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Sunday, 27 January 2019

शौर्यगाथा भाग 04

शौर्यगाथा भाग 04:

26/11 का हमला और आतंकी घटनाएँ।

जैसे नाग विषैला हमला ठहर-ठहर कर करता है।
धीरे-धीरे ज़हर सघन अपने शिकार में भरता है।।
जिससे धीमे-धीमे उसकी साँस उखड़ती जाती है।
विष के विकट असर से, धड़कन धीमी पड़ती जाती है।।84।।161

पहले हमला वो शिकार की आत्मशक्ति पे करता है।
वो मर ही जाता है, अपने दुश्मन से जो डरता है।।
इसका ही आधार बना अब दिशा शत्रु ने बदली थी।
छुपकर हमला अलग जगह पे करना चाल ये अगली थी।।85।।162

अब हमला था अर्थकेन्द्र पर, था व्यवसाय जहाँ पसरा।
महाराष्ट्र का शहर जहाँ निर्माण चल रहा था तगड़ा।।
अब था उनका लक्ष्य मुम्बई की रफ़्तार ज़रा तोड़ें।
बढ़ते कदम तरक्की के रोकें उनको, पीछे मोड़ें।।86।।163

अब हमला था छह स्थानों पर, हुआ अचानक शाम ढले।
गोली, बम, बारूद एक संग, लगातार कई बार चले।।
लोगों में अफ़रा-तफ़री मच गई अचानक भारी थी।
सर्वनाश करने की, आतंकी दल की तैयारी थी।।87।।164

ओबरॉय संग ताज में फैले दहशत गर्दी पहरे थे।
भारत के सम्मानित जो मेहमान, विदेशी ठहरे थे।
भीतर घुसकर उनको बंदूकें अपनी दिखलाईं थी।
और देश की इज़्ज़त पर, तलवारों की परछाई थी।।88।।165

शांति पूर्ण उस शहर ने देखा क्या क्या फिर उस रात नहीं।
आतंकी सर चढ़ बोले थे, जिनकी कोई बिसात नहीं।।
दशा हमारी पर हँसते थे, जिनकी कुछ औकात नहीं।
यही सोच मन में ख़ुश थे, वो कभी पाएँगे मात नहीं।।89।।166

हाँ कुछ देर हुआ तांडव आतंक और भय का भारी।
कई रहर तक, जनता भारत की भटकी मारी-मारी।।
पर कुछ देर बाद जब आए योधा करके तैयारी।
तब हिम्मत आतंकवादियों की तो निकल गई सारी।।90।।167

अंदर जाकर मारा था, सेना ने नाश-विनाश किया।
नहीं एक भी बच पाया, चाहे जो आस-प्रयास किया।।
ढूँढ-ढूँढकर आतंकी कीड़ों के जैसे मारे थे।
जो निर्मम, निर्दयी, तथा निर्दोषों के हत्यारे थे।।91।।168

अपनी जान लगा बाज़ी पर, वीर अनेकों आए थे।
आतंकी दल पर बनकर वे मेघ काल के छाए थे।।
मेजर श्री संदीप उन्नीकृष्णन, भी योधा भीषण थे।
रहकर निपट अकेले ही, अरिमारण में वे सक्षम थे।।92।।169

अपने त्यागे प्राण नहीं पर छोड़ा दुश्मन को जीता।
कई प्रहर के बाद लड़ाई थमी, समय जब कुछ बीता।।
वीर अनेकों बलिवेदी पर चढ़ कितने हर्षाए थे।
शिंदे, तुकाराम, सालसकर सभी वीर गति पाए थे।।93।।170

श्री अशोक कामटे, और हेमंत करकरे बलिदानी।
प्राण चढ़ाकर मातृभूमि को, बने वीरता के मानी।।
जब-जब भारत ने माँगे, भर-भर कर हमने शीष दिए।
मातृभूमि में मर जाएँ, बस ऐसे ही आशीष लिए।।94।।171

विजय कथा इन वीरों को सदियों तक गाई जाएगी।
इनके उज्ज्वल नामों से, धरती भी गौरव पाएगी।।95।।172
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ये था दाग बड़ा गहरा, दो हज़ार आठ के नाम हुआ।
दुश्मन हारे, गए मृत्यु की गोद यही अंजाम हुआ।।
आतंकी घटनाएँ फिर भी, चलती बा-दस्तूर रहीं।
जिनके फल स्वरूप, जनता रोती, व्याकुल, मजबूर रही।।96।।173

