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Monday, 28 January 2019

शौर्यगाथा भाग 05

शौर्यगाथा भाग 05:

सैनिकों का शीष विच्छेदन और उरी हमला।

(वो डसने की काकचेष्टा कभी नहीं पर छोड़ेगा।
विष काला वीरों के ऊपर, सदा-सदा ही छोड़ेगा।।)
….…
लड़कर-लड़कर जब बार-बार भी उसने जीत नहीं पाई।
हार पे अपनी बार-बार दुश्मन की सेना झल्लाई।।
तब झल्लाहट और जलन से भरकर पाप किया भारी।
जाने-अनजाने में ख़ुद कर ली विनाश की तैयारी।।111/188

ये केवल दुष्कृत्य न था, ये न्योता महाकाल को था।
न्योता अरिमर्दन अभ्यासी सैन्यशक्ति विकराल को था।।
ऐसा काम किया निंदित, गिरने की हद हो आई थी।
इंसानी जज़्बातों की हत्या, ही बस करवाई थी।।112/189

जब होकर हत बार-बार, कश्मीर न हथिया पाए।
तब वो इंसानी अस्मत की, सीढ़ी से नीचे आये।।
सारी मानवता को रखकर ताक, काम ये नीच किया।
सिंहों को धोखे से मारा, शीष काटकर भेज दिया।।113/190

हाय! दुःख कैसा भारी, उस माँ के हिस्से आया था।
जिसके सुत का शीष हीन शव उसके ही घर आया था।।
काँप उठी मानवता भी, ये देख दृश्य भीषण भारी।
रोई माता बिलख-बिलख कर, रोई जनता ही सारी।।114/191

सारा भारत अपने शेरों को खोकर ही रोता था।
दुख के इस सागर में, हर जन हृदय हार कर खोता था।।
दुःख यही था, हमने जिनको दिया सहारा, साथ दिया।
पीठ दिखकर हमें उन्होंने, हाथ हमारा काट दिया।।115/192

हमने जिनको अपनी रोटी में हिस्सा दे, खाया था।
बाँट-बाँट कर दिया सभी कुछ, समझा नहीं पराया था।।
उनकी नीयत लेकिन इतनी गिरी हुई थी, ये जाना।
नज़र सदा कश्मीर पे उनकी जमी हुई थी, ये जाना।।116/193

हमने ताकत होते भी जिनपर न खड्ग उठाया था।
उन लोगों ने भ्राताओं का शव घर तक पहुँचाया था।।
क्या समझे थे, हम केवल नम्रता की बोली बोलेंगे।
अगर ज़रूरत पड़ी शत्रु को तलवारों ओर तौलेंगे।।117/194

अरे! काटकर टुकड़े-टुकड़े कर देंगे समझाते हैं।
ये न समझो हिंदुस्तानी, केवल वेद उठाते हैं।।
अब सेना की शक्ति बना, हर जन के नैनों का आँसू।
और नसों में लावा भरता, भारत माता का आँसू।।118/195

हम जिसकी ख़ुशहाली के हित जीवन त्याग सदा कर दें।
उसे रुलाया जिसने उसको कैसे माफ़ ज़रा कर दें।।
दो हज़ार सोलह में फिर दुश्मन घर घुसकर आया था।
काश्मीर के उरी कैम्प में घात लगाजर आया था।।119/196

चुपके-चुपके, गीदड़ बनकर सिंह गुफ़ा में आ बैठे।
और भोर में सोते शेरों पर सत्रह गोले फैंके।।
हुआ अचानक हमला इससे शेर सम्भल न पाए थे।
और शत्रु पूरी तैयारी करके घात लगाए थे।।120/197

उरी कैम्प में मौका पाकर, फिर धोखे से वार किया।
सोते सिंहों को अवसर पाकर, वैरी ने मार दिया।।
इस हमले में सत्रह शेरों ने अपना बलिदान दिया।
लड़ते-लड़ते चढ़े वीरगति माँ को अंत प्रणाम किया।।121/198

दुश्मन ख़ुश था, जैसे वह तो भारत से हो जीत गया।
बड़ा दुःख देकर ये पल भी जैसे-जैसे बीत गया।।
अबकी बार नहीं लेकिन भारत ने खड्ग रखा अंदर।
जाग उठा था महातेज, जागी पौरुष की ज्वाल प्रखर।।122/199

अब करुणाकर ने खोला था, नयन तीसरा क्रोध भरा।
और किया निश्चय लेंगे, बदला भीषण, प्रतिशोध भरा।।
ढूंढ-ढूंढ कर मारेंगे, वैरी के प्राण सुखाएँगे।
तभी शहीदों के तर्पण को पूरा हम कर पाएँगे।।123/200

जब तक वैरी बचा रहा, हम सुख से ना रह पाएँगे।
भारत से धोखा करने का पाठ उन्हें पढ़वाएँगे।।
भारत ने तानी थी आँखें, जिनमें अद्भुत ज्वाला थी।
महाकाल ने मुँह खोल, अरि सेना बनी निवाला थी।।124/201

तुरत हुआ आदेश प्रमुख ने सेना को सन्देश दिया।
शस्त्र बनी बदले की ज्वाला, नस-नस में आवेश लिया।।
और परम घातक रणधीरों को अपने तैयार किया।
दुश्मन को उसकी ही भाषा में उत्तर इस बार दिया।।125/202

महावीर अब छद्म रूप में दुश्मन से जा जूझे थे।
ऐसा हमला हुआ, स्वप्न में वैरी जिसे न बूझे थे।।
मारा-काटा भून दिया, दुश्मन जितने भी पाए थे।
सिंह बहुत गुस्से में भर, अब महिष झुंड में आए थे।।126/203

छिन्न-भिन्न कर दिया सभी को, दुश्मन का संघार किया।
जो भी मिला शत्रु उसको, बस एक वार में मार दिया।।
समय देखता रहा थमा सा, तांडव रण का ये भारी।
जिसके आगे ध्वस्त हुई, मर गई शत्रु सेना सारी।।127/204

आतंकी बन बैठे थे जो, आतंकित उनको बहुत किया।
खून शत्रुओं के दल का, रणचंडी को फिर भेंट किया।।
अस्त्र-शस्त्र कर दिए नष्ट, तोड़े-फोड़े उनके बंकर।
नाश नाचता रहा झूमकर दुश्मन दल के हर शव पर।।128/205

