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Tuesday, 12 December 2017

जब कभी तुम्हें!!!

जब कभी,

जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो पाता हूँ, तुमको,

किसी सुहाने ख़्वाब से उपजी,
मीठी मुस्कुराहट जैसा।

बेबाक छिटकती चाँदनी के,
रेशमी धागों सा महीन।

या,
अल-सुबह गुलाब की पंखुड़ियों से,
लिपटी शबनम-सा पाकीज़ा।

जब कभी मैं,
तुम्हें देखता हूँ।
तो लगता है,
तमन्नाएँ ओढ़कर इंसानी लिबास,
मुक़म्मल हो उठी हैं।

-अंशुल तिवारी।

Thursday, 9 November 2017

इस दीवाली...

शहर से घर लौट रहा हूँ,
सोच रहा हूँ,
क्या ले जाऊँ घर, घरवालों के लिए,
माँ के लिए...पापा के लिए....
फिर सोचा कि,
अब तो घर के आस-पास भी
सब मिल ही जाता है।
वो सब कुछ जो ज़रूरी होता है।
या ज़रूरी न हो तो भी मिल जाता है।
सजावट का सामान,
साड़ियाँ, कीमती कपड़े, सब कुछ।
smart phone, accessories वगैरह।
फिर क्या ले जाऊँ, समस्या गंभीर है??
शायद वक़्त???
हाँ, सबकुछ तो है सिर्फ वक़्त नहीं मिलता!!
सोचता हूँ इस बार, घर वालों के लिए,
ये वक़्त ही ले जाऊँ,
कुछ बातें, कुछ किस्से, कुछ मीठी नोक-झोंक,
कुछ चुटकुले, कुछ रात, कुछ दिन, कुछ पल।

हाँ, अब उन्हें भी मुझसे यही चाहिए।

बस तय हो गया,

इस दिवाली, मैं घर ले जा रहा हूँ,
वक़्त, मेरा वक़्त, उनका वक़्त...

-अंशुल।

जीता कौन???

मुझे बचपन से सिखा दिया गया था,
फ़र्क जीतने का और हारने का।
और मैं भी ये समझ गया था,
कि मेरे जीतने और हारनेे के मापदंड,
तय वो करेंगे,
जो मुझे जानते ही नहीं,
जिनके लिए मेरे अस्तित्व का कोई सकारात्मक,
मोल नहीं था।
कोई value नहीं थी।
वे तो बस अपनी स्वतंत्रता रखते थे,
ये निर्णय करने की, कि मैं कौन हूँ?
और क्या हो सकता हूँ?
वो जिन्होंने कभी मुझसे बात तक नहीं की,
या कि कभी पूछा मेरा हाल।
और मैं भी बिन समझे,
जुट गया, बलात थोपे हुए दायित्वों,
मापदंडों, अपेक्षाओं को ढोने में।
खच्चरों की तरह, हाँका जाने लगा,
एक ही ढर्रे में।
लेकिन भरपूर कोशिश करके भी,
में असफ़ल ही रहा,
नाकारा ही रहा।
भला ये कैसे संभव है??
कि मछली कोशिश करके,
सीख जाए उड़ना,
या, परिंदे अभ्यास कर लें तैरने का।
पर मैंने कोशिश नहीं छोड़ी,
लगा रहा, जुटा रहा,
क्योंकि मैंने ये भी समझा था,
कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
ये सत्य भी है!!
मेरी कोशिश घिस-घिस के चमक रही है अब।
और चमकेगी...
उनके मापदंडों के अनुसार अब,
मैं जीत रहा हूँ।
क्या वाकई???
पता नहीं ये जीतने वाला में ही हूँ,
या है और कोई, मेरी ही शक़्ल में???

