।। शौर्यगाथा भाग 03 ।।
भारत पर बार-बार हुए हमले और आंतकवाद फैलाना।
वसुधा को मानें कुटुंब, हम कहते हैं परिवार इसे।
हर दम, देते रहना चाहें हम तो अपना प्यार इसे।।
हम सहेजने के अभ्यासी, सदा बचाना चाहते हैं।
द्वेष, द्रोह, अन्याय सभी को दूर हटाना चाहते हैं।।
हमने तो ग़ैरों को भी अपना ही माना सदा-सदा।
उनको भी अपने अंचल में, रक्षण देकर रखा सदा।।
वे चाहे जिस भी हिस्से से इस दुनिया के आए हों।
चाहे जितनी ठोकर सहकर भारत भू तक आए हों।।
हमने उनको अपनी धरती पर सम्मानित स्थान दिया।
आगे बढ़ने का उनको अवसर भी सदा प्रदान किया।।
हमने उनको अपना हिस्सा कहकर अपना मान लिया।
अपने वैभव में हिस्सा दे उनको वैभववान किया।।
अपनी परिपाटी सिखलाती है हमको ये सीख बड़ी।
अपने आदर्शों ने त्यागी देह, जगत की पीर हरी।।
एक प्रतापी महाराज थे नाम शिबि उनका उज्ज्वल।
करने शरणागत की रक्षा दान किया निज देह धवल।।
एक गाय का रक्षण करने में जो आगे थे आए।
दे कर अपनी देह सिंह को, प्रजाप्राण जो कहलाए।।
सूर्यवंश के परम प्रतापी रघु महाराज, हुए दानी।
सकल विश्व में ऐसे अद्भत दान का न कोई सानी।।
हम ऐसे ही आदर्शों को सदा शीष पर रखते हैं।
उनके पदचिह्नों पर चलने की ही कोशिश करते हैं।।
इसीलिए हमने यवनों को, मुग़लों को भी स्थान दिया।
अपनी धरती, नभ अपना, रहने को देश महान दिया।।
हम तो किसी देशपर भी न किञ्चित नज़र जमाते हैं।
हम इस से ही ख़ुश हैं के सब हँसते हैं, सब गाते हैं।।
लेकिन इस व्यवहार को अपने दुर्बलता माना जिन ने।
विश्व प्रेम का भाव कदाचित कायरता जाना जिन ने।। 7 ।।
ऐसी भूल बड़ी भारी कर हमपर शस्त्र उठाया था।
करने युद्ध, जीतने हमको का ही स्वप्न सजाया था।।
लेकिन उनकी युद्धकला भी छद्म छलों के जैसी है।
जैसे वो हैं, युद्धनीतियाँ भी बिल्कुल ही वैसी हैं।।
उनको बिगुल बजाकर लड़ना कभी समझ में न आया।
इसीलिए अपनी सेना को चुपके-चुपके पहुँचाया।।
भारत की सीमा को धोखा देकर हरदम पार किया।
ऊपर अच्छे बने रहे, भीतर-भीतर पर वार किया।।
ऐसा करने से सोचा वो हिला हिन्द को पाएँगे।
और सरलता से इतनी ये युद्ध जीत वो जाएँगे।।
पर उनका यह दिवास्वप्न तो बार-बार, नाकाम हुआ।
पैंसठ में, इकहत्तर में, हर बार यही अंजाम हुआ।।
हम भारत के वासी हैं, जो भेंट मिले वो लेते हैं।
लेकिन देनेवाले को, दुगना लौटा भी देते हैं।।
इसी तरह हमने दुगनी ताकत से उनपर वार किया।
धोखे की इस भेंट के बदले, लाशों के उपहार दिया।। 11 ।।
बार अनेकों यही कहानी गई यहाँ पर दोहराई।
फिर भी कपटी, कायर, को ये बात समझ में ना आई।।
बार-बार अपनी हरकत से बाज़ नहीं वो आए थे।
ये भी अटल सत्य है के हर बार पराजय पाए थे।।
अरे! शक्ति अपनी अपने जन के हित में जो लगवाते।
दुनिया में पहचान बनाने की कोशिश जो करवाते।।
तो ये हो भी सकता था, कुछ मान मिले, सम्मान मिले।
पर वो यही सोचते हैं, बैठे-बैठे बस दान मिले।।
अपने जन का पेट काटकर, धन रण के हित लाते हैं।
और विफल होकर रण में, फिर सीधे मुँह की खाते हैं।।