ऐसा हुआ विनाश शत्रु की हिम्मत टूट गई सारी।
भारत से लोहा लेना कितनी थी भूल बड़ी भारी।।
जब तक दुश्मन को इसका कुछ भान हुआ, था बोध हुआ।
नाशयज्ञ सम्पूर्ण हुआ, पूरा तब तक प्रतिशोध हुआ।।129/206

भारत ने खमठोंक दिया आतंकवाद का उत्तर था।
सारा ज़िम्मा महानाश का बस दुश्मन के ही सर था।।
गर्वोन्नत, हर्षोन्नत भारत की सेना जब लौट आई।
जलते दिल को त्राण मिला, ज़ख्मों पर लेप लगा आई।।130/207

शत्रुदेश की धरती पर ध्वज अपना, प्यारा लहराया।
दुश्मन की छाती पर गाड़ा, और तिरंगा फहराया।।
अब जो जग के सम्मुख था वो भारत का था रूप नया।
स्वाभिमान से और भरा, अपने पैरों पर अडिग खड़ा।।131/208

सीना फूल हुआ दुगना था, भारत के हर जन-जन का।
आँखों में उत्कर्ष विजय का, गर्व भरा बस हर मन था।।
ख़ुश थे हम के भारत ने दुश्मन को पाठ पढ़ाया था।
छल करने का, और शत्रुता का प्रतिबिंब दिखाया था।।132/209

दुनिया याद रखे इस से, हम यों तो कुछ भी सहते हैं।
पर जब सीमा टूटे तो तट तोड़, प्रलय बन बहते हैं।।
हम सहेज कर रखते हैं तो जान वार भी देते हैं।
और मिटाने पर आएँ तो, व्योम फाड़ भी देते हैं।।133/210

क्षमा, शक्ति से पहले है हम, यही सीखते आए हैं।
हम विवाद में लक्ष्मण रेखा सदा खींचते आए हैं।।
वसुधा ही परिवार हमारा, हम ये ध्यान सदा रखते।
एक-दूसरे से हिलमिल कर चलते, मान सदा रखते।।134/211

अपने पहले हम दूजे का ध्यान हमेशा रखते हैं।
अपनी तरह सभी का हम सम्मान हमेशा करते हैं।।
हम झुकते हैं पहले, ये ही धर्म हमारा कहता हैं।
प्रेम मनुज से सदा करो ये मर्म हमारा कहता है।।135/212

सार्वभौम में हम तो दर्शन सिर्फ़ हरि का करते हैं।
ध्यान, भक्ति में लीन रहें, हम भजन सदा ही करते हैं।।
पर अपने रक्षण के हित हम जाने शस्त्र उठाना भी।
इस गुण को भारत के दुनिया ने जाना भी, माना भी।।135/213

हम इतने हैं विनयशील, हम गाल पे चाँटा सहते हैं।
पर ना भूलो उत्तर देने की क्षमता भी रखते हैं।।
दुनिया में दूसरी बड़ी सबसे भारत की सेना है।
हम ये कहते नहीं अपितु दुनिया का ही ये कहना है।।134/214

फिर भी हम अपनी तलवारें सदा म्यान में रखते हैं।
अपनी ज़िम्मेदारी को हम सदा ध्यान में रखते हैं।।
जियो और जीने दो, ये ही बस संकल्प हमारा है।
शांति विश्व की बनी रहे, ये ही अभिकल्प हमारा है।।135/215

सुख की धूप सुनहरी घर-घर लहराए, ख़ुशहाली हो।
क्लेश, दुःख की गागर सूखे, वैमनस्य से खाली हो।
प्रेम और सौहार्द परस्पर जन-जन का आधार बने।
परहित, परसेवा जन-जन के ही जीवन का सार बने।।136/216

सभी सुखी हों, दुखी न कोई, यही प्रार्थना करते हैं।
मंगलमय, आनंदित हो जग ,यही कामना करते हैं।।
हम जीते हैं स्वाभिमान से, देते हैं सम्मान सदा।
यथाउचित सब का ही मन से करते हैं हम मान सदा।।137/217

देख तरक्क़ी औरों की हम नहीं कभी भी जलते हैं।
बढ़ता देख अन्य देशों को हाथ कभी ना मलते हैं।।
नहीं किसी को अपने से कम, कभी आँकते हैं जानो।
औरों के घर की सीमा में नहीं झाँकते हैं जानो।।138/218

हम सभ्यता बनाने वाले सभ्य बने रहना चाहें।
स्वाभिमान धारण करते हैं बात यही कहना चाहें।।
जियो और जीने दो इतना ही तो कथन हमारा है।
ऊँचा हो संकल्प सदा बस ये ही ध्येय हमारा है।।139/219

इसीलिए हम कितने अंधड़, तूफानों में जमे रहे।
ऊँचे संकल्पों के बल पर अचल, अडिग हो थमे रहे।।
सदियाँ बीतीं पर भारत की शान, अभी तक वैसी है।
इसकी प्रखर प्रभा अद्भुत है, सूर्य किरण के जैसी है।।140/220

भारत गुरु है सकल विश्व का ये कहने बात नहीं।
इसीलिए संकट के आगे कभी भी पाई मात नहीं।।
ये देवों की धरती जग में अधिक और ही चमकेगी।
दुनिया के माथे पर बनकर बिंदिया सुंदर दमकेगी।।141/221

प्रबल शौर्य की अद्भुत गाथा इसकी गाई जाएगी।
सुनकर जिसको भारत माता, और अधिक हर्षायेगी।।
जिस गाथा में वीरों का गुणगान अनोखा आएगा।
वो भारत की तरुणाई को, फिर सतपंथ दिखाएगा।।142/222

अतः, शौर्यगाथा भारत की पाती है विश्राम यहाँ।
लेकिन रुकी नहीं है, ये गतिशील रहेगी, सदा रवाँ।।
जब-जब वीर मातृभूमि पर, होने को बलि जाएँगे।
हम अपना कर्तव्य निभाकर उनकी जय-जय गाएँगे।।143/223

उनकी बिरुदावलियाँ गाकर दुनिया में पहुँचाएँगे।
उनके यश की गाथा, जन-जन के सुपुर्द कर जाएँगे।।
भाव रत्न उनके चरणों में नित-नित बहुत लुटाएँगे।
अपने शब्द पुष्प लेकर पथ उनका धवल सजाएँगे।।144/224