-अंशुल।

Thursday, 2 November 2017

बहू चाहिए।।

ये व्यंग केवल मनो विनोद के दृष्टिकोण से लिखा गया है।
एक सामान्य प्रस्तुति है। इसे इसी भावना के साथ लिया जाए।

व्यंग- बहू चाहिए।।

सुनो सुनो भई ध्यान लगाकर, खोलो कर्ण के द्वार।
Market फिर से सबल हुआ है, बदल गयी सरकार।

नया trend अंदाज़ पुराना, फिर आया एक बार।
नए नवेले पढ़े लिखों की, हो गयी है भरमार।

करें आप भी इसमें invest, गर्म है ये बाज़ार।
धूम धाम से लौटा है ये परिणय का त्यौहार।

अपने अपने products लेकर, खड़े हैं पालनहार।
Matrimonial book हैं, marriage bureau भी बेज़ार।

जित देखूँ तित लोग खड़े हैं, लंबी करे कतार।
अपना नंबर कब आयेगा, करते इंतज़ार।

अगला नम्बर चौबे जी का, सेवक रहा पुकार।
सुनके उनके बुझे बुझे मुखड़े पे थी चमकार।

भीतर आके देखा तो था सजा हुआ दरबार।
खड़े हुए थे फरियादी सब ले करके दरकार।

सोचा पहल करें खुद ही थे चौबे जी तैयार।
दृढ निश्चय के साथ बढे, counter पे आखिरकार।

बड़े गर्व से गरज के बोले, बहू चाहिए सुन्दर।
काम काज में तेज़ रहे, सद्गुण हों सारे अंदर।

मीठी बोली कोयल सी हो, नीति रीति में लीन।
प्रजातंत्र को न माने, जो रहे राज्य आधीन।

बुद्धि से हो सरस्वती, हो लक्ष्मी का जो रूप।
लाना हो जो साथ लाये, अपनी इच्छा अनुरूप।

सुंदरता हो परम दिव्य, नित पहने नया जो गहना।
और ब्याह उपरांत लाए संग, बस तो फिर क्या कहना।

किन्तु ध्यान ये रखना उसको हो न गया बहकाया।
और न उसपर हो "काली" या "दुर्गा" रूप की छाया।

गौमाता सी शीलवती हो, रहे जो शीष झुकाय।
क्रोधहीन, इच्छाविहीन, मुनियों सा समय बिताए।

डॉक्टर हो, engineer हो, या management की ज्ञाता।
बड़ी कुशलता से घर का सब काम हो करना आता।

चाहे पढ़ी लिखी हो जितनी, नाम भी खूब कमाए।
पर technical प्रज्ञा अपनी, "चौके" में अजमाए।

नहीं रूढ़ी के वादी हम, हैं परम्परा के पालक।
करें नहीं अन्याय कभी हम धर्म ध्वजा के धारक।

नर और नारी में न करते किसी विधि हम भेद।
पर पति से है ज़्यादा तनख़्वाह, इतना ही है खेद।

और नारी के लिए भी है तो सरल मार्ग बतलाया।
मुक्त हुई वह ललना, जिसने घर में ध्यान लगाया।

इसीलिए हम कहते, काहे नौकर किसी का बनना।
करो धर्म का पालन, के सौभाग्य है सेवा करना।

और है अंतिम आस यही वो हमको स्वर्ग दिलाये।
नेत्र बंद होने से पहले, "पौत्र" का मुख दिखलाये।

ये सारे गुण हों उसमे, ये बात बड़ी है नेक।
किन्तु चाहिए, बड़ा ज़रूरी, सुनो!! विशेषण एक।

सुत को अपने कितनी निष्ठा से हमने पढ़वाया।
Donation की भेंट चढ़ा के degree तक पहुँचाया।

नहीं चाहते हम दहेज़, करते हैं सख्त विरोध।
पर नहीं मिलेगा लड़का ऐसा, देखें करके शोध।

हमें चाहिए ये के गुणों का आप करें सम्मान।
और जगत को बस दे दें, इसका एक लघु प्रमाण।

किसी बड़ी building में खुलवा दें उसका एक दफ्तर।
फिर देखें क्या गर्व करेंगे आप भी उसके ऊपर।

ऐसे जामाता को पाकर धन्य पीढियां होंगी।
कर बखान सौभाग्य का अपने, बस कृतार्थ वे होंगी।

चौबे जी की सुन अभिलाषा, आह!! उठी इक मन से।
डूब मरो रे नीच!! जो जीते रक्त चूसकर तन से।