इसीलिए उनकी धरती पर, दीन हीन जन दिखते हैं।
जिनके स्वाभिमान बाज़ारों में, लगते हैं, बिकते हैं।। 14 ।।
बात कहें जो पैंसठ की जब पहली छिड़ी लड़ाई थी।
जब लड़ने सीमा पर दोनों सेना आगे आईं थी।।
था अगस्त का माह, पाँच तारीख़, वर्ष था पैंसठवाँ।
सदी बीसवीं बीत रही थी, रफ़्ता-रफ़्ता वक्त रवाँ।।
तभी योजना बद्ध रूप से, अरिसमूह चढ़ आया था।
अपनी सीमा लाँघ, हमारी सीमा में घुस आया था।।
चार-पाँच, दस-बीस नहीं, वो टुकड़ी तीस हज़ारी थी।
हथियारों से लैस बड़ी, जिसने कर रखी तयारी थी।।
छल करने को छद्म रूप, उस टुकड़ी ने अपनाया था।
भेस, काश्मीरी लोगों के जैसा सरल बनाया था।।
पर जब भारत की सेना को भान हुआ, इस हलचल का।
कर प्रहार था तोड़ दिया विश्वास, शत्रु के दलबल का।। 17 ।।
हमलों के उत्तर में हमले, रुक-रुक के कई बार चले।
वार के बदले वार कई, क्रमबद्ध सिलसिलेवार चले।।
उधर इसी के बाद पड़ोसी सेना से यह काम किया।
आगे बढ़ने की कोशिश की, आगे को प्रस्थान किया।।
उनके ऊँचे दरबारों ने यह ललकार लगाई थी।
पहले अमृतसर, फिर दिल्ली पर ही नज़र जमाई थी।।
लेकिन रस्ते में ही खेमकरण के आगे युद्ध हुआ।
था जिसका परिणाम, शत्रु की आशा के विरुद्ध हुआ।।
अंधड़ सी जब भारतीय सेना दुश्मन पर टूट पड़ी।
जैसे बिजली आसमान से चमक-चमक हो छूट पड़ी।।
ऐसा हुआ प्रहार शत्रु दल में खलबली मची भारी।
सेना जो लड़ने आई थी, लगी लौटने ही सारी।। 20 ।।
लेकिन पाँव उखड़ने तक दुश्मन दल को ये त्रास हुआ।
लगभग चार हज़ार सैनिकों का उनके भी ह्रास हुआ।।
इसी तरह जब युद्ध मध्य में आ पहुँचा, जब थमा रहा।
फिर भी पलड़ा युद्ध भूमि में ओर हिन्द की झुका रहा।।
पर तब बीच बचाव किया संयुक्त राष्ट्र ने ख़ुद आकर।
और किया पारित समझौता युद्ध अंत तक पहुँचाकर।।
सीमा दोनों देशों की जितनी थी उतनी बनी रही।
पर ये विजय कथा भारत के शुभ्र भाल पर सजी रही।। 22 ।। 100
(100 छंद पूरे)..…
ये रण था दुश्मन दल का भारत को क्षति पहुँचाने का।
भारत का सरताज, स्वर्ग-सा काश्मीर हथियाने का।।
लेकिन जो है मान हमारा वो कैसे जाने देते।
ऐसे कैसे दुश्मन को कश्मीर छीन जाने देते।। 23 ।।
हमने सिद्ध किया जो माँगे दूध ,खीर ही देते हैं।
पर छीने कश्मीर तो दुश्मन दल को चीर भी देते हैं।।
जो है ताज भारती का ,उसको न कभी जाने देंगे।
सदियों तक भी युद्ध चले, कश्मीर न हथियाने देंगे।। 24 ।।
ख़ैर हुआ जो बात गई, हम आगे बढ़ते रहते हैं।
अपने संघर्षों की गाथा, नहीं किसी से कहते हैं।।
पीकर विष का घूँट रह गया, दुश्मन ने ये वार सहा।
हम भी बने उदार, बाद इसके उस से कुछ नहीं कहा।। 25 ।।
पर इतिहास स्वयं को दोहराता ये बात पुरानी है।
एक बार फिर समय शुरू करता ज्यों वही कहानी है।।
बहुत हुए बदलाव देश में, और तरक्की हमने की।
आगे बढ़ने, उन्नति करने की पगडंडी पक्की की।। 26 ।।
वर्ष उन्नीस सौ इकहत्तर, जब आधा बीत चुका ही था।
पर भारत के पूर्व खण्ड में जैसे समय रुका ही था।।
बंग वासियों और पड़ोसी नेताओं में जंग छिड़ी।