यही निवेदन करते हैं भारत का गुंजित गान रहे।
जब तक नभ है, धरती है, तब तक इसका यह मान रहे।।
इसकी नदियों में जीवन यूँ ही बहता अविराम रहे।
धूप सुनहरी भरी सुबह, शीतल बयार सी शाम रहे।।145/225

भारत भाग्य हमेशा चमके, ज्यों सूरज की लाली हो।
घर-घर सुख समृद्धि छाए, खेतों में हरियाली हो।।
गलियों में नाचे आनंदित, झूम रही ख़ुशहाली हो।
होली रँगीली हो इसकी, दीपों भरी दिवाली हो।।146/226

आशा करते हैं रण भीषण कभी न ये माटी देखे।
अब न युद्ध सीमा पर हो, न फिर हल्दीघाटी देखे।।
भारत वासी केवल अपनी उज्ज्वल, परिपाटी देखें।
अपना आज सजाएँ हम पुरखों की शुभ थाती देखें।।147/227

अतः, नमन मैं भारत भू को शीष झुकाकर करता हूँ।
और नमन वीरों को गौरव गाथा गाकर करता हूँ।।
शौर्य कथा अमृतपुत्रों की, माँ के पग पर धरता हूँ।
इसके शब्द-शब्द को मैं उसके न्यौछावर करता हूँ।।148/228

एक निवेदन अंतिम है, जन-जन के चरणों में सादर।
भूल हुई हो अगर कोई मन हल्का करना बिसराकर।।
अनुचित जो कुछ लगे जान अज्ञानी क्षमा मुझे करना।
अवगुन कंटक दूर हटाकर, गुण इस रचना के धरना।।149/229

जो भी लिख पाया हूँ, सबकुछ सादर अर्पित करता हूँ।
राष्ट्रभक्ति के पुष्प सुगंधित, सहज समर्पित करता हूँ।।
इसे करो स्वीकार हिन्द की ये जयगाथा उज्ज्वल है।
इसमें निहित भक्ति भारत की, धर्म-धारणा निर्मल है।।150/230

।।इति श्री दिविभूमौ भारतस्य वीरस्य शौर्यगाथा सम्पूर्णम।।

Sunday, 27 January 2019

शौर्यगाथा भाग 04

शौर्यगाथा भाग 04:

26/11 का हमला और आतंकी घटनाएँ।

जैसे नाग विषैला हमला ठहर-ठहर कर करता है।
धीरे-धीरे ज़हर सघन अपने शिकार में भरता है।।
जिससे धीमे-धीमे उसकी साँस उखड़ती जाती है।
विष के विकट असर से, धड़कन धीमी पड़ती जाती है।।84।।161

पहले हमला वो शिकार की आत्मशक्ति पे करता है।
वो मर ही जाता है, अपने दुश्मन से जो डरता है।।
इसका ही आधार बना अब दिशा शत्रु ने बदली थी।
छुपकर हमला अलग जगह पे करना चाल ये अगली थी।।85।।162

अब हमला था अर्थकेन्द्र पर, था व्यवसाय जहाँ पसरा।
महाराष्ट्र का शहर जहाँ निर्माण चल रहा था तगड़ा।।
अब था उनका लक्ष्य मुम्बई की रफ़्तार ज़रा तोड़ें।
बढ़ते कदम तरक्की के रोकें उनको, पीछे मोड़ें।।86।।163

अब हमला था छह स्थानों पर, हुआ अचानक शाम ढले।
गोली, बम, बारूद एक संग, लगातार कई बार चले।।
लोगों में अफ़रा-तफ़री मच गई अचानक भारी थी।
सर्वनाश करने की, आतंकी दल की तैयारी थी।।87।।164

ओबरॉय संग ताज में फैले दहशत गर्दी पहरे थे।
भारत के सम्मानित जो मेहमान, विदेशी ठहरे थे।
भीतर घुसकर उनको बंदूकें अपनी दिखलाईं थी।
और देश की इज़्ज़त पर, तलवारों की परछाई थी।।88।।165

शांति पूर्ण उस शहर ने देखा क्या क्या फिर उस रात नहीं।
आतंकी सर चढ़ बोले थे, जिनकी कोई बिसात नहीं।।
दशा हमारी पर हँसते थे, जिनकी कुछ औकात नहीं।
यही सोच मन में ख़ुश थे, वो कभी पाएँगे मात नहीं।।89।।166

हाँ कुछ देर हुआ तांडव आतंक और भय का भारी।
कई रहर तक, जनता भारत की भटकी मारी-मारी।।
पर कुछ देर बाद जब आए योधा करके तैयारी।
तब हिम्मत आतंकवादियों की तो निकल गई सारी।।90।।167

अंदर जाकर मारा था, सेना ने नाश-विनाश किया।
नहीं एक भी बच पाया, चाहे जो आस-प्रयास किया।।
ढूँढ-ढूँढकर आतंकी कीड़ों के जैसे मारे थे।
जो निर्मम, निर्दयी, तथा निर्दोषों के हत्यारे थे।।91।।168

अपनी जान लगा बाज़ी पर, वीर अनेकों आए थे।
आतंकी दल पर बनकर वे मेघ काल के छाए थे।।
मेजर श्री संदीप उन्नीकृष्णन, भी योधा भीषण थे।
रहकर निपट अकेले ही, अरिमारण में वे सक्षम थे।।92।।169

अपने त्यागे प्राण नहीं पर छोड़ा दुश्मन को जीता।
कई प्रहर के बाद लड़ाई थमी, समय जब कुछ बीता।।
वीर अनेकों बलिवेदी पर चढ़ कितने हर्षाए थे।
शिंदे, तुकाराम, सालसकर सभी वीर गति पाए थे।।93।।170

श्री अशोक कामटे, और हेमंत करकरे बलिदानी।
प्राण चढ़ाकर मातृभूमि को, बने वीरता के मानी।।
जब-जब भारत ने माँगे, भर-भर कर हमने शीष दिए।
मातृभूमि में मर जाएँ, बस ऐसे ही आशीष लिए।।94।।171

विजय कथा इन वीरों को सदियों तक गाई जाएगी।
इनके उज्ज्वल नामों से, धरती भी गौरव पाएगी।।95।।172
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ये था दाग बड़ा गहरा, दो हज़ार आठ के नाम हुआ।
दुश्मन हारे, गए मृत्यु की गोद यही अंजाम हुआ।।
आतंकी घटनाएँ फिर भी, चलती बा-दस्तूर रहीं।
जिनके फल स्वरूप, जनता रोती, व्याकुल, मजबूर रही।।96।।173