है धिक्कार जन्म को तेरे, माँ की कोख लजाए।
पितरों को अभिशप्त करे, कुल पे कलंक लगवाए।

क्षमा प्रार्थना-

क्षमा चाहता हूँ मैं जो कुछ हुआ हो मुझसे दोष।
नहीं आप पर हे समाज!!, दुर्जन पर है ये रोष।

-अंशुल।।

निवेदन-
व्यंग को व्यंग की तरह ही लें और आनंद उठायें।।

Saturday, 14 October 2017

वटवृक्ष

वटवृक्ष...
राह में चलते हुए , कुछ देखकर मैं रुक गया,
भीड़ की दीवार थी इक, वृक्ष को घेरे हुए।

है सुशोभन वृक्ष कितना , थे यही सब कह रहे,
वाह!! क्या सर्वांग सुंदर है ये वृक्ष विशाल-सा।

देखकर सौंदर्य उसका, जन सभी मोहित हुए,
देखने वालों के मन को था, वो सुख से भर रहा।

थे रखे किसने यहाँ पर, बीज इस द्रुम के कभी??
था ये एक संयोग या फिर, फल किसी संकल्प का??

योजना जो भी हो विधि की, वृक्ष था अद्भुत मगर,
था घना, शालीन अतिशय, नींव से अतिशय सुदृढ़।

पर विलक्षण और भी इक गुण जो था उस वृक्ष में,
कर दिया जिसने अचंभित सबको था, प्रत्यक्ष में।

बढ़ रहा था वो निरंतर पा के दृष्टि पात को,
जान पाया न कोई जन इस विलक्षण बात को।

जो भी उसको देखता, बढ़ता हुआ ही पा रहा था,
ध्यान सबका प्राप्त कर ,वह और बढ़ता जा रहा था।

वृक्ष की शोभा में डूबे लोग वर्णन कर रहे थे,
छाँह में बैठे हुए, कुछ देख सुख से भर रहे थे।

कुछ घड़ी बीती, समय ज्यों कुछ क़दम आगे चला,
तब अचानक कुछ घटा जो, रच गया विस्मय नया??

दृश्य था जो परम् सुंदर, क्रूर था अब हो गया,
मोद और आनंद अब प्रत्येक जन का खो गया।

अब उपस्थित था वहाँ वह, दृश्य अति विकराल था,
तमोरंजित हर दिशा, सामने आया काल था।

लीलने को सूर्य को, वह वृक्ष बढ़ता ही गया,
हर जगह से रोशनी को तीव्रता से पी गया।

लग रहा था लीलने नभ को बढ़ा अहिराज हो,
जैसे सृष्टि का विलय होने ही वाला आज हो।

थे सशंकित लोग सब, यह क्या हुआ?? यह क्या हुआ??
क्रूरता अब देखिए करती है क्या, करतब नया??

हर दिशा, दिग अंत में, फैला हुआ वटवृक्ष था,
खेद, चिंता, दुःख का, सागर वहाँ प्रत्यक्ष था।

स्वर सभी आनंद के चीत्कार से थे बन गए,
देखकर भयभीत जन को, वृक्ष पल्लव तन गए।

सर उठाए व्योम तक, वटवृक्ष फैला नाग-सा,
था गरल करता वमन, जो जल रहा था आग-सा।

सत्य को करता पराजित, जड़ जमाए था खड़ा,
मैं ही हूँ सर्वस्व स्वामी, इस कथन पर था अड़ा।

ये नहीं था वृक्ष कोई, ये "अहं" मेरा ही था,
घेर कर मुझको खड़ा, "अभिमान" ये मेरा ही था।

अब न था कोई वहाँ पर "पर", वहाँ "मैं" ही तो था,
रौंदकर मुझको चरण से, मैं ही था मुझपर खड़ा।

अब न था कोई साथ मेरे, बस गहन तम था खड़ा,
हाय!! ये अभिमान मेरा, हो गया कितना बड़ा??

