो इसके कारण तथाकथित, वे ही बस वैभवान हुए।।
जन ने झेले कितने अंधड़, झंझा भयावने बड़े सहे।
फिर भी जैसे तैसे सहकर, अपने पैरों पे हुए खड़े।।
जो घाव लगा भारत को था, उसका कोई उपचार न था।
जो रिसता था, दुख देता था, जिसका कोई प्रतिकार न था।।
जब मरहम बनकर वक़्त चला, जब घाव सूखने लगा ज़रा।
जब कष्ट भूलने लगे लोग, कुछ ये देखा नहीं गया।।
वे नहीं चाहते थे जनता, दुख भूले कुछ उन्नति करे।
वे यही चाहते थे भारत के कष्ट बढ़ें, अवनति करे।। 13 ।।
इसलिए छद्म तब रूपों में, नित नए छलों के व्यूह रचे।
जो अन्यायी, आतंकी, नीचों के समूह को बड़े जँचे।।
जब लोगों का सम्बंध तोड़कर भी सुख ,चैन नहीं पाया।
तब आहत करने भारत को ये अस्त्र नया था अपनाया।। 14 ।।
वे भी थे दबे, दबावों में, पर छुप-छुप कर षडयंत्र किए।
अपनी सारी योजना लगाई केंद्रित सारे तंत्र किये।।
उनका ज्यों लक्ष्य यही बस था, सुख, चैन हमारा खो जाए।
ऐसी घटनाएँ हों भारत ना, नींद सुहानी सो पाए।। 15 ।।
भारत की सकल व्यवस्था को वे ध्वस्त चाहते थे करना।
इस आर्यभूमि के रवि पूरा अस्त चाहते थे करना।।
अपना तो जिनको भान नहीं, संसार समझता दीन जिन्हें।
न उनका कोई यश जग में, समझा जाता है हीन जिन्हें।।
जो अपने जन के पालन भी में सदा ही मुँह की खाते हैं।
जो अपनी जनता को कितना ही दीन बनाए जाते हैं।।
ख़ुद ही अपने पैरों पे जो न कभी खड़े हो पाए हैं।
वो क्या भारत को नष्ट करेंगे, सपना खूब सजाए हैं।।
जो बस लेकर ही दान सदा, अपना घर भरते आए हैं।
और सिर्फ़ चाकरी सदा विदेशों की ही करते आए हैं।।
जिनको स्वाभिमान की भाषा कभी समझ में न आई।
जिनके मन पर रही हमेशा द्वेष, द्रोह की परछाईं।।
वो जिनको उपहार के बदले वार ही करना आता है।
धोखे से, चुपके से, जिनको घात ही करना आता है।।
जो सर्वदा सामने आने में रण में कतराते हैं।
जो अपने मुँह मिट्ठू बनकर महावीर कहलाते हैं।।
जो मौके को देख बदल देते हैं अपनी चाल कहो।
कैसे वो सामने लड़ेंगे, होगा फिर क्या हाल कहो।।
मित्र बनाकर मुँह पर मीठी बात बड़ी जो करते हैं।
मन के भीतर मगर ज़हर के प्याले गहरे रखते हैं।।
वो जो अपनी विजय हेतु हर सीमा लाँघ भी सकते हैं।
जो रण में परचम लहराने, शील त्याग भी सकते हैं।।
वो जिनको तो छुरा पीठ में, सिर्फ़ घोंपना आता है।
हार को अपनी औरों के सर सिर्फ़ थोपना आता है।। 21 ।।
गले लगाकर गला काटने का फ़न जिनको आता है।
ज़हर पिलाकर सिंह मारना सदा ही जिनको भाता है।।
हम उनको भी जान सहोदर सदा, साथ देते आए।
सम्बन्धों को अच्छा करने हाथ सदा देते आए।। 22 ।।
वो हैं कुछ ही लोग मगर, वो जनता को बहकाते हैं।
शांति, मयत्री के फूलों को, कुचल, रौंद जो जाते हैं।।
अमन, चमन में अपने आग लगाना जिनको भाता है।
अपने जन को सिर्फ़ दुःख पहुँचाना जिनको आता है।।
जो ये नहीं देख सकते, सब साथ मिलें, सब साथ चलें।
जो ये नहीं देख सकते, बच्चे सुकून में बढ़ें ,पलें।।
जो आने वाली नस्लों में ज़हर सींचना चाहते हैं।
बढ़ते पैर तरक्की के जो सिर्फ़ खींचना चाहते हैं।। 23 ।।
जो जनता की ख़ुशी देखकर, मन ही मन पछताते हैं।
कैसे इसको नष्ट करें इस के षडयन्त्र बनाते हैं।।
वो जन मानस के शव पर चढ़कर, राजा कहलाते हैं।
मानवता की खाल सदा अपने आगे खिंचवाते हैं।। 24 ।।
जो इंसानों को इंसानों जैसा नहीं समझ सकते।
जो अपने सीने इंसानों सा हृदय नहीं रखते।।
जो पत्थर हैं, सदा रक्त से सने हुए, अन्यायी हैं।
मुँह पर कहते जनता को, हम सुनो तुम्हारे भाई हैं।। 25 ।।
अपने निहित स्वार्थ के हित लड़वाते भाई-भाई को।
मन पर उनके फैलाते अपनी काली परछाईं को।।
वैमनस्य का विष काल जो सदा उगलते रहते हैं।
भड़काने को जनता को जो आग उगलते रहते हैं।।
उनके ही कारण जग में ये व्याप्त दुःख है, पीड़ा है।
समृद्धि का नाश ही करना ,जिनका मौलिक बीड़ा है।।
उन लोगों के कारण ही, जन-जन को त्रास हुआ भारी।
भारत की भी, शांति व्यवस्था का है ह्रास हुआ भारी।। 27 ।।
बनकर काले मेघ नाश के नभ में देखो छाए हैं।
बार-बार भारत में जिन ने आतंकी पहुँचाये हैं।।
उनकी कुत्सित सोच हमेशा यही कोशिशें करते है।
भारत को आहत करने के, नव संकल्प विचरती है।।
कितने बीते दशक मगर, उनका सपना बस सपना है।
चाहे सदियाँ हो जाएँ, उनको पर सिर्फ़ तड़पना है।।
वैरी ये ना भूले, भारत की सभ्यता पुरानी है।
वर्ष सहस्त्रों से चर्चित इसकी तो अमर कहानी है।।
यह देवों की धरा, नाश तो इसका ना हो पाएगा।
जितनी बार लड़ेगा वैरी, सदा ही मुँह की खाएगा।।
भारत नहीं भूमि का टुकड़ा, राष्ट्र पुरुष जीत जगता।
जो अमृत की धारा को है, वेदों से पीता, छकता।। 30 ।।
अतः, कोशिशें उनकी केवल जाएँगी मारी-मारी।
फिर भी वो ये न समझें तो, होगी भूल बड़ी भारी।।
भारत विमल कीर्ति का धारक, सदा विश्व में गुंजित है।
जिसके लोहू में विज्ञान, ज्ञान, बल, सभी तरंगित हैं।। 31 ।।
भारत के वैभव के आगे, स्वर्ग खड़ा सकुचाता है।
हम ये कहते नहीं, समय इसका वृत्तांत सुनाता है।।
पुण्यभरी इस धरती से टकराना भूल बड़ी भारी।
जो इस संकल्प करे, कर ले वो अपनी तैयारी।।
हमको रिपुओं को भी हरदम पार लगाना आता है।
उनको भी परलोक धाम पहुँचाना हमको आता है।। 32 ।।
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