फूलों की घाटी, में फैला बस आतंकी साया था।
जिसके कृत्यों ने जनता को रह-रहकर तड़पाया था।।
सेना भी मुस्तैदी से पहरा अपना बिछवाए थी।
आतंकी के शीष छेदने, के हित ताक लगाए थी।।97/174

घंटों, दिनों, महीनों तक, पर्वत बनकर वे खड़े रहे।
चट्टानों की तरह हौसले, जिनके अविचल, अड़े रहे।।
जहाँ हड्डियाँ गल जाएँ कुछ बर्फ़ इस तरह पड़ती है।
जहाँ साँस ले लेने में भी जान लगानी पड़ती है।।98/175

जहाँ शून्य से नीचे पारा, दौड़ा-दौड़ा जाता है।
जहाँ सिवाए हिम के, कुछ भी और नज़र न आता है।।
जहाँ बर्फ़ ही है ज़मीन, है बर्फ़ चादरें बन जाती।
दीवारें ही कई फ़ीट की, बर्फ़ की ठंडी बन जाती।।99/176

जहाँ पशु भी नहीं दीखते, दुबक भाग जो जाते हैं।
वृक्ष ही केवल जहाँ खड़े रह पाते हैं, लहराते हैं।।
जहाँ आदमी का रहना भी कितना दुष्कर, लगता है।
भारतीय सेना के वीरों को वो घर ही लगता है।।100/177

देशवासियों के हित वे सर्वस्व त्यागते हैं अपना।
हर मौसम में अडिग खड़े, वे धर्म धारते हैं अपना।।
चाहे गर्म थपेड़े हों वे, रेगिस्तानी अंचल के।
रेतीला सागर हो चाहे, कुंड रेत के दल-दल के।।101/178

या, बारिश हो प्रलयंकारी, अंधड़, झंझावात प्रबल।
भारत के सुत खड़े सदा ही , रक्षण के हित सज्ज, सबल।।
कोई ऐसी नहीं आपदा जो इनका साहस तोड़े।
इनको विचलित करे तनिक, दृढ़ निश्चय अटल तनिक तोड़े।।102/179

ये सेना के वीर देश की सेवा में डूबे रहते।
गर्मी, बारिश, बर्फ़ महाभीषण सब कुछ सीधे सहते।।।
छोड़ घरों को, मरुथल में जो, ख़ुश होकर ही आते हैं।
कष्ट भरा जीवन जो अपनी इच्छा से अपनाते हैं।।103/180

सदा जान को लिए हथेली, हर मुश्किल में जाते हैं।
और ज़रूरत हो तो, सिर को भी अर्पण कर आते हैं।।
इनको बस है ये जुनून, भारत माता आज़ाद रहे।
इसका धानी आँचल है, जो लाहराता आबाद रहे।।104/181

देश जलाए ख़ुशियों के दीपक, दीवाली ख़ूब मने।
होली में मस्ती की लहरें चलें, मिठाई ख़ूब बने।।
वे इतनी आशा मन में ले वर्दी धारण करते हैं।
अपने जीवन को बलि, जन-गण के ही कारण करते हैं।।105/182

उनका हमपर कितना है उपकार नहीं कुछ कह सकते।
सच है उनके बिना नहीं आज़ाद तनिक हम रह सकते।।
ऐसे सिंह सपूतों से ही भारत का है नाम बड़ा।
इनके कारण रहे तिरंगा, सदा गर्व से भरा-भरा।।106/183

दुश्मन भी यों देख इसे मन में अपने कतराता है।
भारत को आबाद देख, मन ही मन जलता जाता है।
जलन मिटाने भारत पे हमले, नित नए कराता है।
इसे कष्ट पहुँचाने के, नूतन संकल्प सजाता है।।107/184

जब दिन में लड़कर ना जीता, तब रातों में वार किया।
अंधेरे का लाभ उठाकर, धोखा दिया, प्रहार किया।।
पर अंधेरा सदा पराजित हुआ, ज्योति से, ज्वाला से।
जैसे अमृत सदा श्रेष्ठ ही रहता, विष से, हाला से।।108/185

भारत अमृतपुत्रों की धरती, वीरों की जननी है।
अतः शत्रु के मन की बातें, कभी न होनी, बननी हैं।।
हुआ पराजित बार-बार यों, टूटा बल उसका सारा।
पर वो तो जैसे विष से भरा, नाग कितना काला।।109/186

वो डसने की काकचेष्टा कभी नहीं पर छोड़ेगा।
विष काला वीरों के ऊपर, सदा-सदा ही छोड़ेगा।।110/187

Saturday, 26 January 2019

शौर्यगाथा भाग 03/2

शौर्यगाथा भाग 03/2

...
दो महीनों तक घोर युद्ध दोनों सेना के बीच चला।
लेकिन फिर भी नहीं हौसला, सिंहों का किञ्चित बदला।।55।।132

दुश्मन ने भी कोई अवसर चूक न रोका वारों को।
दिन हो या हो रात, न रोका गोली की बौछारों को।।
आसमान से भारत की सेना पर बरसी गोली थीं।
पर ऐसी कितनी खेली भारत सेना ने होली थीं।।56।।133

झेल गोलियाँ, बम, हथगोले, वीर पंथ पर रहे डटे।
दृढ़ निश्चय से भरे कदम पर नहीं एक भी इंच हटे।।
सर पर बाँधे कफ़न मौत बनकर जब अद्भुत वीर चले।
दुश्मन दल को त्रास हुआ, उनके समूह को बड़े खले।।57।।134

देखा जब भारत सेना आगे ही बढ़ती आई थी।
दुश्मन ने ऊपर से दुगनी तोपें तब चलवाईं थी।।
ऐसा दृश्य परम भीषण था, जैसे हो आकाश फटा।
और आग ही आग भयंकर, मुख से अपने उगल रहा।।58।।135

बढ़ते रहे वीर भारत के, करते विजयी जयकारे।
महाकाल को वंदन करते, वीर काल को ललकारे।
दुर्गम थल पर, रण करते, निज मातृभूमि के मान रखा।
कितने-कितने सिंहों ने, इसमें जीवन था आप तजा।।59।।136

झेल गोलियों की आँधी, वे ऊपर अब चढ़ आये थे।
देख दृश्य ये दुश्मन के सैनिक सारे घबराए थे।।
और लिए आँखों में ज्वाला, जब योधा रणधीर बढ़े।
एक नया इतिहास बनाने, विकट गिरि पर वीर चढ़े।।