फूलों की घाटी, में फैला बस आतंकी साया था।
जिसके कृत्यों ने जनता को रह-रहकर तड़पाया था।।
सेना भी मुस्तैदी से पहरा अपना बिछवाए थी।
आतंकी के शीष छेदने, के हित ताक लगाए थी।।97/174

घंटों, दिनों, महीनों तक, पर्वत बनकर वे खड़े रहे।
चट्टानों की तरह हौसले, जिनके अविचल, अड़े रहे।।
जहाँ हड्डियाँ गल जाएँ कुछ बर्फ़ इस तरह पड़ती है।
जहाँ साँस ले लेने में भी जान लगानी पड़ती है।।98/175

जहाँ शून्य से नीचे पारा, दौड़ा-दौड़ा जाता है।
जहाँ सिवाए हिम के, कुछ भी और नज़र न आता है।।
जहाँ बर्फ़ ही है ज़मीन, है बर्फ़ चादरें बन जाती।
दीवारें ही कई फ़ीट की, बर्फ़ की ठंडी बन जाती।।99/176

जहाँ पशु भी नहीं दीखते, दुबक भाग जो जाते हैं।
वृक्ष ही केवल जहाँ खड़े रह पाते हैं, लहराते हैं।।
जहाँ आदमी का रहना भी कितना दुष्कर, लगता है।
भारतीय सेना के वीरों को वो घर ही लगता है।।100/177

देशवासियों के हित वे सर्वस्व त्यागते हैं अपना।
हर मौसम में अडिग खड़े, वे धर्म धारते हैं अपना।।
चाहे गर्म थपेड़े हों वे, रेगिस्तानी अंचल के।
रेतीला सागर हो चाहे, कुंड रेत के दल-दल के।।101/178

या, बारिश हो प्रलयंकारी, अंधड़, झंझावात प्रबल।
भारत के सुत खड़े सदा ही , रक्षण के हित सज्ज, सबल।।
कोई ऐसी नहीं आपदा जो इनका साहस तोड़े।
इनको विचलित करे तनिक, दृढ़ निश्चय अटल तनिक तोड़े।।102/179

ये सेना के वीर देश की सेवा में डूबे रहते।
गर्मी, बारिश, बर्फ़ महाभीषण सब कुछ सीधे सहते।।।
छोड़ घरों को, मरुथल में जो, ख़ुश होकर ही आते हैं।
कष्ट भरा जीवन जो अपनी इच्छा से अपनाते हैं।।103/180

सदा जान को लिए हथेली, हर मुश्किल में जाते हैं।
और ज़रूरत हो तो, सिर को भी अर्पण कर आते हैं।।
इनको बस है ये जुनून, भारत माता आज़ाद रहे।
इसका धानी आँचल है, जो लाहराता आबाद रहे।।104/181

देश जलाए ख़ुशियों के दीपक, दीवाली ख़ूब मने।
होली में मस्ती की लहरें चलें, मिठाई ख़ूब बने।।
वे इतनी आशा मन में ले वर्दी धारण करते हैं।
अपने जीवन को बलि, जन-गण के ही कारण करते हैं।।105/182

उनका हमपर कितना है उपकार नहीं कुछ कह सकते।
सच है उनके बिना नहीं आज़ाद तनिक हम रह सकते।।
ऐसे सिंह सपूतों से ही भारत का है नाम बड़ा।
इनके कारण रहे तिरंगा, सदा गर्व से भरा-भरा।।106/183

दुश्मन भी यों देख इसे मन में अपने कतराता है।
भारत को आबाद देख, मन ही मन जलता जाता है।
जलन मिटाने भारत पे हमले, नित नए कराता है।
इसे कष्ट पहुँचाने के, नूतन संकल्प सजाता है।।107/184

जब दिन में लड़कर ना जीता, तब रातों में वार किया।
अंधेरे का लाभ उठाकर, धोखा दिया, प्रहार किया।।
पर अंधेरा सदा पराजित हुआ, ज्योति से, ज्वाला से।
जैसे अमृत सदा श्रेष्ठ ही रहता, विष से, हाला से।।108/185

भारत अमृतपुत्रों की धरती, वीरों की जननी है।
अतः शत्रु के मन की बातें, कभी न होनी, बननी हैं।।
हुआ पराजित बार-बार यों, टूटा बल उसका सारा।
पर वो तो जैसे विष से भरा, नाग कितना काला।।109/186

वो डसने की काकचेष्टा कभी नहीं पर छोड़ेगा।
विष काला वीरों के ऊपर, सदा-सदा ही छोड़ेगा।।110/187

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