कौन करेगा राज, राजनैतिक संकट की आई घड़ी।। 27 ।। 105
और साथ ही साथ युद्ध की पुनः तयारी भारी थी।
देश पड़ोसी ने झोंकी जितनी थी, शक्ति सारी थी।।
जल, थल, नभ से भारत पर करने आक्रमण बड़ा भारी।
कई सहस्त्रों की सेना, हथियारों सहित सजा डाली।। 28 ।।
फिर प्रयास कर अपनी सेना भारत में पहुँचाई थी।
सीमा लंघन करने की तकनीक वही अपनाई थी।।
पर इस बार दया थोड़ी भी हिन्द ने न दिखलाई थी।
भारत ने बदले में अपनी सेना विकट सजाई थी।। 29 ।। 107
जिसका लक्ष्य यही था दुश्मन सेना सकल विनष्ट करे।
मारे इक-इक वैरी को, ज्यों महाकाल को तुष्ट करे।।
उसपर ले आदेश इंदिरा जी, का विज्योतकर्ष भरा।
सेनानायक सैम बहादुर ने सेना का व्यूह रचा।।
अपने नौजवान वीरों को युद्ध हेतु तैयार किया।
मृत्युंजय वीरों को जय के हेतु यही संदेश दिया।।
जाओ रण में विजय पताका, भारत की तुम लहराओ।
ऐसा युद्ध करो जिससे निज नाम अमर तुम कर जाओ।।
अलग-अलग कितने स्थानों पर दुर्दम रण कई बार हुआ।
हर थल पर ही शत्रु समूहों का कम भू से भार हुआ।।
कितने ही थल ऐसे थे ,थे जहाँ बड़ा अनुपात विकट।
दुश्मन थे लाखों में, भारत सेना के कुछ सौ ही भट।। 32 ।। 110
ऐसी ही थी हुई लड़ाई, रेगिस्तानी धरती पर।
लोंगेवाला सीमा पे, तोपें गरजीं, ऊँचे स्वर पर।।
रातों-रात शत्रु की सेना, सीमा में घुस आईं थी।
बनकर चक्रवात रेतीला, दसों दिशा में छाईं थी।। 33 ।। 111
सिंह एक सौ बीस हिन्द के, दुश्मन सैनिक दो हज़ार।
जैसे लड़ने को नदिया से ,उमड़ पड़ा सागर अपार।।
दुश्मन के थी पास अनेकों तोपें, नूतन कवाचयान।
सेना लैस खड़ी लेकर सब युद्ध विजयी साजो सामान।।
बोलो कब महिषों का दल, दल सकता सिंहों का समूह।
इतने सैनिक बल के होते भी, विजय बनी दुष्कर, दुरूह।।
जब चली गोलियाँ भारत से, बंदूकों ने लावा उगला।
बस एक तोप के गर्जन से, सारा अरिदल इतना दहला।।
मच गया युद्ध में कोलाहल, दुश्मन की छाती हहर उठी।
ऐसा रण खेला वीरों ने, साहस की ऐसी लहर उठी।।
पल-पल भरते ज्यों आसमान को ,बोले भारत माँ की जय।
अरिदल को पीछे यों धकेल कर, बढ़ने लगे वीर निर्भय।।
है अजर-अमर इतिहास विजय का, सिद्ध किया ये भारत ने।
हैं शेर, शेर ही, चाहे कितने अन्य पशु हों कानन में।।
सिंहों ने अपने कौतुक से कर दिया, शत्रुदल छिन्न-भिन्न।
भागे-भागे फिर रहे, बचे जो, जान बचाने लगे खिन्न।।
इस तरह रौंद डाला सबको, जैसे गज तोड़े पुष्प बाग।
सेना का सागर सूख गया, जब जागी अद्भत, प्रबल आग।।
सब अस्त्र, शस्त्र पाकर खण्डित, रिपुओं में हाहाकार मची।
भागो सब अपने प्राण बचाओ, रण में यही पुकार उठी।।
फिर जब दिनकर नभ में आए, जब पहली सूर्य किरण निकली।
तब नभ को भेद वायुसेना, अरिदल पर काल बनी, टूटी।।
भीतर जाकर ही नष्ट किया, सब तोड़ दिए उनके बंकर।
नीचे थी काल समान फौज, ऊपर थे मौत बने हंटर।।
इस तरह मचाया महायुद्ध, सेना ने लूट लिया मंज़र।
जिसके नायक थे वीरोत्तम, श्री कुलदीप सिंह मेजर।।
रिपुदल जब लगा लौटने तब, फिर एक नया इतिहास हुआ।
जो शरण में आया जीवित था, जो लड़ा काल का ग्रास हुआ।।