कुछ घायल सिंहों ने मिलकर, महिष झुंड को त्रास दिया।
मुट्ठीभर भर वीरों ने, अरि के दल का सकल विनाश किया।।
भारत का ध्वज जब टाइगर हिल की चोटी पर चमका था।
पर्वत था सुंदर पहले अब और अधिक ही दमका था।।

ध्वज के तीन रंग ऐसे लगते थे, ज्यों नभ छाए हों।
तीन रंग के पुष्प देवदल ने निज हाथ लुटाए हों।।
नहीं तिरंगा केवल ध्वज ,ये आन-बान है भारत की।
हर दिल में रहने वाली, ये जान-शान है भारत की।।

इसको सम्बल दिए खड़े हैं, हाथ एक सौ तीस करोड़।
इतनी इसमें ताकत है, जिसका न कोई है ओर छोर।।
इस ध्वज के हित भारतवासी देते हर कुर्बानी हैं।
कितनी बार कही, गाई, इसकी तो अमर कहानी है।।

जो भी करना पड़े, असम्भव को भी सम्भव कर देंगे।
लेकिन उच्च तिरंगा प्यारा, कभी नहीं झुकने देंगे।।
नहीं तिरंगा ध्वज केवल, ये अपितु शीष हमारा है।
दिल में रहता साथ हमाई, सदा जान से प्यारा है।।

हम इसका कद ऊँचा करने में निज प्राण लुटाते हैं।
अगर ज़रूरत पड़ जाए, बाज़ी में जान लगाते हैं।।
जीते जी, जीते हैं बस इसकी सेवा हम कर पाएँ।
अंत समय आँखों इसको रखें, छाँह में मर जाएँ।।

हम तो मरकर इसी तिरंगे में लिपटे जाना चाहें।
केवल ये ही, सेवा के बदले में पा जाना चाहें।।
चाह नहीं कोई भी केवल, भारत ये आबाद रहे।
जननी फूले-फले, बाँटती अपना सदा प्रसाद रहे।।

यही निवेदन दाता से, हम गीत राष्ट्र के गा पाएँ।
उपने भारत की गाथाएँ दुनिया भर में पहुँचाएँ।।
देश प्रेम मेें भरे रहें, हम बस इसका ही ध्यान करें।
इसका ऊँचा नाम करें, कुछ ऐसे कर्म महान करें।।

जो माता का शीष सदा, हम उसको ऊपर रख पाएँ।
उसके निर्मल आशीषों से अमृत जय का चख पाएँ।।
जब तक जीवित रहें, सदा जय-जय भारत ही हम गाएँ।
इसकी रक्षा, सेवा में निज को भी भेंट चढ़ा पाएँ।।68।।145

इसी तरह इस रण का भी, पहले जैसा अंजाम हुआ।
दुश्मन लौटा पीठ दिखाकर, ताज हिन्द के नाम हुआ।।
भारत ने इस विजय हेतु कितने-कितने सुत वारे हैं।
जो भारत माता के प्यारे, और नयन के तारे हैं।।69।।146

वे हैं पूज्य हमारे उनको शीष झुकाएँ सदा-सदा।
जिनका है हम सब के ऊपर, कितना ये उपकार बड़ा।।
अजर-अमर सुत बलिदानी, भारत के सिंह निराले थे।
जो अँधियारी रातों में, जग-मग दीपक उजियाले थे।।70।।147

श्री विक्रम बत्रा, योगेंदर सिंह यादव, संजय कुमार।
वीर अनुज नैय्यर, संग कैप्टन पांडे श्री मनोज कुमार।।
और न जाने परम वीर कितने इस रण में विदा हुए।
माँ के प्यारे पुत्र युद्ध में, जब उस से ही जुदा हुए।।71।।148

हहर उठी धरती की छाती, सीना काँपा अम्बर का।
चीख, अश्रुओं का, विलाप का, बह निकला जब सागर सा।।
निश्चय विजयी हुआ था भारत, दुर्गम रण विख्यात हुआ।
किन्तु जीत के हर्ष की जगह, दुःख देश में व्याप्त हुआ।।72।।149

देशवासियों ने नैनों से भागीरथी बहाई थी।
देख जिसे, भारत माता की आँख सजल हो आई थीं।।
खोकर अपने लाल युद्ध में माता बड़ी बिलखती थी।
रण की निकली ज्वाला से, जनता जल रही, सुलगती थी।।73।।150

सच है रण से होता है, उत्पन्न दुःख कितना भारी।
जनता रोती, रोता भारत, रोती मानवता सारी।।
भरे अश्रु अपने नयनों में, हम जब लगे सम्भलने थे।
राष्ट्र सशक्तिकरण हेतु, छोटे-छोटे पग चलने थे।।

कुछ दिन वैरी शांत रहा, अपने विनाश पर हाथ मले।
पर जिनकी दुम टेढ़ी हो, वो कैसे बात ज़रा समझे।।
उनको तो बस बात दण्ड की सिर्फ़ समझ में आती है।
उनके कर्मों पर मनुष्यता बार-बार, पछताती है।।

जब वैरी ने ये जाना, रण नहीं सामने का सम्भव।
भारत को रण में परास्त करना सर्वदा नहीं सम्भव।।
तब यों करके साँठ गाँठ षड्यंत्रों की नव नीति गढ़ी।
वैमनस्य फैलाने की कुत्सित-सी, काली चाल चली।।76।।153

तब रस्ता आतंकवाद का पुनः चुना, दुश्मन दल ने।
और नए ही रूप लिए, फिर वार किया उसके छल ने।।
अब छुपकर, लड़ने की गहरी चाल गई अपनाई थी।
भेस बदलकर भारतजन का, टुकड़ी भी पहुँचाई थी।।

जम्मू में, कश्मीर में, आतंकी कितने फैलाए थे।
और जलाने शांति व्यवस्था, बम ही बम बिछवाए थे।
कभी धमाका श्री रघुनाथ राम के घर में करवाया।
मंदिर को भक्तों समेत, बारूद में था तब नहलाया।।

बार-बार यों ज़हर उगलकर, घाटी को बेहाल किया।
आग लगाकर फूलों में, गुलशन को यूँ बदहाल किया।।
जहाँ हवाएँ बहती थीं, ख़ुशबू से सनी बहारों की।
अब थी उनमें गन्ध, जले बारूद, और हथियारों की।।79।।156