अब न तो आनंद था, ना कोई साथी संग था,
अब निहित मेरे लिए, बस एक काला रंग था।

मैंने पा कर तुच्छ लब्धि, बोध अपना खो गया,
और पत्थर के लिए, आनंद हीरा खो दिया।

- अंशुल।
14.10.2017
पुणे।

Friday, 13 October 2017

कविता का जन्म...

कविता,,,

चट्टानों का हृदय चीरकर,
ज्यों उग आता है नव अंकुर,
उस अंकुर की हरी दूब-सी,
मन में स्वयं उभरती कविता।

भोर भए ललकार तिमिर को,
सूरज की मद्धम किरणों-सी।
जैसे जगत प्रकाशित करती,
नभ से स्वयं उतरती कविता।

साँझ ढले आकाश में ऊँचे,
एक छोर से परम क्षितिज तक।
साथ परिंदों का लेकर के,
खुले गगन में उड़ती कविता।

और कभी बूंदों में ढलकर,
मेघों की गोदी से गिरकर।
बूँद-बूँद से सागर बनकर,
कागज़ तले मचलती कविता।

सच है, वो मिलने आती है,
दबे पैर और चोरी- चोरी।
अपनी ही मर्ज़ी की मालिक,
खुद मनमानी करती कविता।

- अंशुल।

Monday, 25 September 2017

तजुर्बा...

सारे क़िस्से की तर्जुमानी है,
बात थी राज़, अब ज़बानी है।

मिल भी जाए तो साथ क्या देगी?
यहाँ हर शै है क्या, बेमानी है।

जिसको दिल से लगाए बैठे हो,
ये क़ुर्बत-ए-जहाँ भी फ़ानी है।

हस्ती क्या है तुम्हारी और मेरी,
जैसे कोई मौज आनी-जानी है।

करवटें हर कदम पे लेती है,
ज़िन्दगी, पेचीदा कहानी है।

प्यार, सच्चाई, वफ़ादारी की,
बात अब हो चुकी पुरानी है।

-अंशुल तिवारी।

Monday, 14 August 2017

मश्वरा

मेरा प्रयास, कुछ शेर।

काफ़िया- "ई"
रदीफ़- "को"

समझ मत खेल यूँ इस ज़िन्दगी को,
बहुत दुश्वार है ये आदमी को।

किसी ने चाँद तारे तोड़कर हैं घर सजाये,
कहीं दीवार और छत भी नहीं मिलते किसी को।

बहा कर ले गई गर्दिश भी अपने साथ सब कुछ,
मगर ना छीन पाई, बस मेरी "पागल" हंसी को।

शहर में थी ग़मों की आँधियाँ, और मैं अकेला,
"ख़ुदा" भी चाहता था देखना मेरी "ख़ुदी"को।

जिसे लग जाए "मर्ज़-ए-इश्क़" उसकी बात फिर क्या,
जला कर जो सुकूँ को, पी रहा हो बेख़ुदी को।

ज़माने में कई पागल से देखे हैं "दीवाने",
अमीरी छोड़कर, सर पर बिठाते "मुफ़लिसी" को।

-अंशुल तिवारी।
26.02.2016

होली छंद

होली की शुभकामनाएँ,
ब्रज की होली का एक दृश्य,

धूरि सा उड़ा गुलाल, मुख हुआ लाल लाल,
खेल-खेल रंग सारी लाज बिसराई है।

मारी पिचकारी मोरी रंग दीनी सारी देखो,
जसोदा को लाल कैसी करता ढिठाई है।

साँवरे सलोने तेरे नैनन के वार ने तो,
नख सिख संग मोरी आत्मा भिगाई है।

रंग-रसिया ने रँग दियो आज बृज सारा,
धन्य हो कन्हाई कैसो होली ये मनाई है।

-अंशुल तिवारी।

उलझन

उलझनें ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा होती हैं, ऐसा हिस्सा जो न हो तो भी मुसीबत और हो तो भी....