जब टूटा अरि का सारा बल, जब देखा था उसने दर्पण।
तब सेना संग ले अस्त्र-शस्त्र कर दिया, हिन्द को सब अर्पण।।
ये सबसे बड़ा समर्पण था, जो दुनिया में इतिहास बना।
नब्बे हज़ार की सेना को, जो सिद्ध सत्य में त्रास हुआ।।
जो फूले-फूले फिरते थे, अब उनको धूल चटाई थी।
हमको कमज़ोर समझकर लड़ने की शिक्षा ये पाई थी।।
क्या कहूँ आज भी सोचो तो सीना चौड़ा हो जाता है।
सन इकहत्तर का युद्ध बड़ा भीषण जब याद वो आता है।।43।। 120
युद्ध हुआ जब पूर्ण, युद्ध बन्दी हमने सब छोड़ दिये।
फिर भी हमने नहीं पड़ोसी से बन्धन थे तोड़ दिए।।
हम फिर अपने पथ पर चलने लगे ध्यान जनता का धर।
और नए सन्धानों में रत रहे, प्रगति के रस्ते पर।।
हमने खेल, चिकित्सा में नित नूतन पाए कीर्तिमान।
विज्ञान, सूचना की तकनीकों में उज्ज्वल निज किया नाम।।
हमने अपनी अर्थव्यवस्था बेहतर और बनाई थी।
धरती ही क्या अंतरिक्ष में अपनी पकड़ जमाई थी।।45।। 122
धीरे-धीरे , नया रूप भारत का जग ने जाना था।
नए अनोखे कामों के कारण हमको पहचान था।।।
हमने कर्म किया उसके पश्चात जगह ये पाई थी।
देख तरक्की बच्चों की भारत माता मुसकाई थी।।
सबकुछ अच्छा था, सुख की थी लहर सुहानी फैल रही।
शांति, खुशी ,हर आँगन में ले हाथ, हाथ में खेल रहीं।।
वर्ष आख़री बीत रहा था, सदी भड़कने वाली थी।
ओर सोचा था नहीं, घड़ी ये सबको खलने वाली है।।
साल उन्नीस सौ निन्यानवे, जब आधा गुज़र गया ही था।
आधा बाकी बचा, और वो जैसे ठहर गया ही था।।
दुश्मन से फिर नहीं गया देखा ख़ुशहाल रहे भारत।
अपने पैरों पर दौड़े, यूँ सफ़ल, बहाल रहे भारत।।48।।125
फूलों की वादी में जो बस, आग लगाने चाहते थे।
ख़ुशियों की बगिया भारत की सिर्फ़ जलाना चाहते थे।।
अबकी बार निशाने पर उनके वो स्वर्ग का टुकड़ा था।
काश्मीर के करगिल को, इस बार शत्रु ने जकड़ा था।।
फिर घुसपैठी धीरे-धीरे सीमा लाँघ चुके ही थे।
हथियारों के साथ युद्ध की मन में ठान चुके ही थे।।
बुद्ध मठों की धरती पर अब आ पहुँचे आतंकी थे।
जाल बिछाए बैठे थे, छल में प्रवीण षड्यंत्री थे।।
भारत को जब ख़बर लगी, दुश्मन सेना के आने की।
बिना लगाए देर, फौज ने ठानी, सबक सिखाने की।।
लेकर संग वायुसेना के, घोर बड़ा था वार किया।
शक्ति लगाई पूरी, रण में दुर्दम बड़ा प्रहार किया।।
ये अब तक सबसे मुश्किल लेकिन हुई लड़ाई थी।
जिसमें दुश्मन सेना ने ऊपर से ताक लगाई थी।।
दुश्मन साढ़े तीन मील की ऊंचाई पर जमे रहे।
उनके सब हथियार हिन्द के वीरों पर ही तने रहे।।
बड़ी चुनौती ये कराल थी, भारत के सेना के सर।
लेकिन फिर भी निर्भय थे सब, नहीं किसी को कोई डर।।
ये गुण है अपनी सेना का, रण में जब पग धरते हैं।।
चाहे काल खड़ा सम्मुख हो, वे न तनिक भी डरते हैं।।
अपने शौर्य, वीरता को ही सदा प्रदर्शित करते हैं।
लाज रखे भारत माता की, घोर युद्ध वे करते हैं।।
ये इतना आसान नहीं था पर, जब वीर चले आगे।
देख हौसला उन वीरों दुश्मन भी मन में काँपे।।54।।131
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