कभी वैष्णों देवी के मंदिर को लक्ष्य बनाया था।
अमरनाथ के जत्थे में, आतंकी दल पहुँचाया था।
उनकी कोशिश यही रही, विश्वास हमारा तोड़ सकें।
और आस्था के मंन्दिर प्राचीन उन्हें वो तोड़ सकें।।

पर हैं महामूढ़ वो इतनी बात समझ ना पाते हैं।
भारत की सेना में सैनिक नहीं सिंह ही आते हैं।।
एक-एक योद्धा भारत का सौ के जैसा होता है।
सवालाख से लड़ सकता है, ले प्राण हथेली सोता है।।

जिनके लोहू में उबाल, ऐसा है आँच लगे जिसकी।
कितनी अमर कथाएँ, बीते वर्ष बाँचते हैं जिसकी।।
हुआ पराजित शत्रु सदा भारत भू पर, निस्तेज हुआ।
लेकिन विजयी कभी न दुश्मन, उपने दल को भेज हुआ।

यही बताते हैं युग कितने, ये ही अमर कहानी है।
बच्चा-बच्चा पढ़ता ऐसी, बातें आप ज़बानी हैं।।83।।160

Wednesday, 23 January 2019

शौर्यगाथा भाग 03

।। शौर्यगाथा भाग 03 ।।

भारत पर बार-बार हुए हमले और आंतकवाद फैलाना।

वसुधा को मानें कुटुंब, हम कहते हैं परिवार इसे।
हर दम, देते रहना चाहें हम तो अपना प्यार इसे।।
हम सहेजने के अभ्यासी, सदा बचाना चाहते हैं।
द्वेष, द्रोह, अन्याय सभी को दूर हटाना चाहते हैं।।

हमने तो ग़ैरों को भी अपना ही माना सदा-सदा।
उनको भी अपने अंचल में, रक्षण देकर रखा सदा।।
वे चाहे जिस भी हिस्से से इस दुनिया के आए हों।
चाहे जितनी ठोकर सहकर भारत भू तक आए हों।।

हमने उनको अपनी धरती पर सम्मानित स्थान दिया।
आगे बढ़ने का उनको अवसर भी सदा प्रदान किया।।
हमने उनको अपना हिस्सा कहकर अपना मान लिया।
अपने वैभव में हिस्सा दे उनको वैभववान किया।।

अपनी परिपाटी सिखलाती है हमको ये सीख बड़ी।
अपने आदर्शों ने त्यागी देह, जगत की पीर हरी।।
एक प्रतापी महाराज थे नाम शिबि उनका उज्ज्वल।
करने शरणागत की रक्षा दान किया निज देह धवल।।

एक गाय का रक्षण करने में जो आगे थे आए।
दे कर अपनी देह सिंह को, प्रजाप्राण जो कहलाए।।
सूर्यवंश के परम प्रतापी रघु महाराज, हुए दानी।
सकल विश्व में ऐसे अद्भत दान का न कोई सानी।।

हम ऐसे ही आदर्शों को सदा शीष पर रखते हैं।
उनके पदचिह्नों पर चलने की ही कोशिश करते हैं।।
इसीलिए हमने यवनों को, मुग़लों को भी स्थान दिया।
अपनी धरती, नभ अपना, रहने को देश महान दिया।।

हम तो किसी देशपर भी न किञ्चित नज़र जमाते हैं।
हम इस से ही ख़ुश हैं के सब हँसते हैं, सब गाते हैं।।
लेकिन इस व्यवहार को अपने दुर्बलता माना जिन ने।
विश्व प्रेम का भाव कदाचित कायरता जाना जिन ने।। 7 ।।

ऐसी भूल बड़ी भारी कर हमपर शस्त्र उठाया था।
करने युद्ध, जीतने हमको का ही स्वप्न सजाया था।।
लेकिन उनकी युद्धकला भी छद्म छलों के जैसी है।
जैसे वो हैं, युद्धनीतियाँ भी बिल्कुल ही वैसी हैं।।

उनको बिगुल बजाकर लड़ना कभी समझ में न आया।
इसीलिए अपनी सेना को चुपके-चुपके पहुँचाया।।
भारत की सीमा को धोखा देकर हरदम पार किया।
ऊपर अच्छे बने रहे, भीतर-भीतर पर वार किया।।

ऐसा करने से सोचा वो हिला हिन्द को पाएँगे।
और सरलता से इतनी ये युद्ध जीत वो जाएँगे।।
पर उनका यह दिवास्वप्न तो बार-बार, नाकाम हुआ।
पैंसठ में, इकहत्तर में, हर बार यही अंजाम हुआ।।

हम भारत के वासी हैं, जो भेंट मिले वो लेते हैं।
लेकिन देनेवाले को, दुगना लौटा भी देते हैं।।
इसी तरह हमने दुगनी ताकत से उनपर वार किया।
धोखे की इस भेंट के बदले, लाशों के उपहार दिया।। 11 ।।

बार अनेकों यही कहानी गई यहाँ पर दोहराई।
फिर भी कपटी, कायर, को ये बात समझ में ना आई।।
बार-बार अपनी हरकत से बाज़ नहीं वो आए थे।
ये भी अटल सत्य है के हर बार पराजय पाए थे।।

अरे! शक्ति अपनी अपने जन के हित में जो लगवाते।
दुनिया में पहचान बनाने की कोशिश जो करवाते।।
तो ये हो भी सकता था, कुछ मान मिले, सम्मान मिले।
पर वो यही सोचते हैं, बैठे-बैठे बस दान मिले।।

अपने जन का पेट काटकर, धन रण के हित लाते हैं।
और विफल होकर रण में, फिर सीधे मुँह की खाते हैं।।
इसीलिए उनकी धरती पर, दीन हीन जन दिखते हैं।
जिनके स्वाभिमान बाज़ारों में, लगते हैं, बिकते हैं।। 14 ।।

बात कहें जो पैंसठ की जब पहली छिड़ी लड़ाई थी।
जब लड़ने सीमा पर दोनों सेना आगे आईं थी।।
था अगस्त का माह, पाँच तारीख़, वर्ष था पैंसठवाँ।
सदी बीसवीं बीत रही थी, रफ़्ता-रफ़्ता वक्त रवाँ।।

तभी योजना बद्ध रूप से, अरिसमूह चढ़ आया था।
अपनी सीमा लाँघ, हमारी सीमा में घुस आया था।।
चार-पाँच, दस-बीस नहीं, वो टुकड़ी तीस हज़ारी थी।
हथियारों से लैस बड़ी, जिसने कर रखी तयारी थी।।