एक तरफ़ ज़िन्दगी का है जोखम,
एक तरफ़ शायरी का पेचो ख़म।

एक तरफ़ चोट, दर्द,आहें हैं,
एक तरफ़ ज़ख़्म के लिए मरहम।

एक तरफ़ ठेस, गर्म साँसें हैं,
एक तरफ़ बरसता सुकूँ हरदम।

एक तरफ़ सूख गया दरिया भी,
एक तरफ़ बारिशों का है मौसम।

एक तरफ़ गर्म लू के झोंके हैं,
एक तरफ़ ठंडी हवा, है मद्धम।

जाऊँ किस ओर यही सोचता हूँ,
फ़ैसला जंग से नहीं है कम।

-अंशुल।

प्रश्न

रश्मिरथी महाकाव्य में कभी श्री रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा था,
"जाने क्यूँ क्रम ऐसा जग में विचित्र चलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी और अधिक जलता है"

देखा जाए तो यह प्रश्न अत्यंत विचारणीय है, तो प्रस्तुत है निन्मलिखित कविता...
(जो इसी प्रश्न का विस्तार है, राष्ट्रकवि दिनकर की उक्ति से प्रेरित)

दिनकर का ये प्रश्न आज मेरे दिल में पलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी ही क्यूँ अधिक जलता है।
सदियाँ बीतीं, बीते बरसों, काल चक्र चलता है,
ये विधान हो, या ये सत्य हो, पर मुझको खलता है।

प्रश्न नहीं मानव समाज से, तुझसे है विधाता,
एक तपस्वी तज कर सुख को, निज को रहा सुखाता।
शम, दम, नियम, अटल थे जिसके, कष्टों से था नाता,
परहित में संलग्न सदा जो, रहा चोट ही खाता।

पुण्य फली थे, कर्म बली थे, किन्तु न सुख था पाता।

वहीँ कहीँ पर भोगी कोई, नित नव मोद मनाए,
रक्त चाट कर दुर्बल का जो अपनी प्यास बुझाए।
भूखा मारे औरों को, अपना घर भरता जाए,
सुख साधन भी उसकी चौखट जाएँ शीष झुकाए।

परपीड़ा रत, परद्रोही, जग में सज्जन कहलाए।

झूठ कहे वह चढ़े, सत्य कहने वाला ढलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी ही क्यूँ अधिक जलता है।

- अंशुल तिवारी।

ईश्वर पर एहसान करें..

(पूजा-पाठ सम्बंधित आडम्बर के विषय में एक व्यंगात्मक विचार)

चलो सजाएँ थाल, धूप और दीपक का संधान करें,
गंध, पुष्प, नैवेद्य, साथ रख, पूरा सकल विधान करें।
जैसे-तैसे ख़ुद को कर तैयार खड़े हों मंदिर में,
घंटे और घड़ियाल बजा कर, ईश्वर पर एहसान करें।

किसी तरह रहकर भूखे, ये पर्वत सा दिन काटा है,
बिना बात के बच्चों को बस, मजबूरी में डाँटा है।
खाली पेट रहा न जाए, दुविधा कितनी भारी है,
छप्पन भोग सजाकर हमने, पूरी रखी तैयारी है।

बस, यहाँ छुपें आदित्य, वहाँ हम अपना कष्ट निदान करें,
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।

देखो ये मन मेरा मुझसे, हरेक बात पर लड़ता है,
समझाता हूँ, इसे मगर ये, ढीठ ज़िद्द पर अड़ता है।
अरे समझ ले, बात मान जा, क्यूँ ऐसा हठ करता है,
जिस दिन हो उपवास हमारा, हमें नहाना पड़ता है।
किन्तु भक्ति में बंधन कैसा? मन में ये अनुमान करें।
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।

जल्दी-जल्दी करो आरती, भली नहीं अब देरी है,
थोड़ा-सा ठाकुर को दे दो, फिर तो बारी मेरी है।
हुआ ख़त्म अब इंतज़ार, मैं चैन ज़रा कुछ पाऊँगा,
एक दिवस से भूखा हूँ, दो दिवस बराबर खाऊँगा।
अब मैं देख रहा अपना, तुम सबका हरि कल्याण करें,
घंटे और घड़ियाल बजाकर, ईश्वर पर एहसान करें।