छल करने को छद्म रूप, उस टुकड़ी ने अपनाया था।
भेस, काश्मीरी लोगों के जैसा सरल बनाया था।।
पर जब भारत की सेना को भान हुआ, इस हलचल का।
कर प्रहार था तोड़ दिया विश्वास, शत्रु के दलबल का।। 17 ।।

हमलों के उत्तर में हमले, रुक-रुक के कई बार चले।
वार के बदले वार कई, क्रमबद्ध सिलसिलेवार चले।।
उधर इसी के बाद पड़ोसी सेना से यह काम किया।
आगे बढ़ने की कोशिश की, आगे को प्रस्थान किया।।

उनके ऊँचे दरबारों ने यह ललकार लगाई थी।
पहले अमृतसर, फिर दिल्ली पर ही नज़र जमाई थी।।
लेकिन रस्ते में ही खेमकरण के आगे युद्ध हुआ।
था जिसका परिणाम, शत्रु की आशा के विरुद्ध हुआ।।

अंधड़ सी जब भारतीय सेना दुश्मन पर टूट पड़ी।
जैसे बिजली आसमान से चमक-चमक हो छूट पड़ी।।
ऐसा हुआ प्रहार शत्रु दल में खलबली मची भारी।
सेना जो लड़ने आई थी, लगी लौटने ही सारी।। 20 ।।

लेकिन पाँव उखड़ने तक दुश्मन दल को ये त्रास हुआ।
लगभग चार हज़ार सैनिकों का उनके भी ह्रास हुआ।।
इसी तरह जब युद्ध मध्य में आ पहुँचा, जब थमा रहा।
फिर भी पलड़ा युद्ध भूमि में ओर हिन्द की झुका रहा।।

पर तब बीच बचाव किया संयुक्त राष्ट्र ने ख़ुद आकर।
और किया पारित समझौता युद्ध अंत तक पहुँचाकर।।
सीमा दोनों देशों की जितनी थी उतनी बनी रही।
पर ये विजय कथा भारत के शुभ्र भाल पर सजी रही।। 22 ।। 100
(100 छंद पूरे)..…

ये रण था दुश्मन दल का भारत को क्षति पहुँचाने का।
भारत का सरताज, स्वर्ग-सा काश्मीर हथियाने का।।
लेकिन जो है मान हमारा वो कैसे जाने देते।
ऐसे कैसे दुश्मन को कश्मीर छीन जाने देते।। 23 ।।

हमने सिद्ध किया जो माँगे दूध ,खीर ही देते हैं।
पर छीने कश्मीर तो दुश्मन दल को चीर भी देते हैं।।
जो है ताज भारती का ,उसको न कभी जाने देंगे।
सदियों तक भी युद्ध चले, कश्मीर न हथियाने देंगे।। 24 ।।

ख़ैर हुआ जो बात गई, हम आगे बढ़ते रहते हैं।
अपने संघर्षों की गाथा, नहीं किसी से कहते हैं।।
पीकर विष का घूँट रह गया, दुश्मन ने ये वार सहा।
हम भी बने उदार, बाद इसके उस से कुछ नहीं कहा।। 25 ।।

पर इतिहास स्वयं को दोहराता ये बात पुरानी है।
एक बार फिर समय शुरू करता ज्यों वही कहानी है।।
बहुत हुए बदलाव देश में, और तरक्की हमने की।
आगे बढ़ने, उन्नति करने की पगडंडी पक्की की।। 26 ।।

वर्ष उन्नीस सौ इकहत्तर, जब आधा बीत चुका ही था।
पर भारत के पूर्व खण्ड में जैसे समय रुका ही था।।
बंग वासियों और पड़ोसी नेताओं में जंग छिड़ी।
कौन करेगा राज, राजनैतिक संकट की आई घड़ी।। 27 ।। 105

और साथ ही साथ युद्ध की पुनः तयारी भारी थी।
देश पड़ोसी ने झोंकी जितनी थी, शक्ति सारी थी।।
जल, थल, नभ से भारत पर करने आक्रमण बड़ा भारी।
कई सहस्त्रों की सेना, हथियारों सहित सजा डाली।। 28 ।।

फिर प्रयास कर अपनी सेना भारत में पहुँचाई थी।
सीमा लंघन करने की तकनीक वही अपनाई थी।।
पर इस बार दया थोड़ी भी हिन्द ने न दिखलाई थी।
भारत ने बदले में अपनी सेना विकट सजाई थी।। 29 ।। 107

जिसका लक्ष्य यही था दुश्मन सेना सकल विनष्ट करे।
मारे इक-इक वैरी को, ज्यों महाकाल को तुष्ट करे।।
उसपर ले आदेश इंदिरा जी, का विज्योतकर्ष भरा।
सेनानायक सैम बहादुर ने सेना का व्यूह रचा।।

अपने नौजवान वीरों को युद्ध हेतु तैयार किया।
मृत्युंजय वीरों को जय के हेतु यही संदेश दिया।।
जाओ रण में विजय पताका, भारत की तुम लहराओ।
ऐसा युद्ध करो जिससे निज नाम अमर तुम कर जाओ।।

अलग-अलग कितने स्थानों पर दुर्दम रण कई बार हुआ।
हर थल पर ही शत्रु समूहों का कम भू से भार हुआ।।
कितने ही थल ऐसे थे ,थे जहाँ बड़ा अनुपात विकट।
दुश्मन थे लाखों में, भारत सेना के कुछ सौ ही भट।। 32 ।। 110

ऐसी ही थी हुई लड़ाई, रेगिस्तानी धरती पर।
लोंगेवाला सीमा पे, तोपें गरजीं, ऊँचे स्वर पर।।
रातों-रात शत्रु की सेना, सीमा में घुस आईं थी।
बनकर चक्रवात रेतीला, दसों दिशा में छाईं थी।। 33 ।। 111

सिंह एक सौ बीस हिन्द के, दुश्मन सैनिक दो हज़ार।
जैसे लड़ने को नदिया से ,उमड़ पड़ा सागर अपार।।
दुश्मन के थी पास अनेकों तोपें, नूतन कवाचयान।
सेना लैस खड़ी लेकर सब युद्ध विजयी साजो सामान।।

बोलो कब महिषों का दल, दल सकता सिंहों का समूह।
इतने सैनिक बल के होते भी, विजय बनी दुष्कर, दुरूह।।
जब चली गोलियाँ भारत से, बंदूकों ने लावा उगला।
बस एक तोप के गर्जन से, सारा अरिदल इतना दहला।।

मच गया युद्ध में कोलाहल, दुश्मन की छाती हहर उठी।
ऐसा रण खेला वीरों ने, साहस की ऐसी लहर उठी।।
पल-पल भरते ज्यों आसमान को ,बोले भारत माँ की जय।
अरिदल को पीछे यों धकेल कर, बढ़ने लगे वीर निर्भय।।

है अजर-अमर इतिहास विजय का, सिद्ध किया ये भारत ने।
हैं शेर, शेर ही, चाहे कितने अन्य पशु हों कानन में।।
सिंहों ने अपने कौतुक से कर दिया, शत्रुदल छिन्न-भिन्न।
भागे-भागे फिर रहे, बचे जो, जान बचाने लगे खिन्न।।

इस तरह रौंद डाला सबको, जैसे गज तोड़े पुष्प बाग।
सेना का सागर सूख गया, जब जागी अद्भत, प्रबल आग।।
सब अस्त्र, शस्त्र पाकर खण्डित, रिपुओं में हाहाकार मची।
भागो सब अपने प्राण बचाओ, रण में यही पुकार उठी।।

फिर जब दिनकर नभ में आए, जब पहली सूर्य किरण निकली।
तब नभ को भेद वायुसेना, अरिदल पर काल बनी, टूटी।।
भीतर जाकर ही नष्ट किया, सब तोड़ दिए उनके बंकर।
नीचे थी काल समान फौज, ऊपर थे मौत बने हंटर।।

इस तरह मचाया महायुद्ध, सेना ने लूट लिया मंज़र।
जिसके नायक थे वीरोत्तम, श्री कुलदीप सिंह मेजर।।
रिपुदल जब लगा लौटने तब, फिर एक नया इतिहास हुआ।
जो शरण में आया जीवित था, जो लड़ा काल का ग्रास हुआ।।

जब टूटा अरि का सारा बल, जब देखा था उसने दर्पण।
तब सेना संग ले अस्त्र-शस्त्र कर दिया, हिन्द को सब अर्पण।।
ये सबसे बड़ा समर्पण था, जो दुनिया में इतिहास बना।
नब्बे हज़ार की सेना को, जो सिद्ध सत्य में त्रास हुआ।।

जो फूले-फूले फिरते थे, अब उनको धूल चटाई थी।
हमको कमज़ोर समझकर लड़ने की शिक्षा ये पाई थी।।
क्या कहूँ आज भी सोचो तो सीना चौड़ा हो जाता है।
सन इकहत्तर का युद्ध बड़ा भीषण जब याद वो आता है।।43।। 120

युद्ध हुआ जब पूर्ण, युद्ध बन्दी हमने सब छोड़ दिये।
फिर भी हमने नहीं पड़ोसी से बन्धन थे तोड़ दिए।।
हम फिर अपने पथ पर चलने लगे ध्यान जनता का धर।
और नए सन्धानों में रत रहे, प्रगति के रस्ते पर।।

हमने खेल, चिकित्सा में नित नूतन पाए कीर्तिमान।
विज्ञान, सूचना की तकनीकों में उज्ज्वल निज किया नाम।।
हमने अपनी अर्थव्यवस्था बेहतर और बनाई थी।
धरती ही क्या अंतरिक्ष में अपनी पकड़ जमाई थी।।45।। 122

धीरे-धीरे , नया रूप भारत का जग ने जाना था।
नए अनोखे कामों के कारण हमको पहचान था।।।
हमने कर्म किया उसके पश्चात जगह ये पाई थी।
देख तरक्की बच्चों की भारत माता मुसकाई थी।।

सबकुछ अच्छा था, सुख की थी लहर सुहानी फैल रही।
शांति, खुशी ,हर आँगन में ले हाथ, हाथ में खेल रहीं।।
वर्ष आख़री बीत रहा था, सदी भड़कने वाली थी।
ओर सोचा था नहीं, घड़ी ये सबको खलने वाली है।।

साल उन्नीस सौ निन्यानवे, जब आधा गुज़र गया ही था।
आधा बाकी बचा, और वो जैसे ठहर गया ही था।।
दुश्मन से फिर नहीं गया देखा ख़ुशहाल रहे भारत।
अपने पैरों पर दौड़े, यूँ सफ़ल, बहाल रहे भारत।।48।।125

फूलों की वादी में जो बस, आग लगाने चाहते थे।
ख़ुशियों की बगिया भारत की सिर्फ़ जलाना चाहते थे।।
अबकी बार निशाने पर उनके वो स्वर्ग का टुकड़ा था।
काश्मीर के करगिल को, इस बार शत्रु ने जकड़ा था।।

फिर घुसपैठी धीरे-धीरे सीमा लाँघ चुके ही थे।
हथियारों के साथ युद्ध की मन में ठान चुके ही थे।।
बुद्ध मठों की धरती पर अब आ पहुँचे आतंकी थे।
जाल बिछाए बैठे थे, छल में प्रवीण षड्यंत्री थे।।

भारत को जब ख़बर लगी, दुश्मन सेना के आने की।
बिना लगाए देर, फौज ने ठानी, सबक सिखाने की।।
लेकर संग वायुसेना के, घोर बड़ा था वार किया।
शक्ति लगाई पूरी, रण में दुर्दम बड़ा प्रहार किया।।

ये अब तक सबसे मुश्किल लेकिन हुई लड़ाई थी।
जिसमें दुश्मन सेना ने ऊपर से ताक लगाई थी।।
दुश्मन साढ़े तीन मील की ऊंचाई पर जमे रहे।
उनके सब हथियार हिन्द के वीरों पर ही तने रहे।।

बड़ी चुनौती ये कराल थी, भारत के सेना के सर।
लेकिन फिर भी निर्भय थे सब, नहीं किसी को कोई डर।।
ये गुण है अपनी सेना का, रण में जब पग धरते हैं।।
चाहे काल खड़ा सम्मुख हो, वे न तनिक भी डरते हैं।।

अपने शौर्य, वीरता को ही सदा प्रदर्शित करते हैं।
लाज रखे भारत माता की, घोर युद्ध वे करते हैं।।
ये इतना आसान नहीं था पर, जब वीर चले आगे।
देख हौसला उन वीरों दुश्मन भी मन में काँपे।।54।।131