हे प्रभु! तूने विविध भाँति हम सबको है सद्ज्ञान दिया,
कर्मशील बन हम स्वतन्त्र हों, ऐसा दिव्य विधान किया।
किन्तु फँसे हम छल-छंदों में, राह भटक कर घर भूले,
पाखंडों, आडम्बर से हमने तेरा अपमान किया।

अब करते हैं विनय छोड़, आडम्बर प्रेम करें तुझसे,
दर्शन कर सबमें तेरा, निज मन को आज भरें तुझसे।

-अंशुल।

छलावा

रात गए,
कुछ ख़याल आ गए,
बस बेखटके,
बिना कहे कुछ,
अनचाहे मेहमानों जैसे।

आ धमके कमरे में मेरे,
धरना देकर बैठ गए फिर।

मैं तो बस सोने वाला था,
नींद में जा खोने वाला था।
दिनभर की सब दौड़-भाग,
और उठा-पटक से बचकर, छुपकर।
थके, परेशाँ चहरे को, अंधियारे से,
धोने वाला था।

लेकिन इन कम्बख्तों ने,
पुरज़ोर कोशिशें करके,
मुझको जगा दिया।

पास आ रही निद्रा, को भी भगा दिया।

मैं भी उठा, तैश में आया,
आज क़ैद कर लूँगा इनको,
सोच के काग़ज़ क़लम उठाया।

लेकिन तब ये मैंने पाया......

ख़याल मुझे फिर चकमा देकर चले गए थे,
बेक़सूर, हम रोज़ की तरह छले गए थे।

अब कमरे में मैं था, काग़ज़ क़लम वहीं थे,
निद्राहीन नयन थे, लेकिन शब्द नहीं थे।

- अंशुल तिवारी।
11.05.2017

धर्मसार

"दुनिया में धार्मिकों की कमी नहीं ग़ालिब" (व्यंगात्मक रूप से),
शायद ये मिसरा मौजूद हालात में अत्यधिक उपयोगी साबित हो सकता है।
जहाँ देखो धर्म विषयक चर्चाएँ, प्रवचन, उपदेश हैं।
किन्तु क्या धर्म यही है जो हम आप देख रहे हैं, या कदाचित है तो भी धर्म का पूर्ण स्वरुप नहीं है।
अपनी अल्पमति के अनुसार एक प्रयास, कुछ विचार अभिव्यक्त करने का.....(त्रुटियों हेतु क्षमायाचना)...

भीड़ में रह या मंचों पे चढ़ बस चिल्लाना,
धर्म नहीं है।
अपने पुरखों की थाती पर बस इतराना,
धर्म नहीं है।
बीते कल की बेड़ी पहने चलते जाना,
धर्म नहीं है।
अपनी कहना-सुनना, बस अपनी सुनवाना,
धर्म नहीं है।

बिन समझे ही स्वयं, सार जग को समझाना,
धर्म नहीं है।
भाँति भाँति के तर्कों से सबको बहलाना,
धर्म नहीं है।
निज जन की ही सुनना, और 'पर' को हड़काना,
धर्म नहीं है।
देश, काल को ताक पे रख, निर्णय कर जाना,
धर्म नहीं है।

धर्म नहीं है यह केवल कि,
एक ही पक्ष सुनाई दे।
देखो जिस भी ओर भले,
बस एक ही रंग दिखाई दे।

धर्म धीरता का प्रतीक है,
और धारण की शक्ति है।
संयम, नियम, प्राण हैं जिसके,
मानवता ही भक्ति है।

धर्म मनुज के लिए बना है,
मनुज धर्म के लिए नहीं।
भूल इसे अनगिनत बार,
क्या क्या अघ हमने किए नहीं।

मानवता को भूल गए,
हम भूले वसुधा है कुटुंब।
किन्तु धर्म ही याद रहा,
जिससे प्रगाढ़ हो गया दंभ।

धर्म वही जो मानव को,
मानव होना सिखलाए।
एक दूसरे के प्रति जो,
सौहार्द भाव उपजाए।

धर्म वही जो दे समाज को,
नर परहित अनुगामी।
हरिश्चंद्र से व्रतपालक,
शिवि, रघु, दधीचि से ग्यानी।

राम नाम ही नहीं,
राम से नर को प्रकट करे जो।
केवल बातें नहीं अपितु,
निज सुख को होम करे जो।

बने प्रेरणा, निश्छल हो जो,
कपट, खोट न जाने।
जन मंगल की इच्छा ही,
जो सबसे ऊपर माने।

ऐसा धर्म रहा तो वसुधा,
देव धाम सी होगी।
सुख, समृद्धि से भरी,
नयनाभिराम सी होगी।

अतः, समय है यह विचार,
निश्चित अपनाया जाए।
मानवता आधार हो,
ऐसा धर्म चलाया जाए।

- अंशुल तिवारी।

Sunday, 30 July 2017

तुम्हारा साथ...

तुम्हारा साथ है,
जैसे भरोसा,
भरोसा जो भी होगा,
ठीक होगा।।

तुम्हारा साथ है,
जैसे दिलासा,
दिलासा ये कि मंज़िल,
मंज़िल पास होगी।

तुम्हारा साथ है,
मंदाकिनी-सा,
भरी है जिसमें शीतलता,
अनोखी।

तुम्हारा साथ है,
तारावली-सा,
प्रकाशित जिससे जीवन,
का ये पथ है।

तुम्हारा साथ है,
गीतावली-सा,
है गुंजित गीत-सा हर,
शब्द जिसका।

तुम्हारा साथ है,
जीवन का संबल,
है मुश्किल राह भी,
आसान जिससे।

- अंशुल।।

Friday, 7 July 2017

वक़्त चलता है...

वक़्त चलता है ,साथ उसके यूँ चलते रहिए,
ख़ुद ही ख़ुद के लिए, ख़ुद को भी बदलते रहिए।।

ज़िन्दगी जो भी है, ये आप सँवर जाएगी,
कोशिशें कीजिए, बस कोशिशें करते रहिए।।

एक ही है उसूल बस के यहाँ जीने का,
मंज़िलें पा के, नई राहों पे चलते रहिए।।

ढल न पाए जो ज़िंदगी तुम्हारे साँचे में,
क्या बुरा है कि ख़ुद ही साँचे में ढलते रहिए।।

राह आसान नहीं है तुम्हारे वास्ते तो,
चलते रहिए, न कि घबरा के यूँ टलते रहिए।

- अंशुल।।

अपनी कश्ती को न लहरों के हवाले रखिए!!

अपनी कश्ती को न लहरों के हवाले रखिए,
अपने हाथों में ही पतवार सम्भाले रखिए।।

आंधियाँ जिनको बुझाने में भी नाकाम रहें,
दिल में रोशन ज़रा कुछ ऐसे उजाले रखिए।।

एक अर्से से है तूफ़ान की दस्तक़ दर पर,
हौसला रखिए, यूँ न होठों पे नाले रखिए।।

चैन हर ओर है, राहों में बाहर आई है,
आज के दौर में ये ख़्वाब भी पाले रखिए।।

- अंशुल।।

Saturday, 18 February 2017

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

एक बेटी की बिदाई के सन्दर्भ में....

खिलौने छीनकर अपने यूँ दौड़ती है अभी,
वो है बयार-सी जैसे, कहाँ हुई है बड़ी?

आँगन को सजाती है रंगोली बनकर,
गूँजती घर में वो सारे ठिठोली बनकर।

दीयों में रहती है घर के वो रौशनी बनकर,
छिटकती है वो झरोखों से चाँदनी बनकर।

घर सर पे उठाती है वो तूफ़ान की तरह,
छाई रहती है ज़ेहन पे वो आसमाँ की तरह।

आँखों में वो बसती है यूँ अरमाँ बनकर,
दिलों में रहती हमारे वो जैसे जाँ बनकर।

जहाँ में आई वो जैसे मेरी पहचान बनकर,
कहाँ वो चल पड़ी है आज यूँ  मेहमाँ बनकर।

जो है दुआओं भरा दिल, वो लिए जा रही है,
नया जहान, नई ज़िन्दगी बुला रही है।

ख़ुशी के फूल उसकी राह में खिलते ही रहें,
कारवाँ जश्न के हर मोड़ पे मिलते ही रहें।

- अंशुल।