शौर्यगाथा भाग 03/2
...
दो महीनों तक घोर युद्ध दोनों सेना के बीच चला।
लेकिन फिर भी नहीं हौसला, सिंहों का किञ्चित बदला।।55।।132
दुश्मन ने भी कोई अवसर चूक न रोका वारों को।
दिन हो या हो रात, न रोका गोली की बौछारों को।।
आसमान से भारत की सेना पर बरसी गोली थीं।
पर ऐसी कितनी खेली भारत सेना ने होली थीं।।56।।133
झेल गोलियाँ, बम, हथगोले, वीर पंथ पर रहे डटे।
दृढ़ निश्चय से भरे कदम पर नहीं एक भी इंच हटे।।
सर पर बाँधे कफ़न मौत बनकर जब अद्भुत वीर चले।
दुश्मन दल को त्रास हुआ, उनके समूह को बड़े खले।।57।।134
देखा जब भारत सेना आगे ही बढ़ती आई थी।
दुश्मन ने ऊपर से दुगनी तोपें तब चलवाईं थी।।
ऐसा दृश्य परम भीषण था, जैसे हो आकाश फटा।
और आग ही आग भयंकर, मुख से अपने उगल रहा।।58।।135
बढ़ते रहे वीर भारत के, करते विजयी जयकारे।
महाकाल को वंदन करते, वीर काल को ललकारे।
दुर्गम थल पर, रण करते, निज मातृभूमि के मान रखा।
कितने-कितने सिंहों ने, इसमें जीवन था आप तजा।।59।।136
झेल गोलियों की आँधी, वे ऊपर अब चढ़ आये थे।
देख दृश्य ये दुश्मन के सैनिक सारे घबराए थे।।
और लिए आँखों में ज्वाला, जब योधा रणधीर बढ़े।
एक नया इतिहास बनाने, विकट गिरि पर वीर चढ़े।।
कुछ घायल सिंहों ने मिलकर, महिष झुंड को त्रास दिया।
मुट्ठीभर भर वीरों ने, अरि के दल का सकल विनाश किया।।
भारत का ध्वज जब टाइगर हिल की चोटी पर चमका था।
पर्वत था सुंदर पहले अब और अधिक ही दमका था।।
ध्वज के तीन रंग ऐसे लगते थे, ज्यों नभ छाए हों।
तीन रंग के पुष्प देवदल ने निज हाथ लुटाए हों।।
नहीं तिरंगा केवल ध्वज ,ये आन-बान है भारत की।
हर दिल में रहने वाली, ये जान-शान है भारत की।।
इसको सम्बल दिए खड़े हैं, हाथ एक सौ तीस करोड़।
इतनी इसमें ताकत है, जिसका न कोई है ओर छोर।।
इस ध्वज के हित भारतवासी देते हर कुर्बानी हैं।
कितनी बार कही, गाई, इसकी तो अमर कहानी है।।
जो भी करना पड़े, असम्भव को भी सम्भव कर देंगे।
लेकिन उच्च तिरंगा प्यारा, कभी नहीं झुकने देंगे।।
नहीं तिरंगा ध्वज केवल, ये अपितु शीष हमारा है।
दिल में रहता साथ हमाई, सदा जान से प्यारा है।।
हम इसका कद ऊँचा करने में निज प्राण लुटाते हैं।
अगर ज़रूरत पड़ जाए, बाज़ी में जान लगाते हैं।।
जीते जी, जीते हैं बस इसकी सेवा हम कर पाएँ।
अंत समय आँखों इसको रखें, छाँह में मर जाएँ।।
हम तो मरकर इसी तिरंगे में लिपटे जाना चाहें।
केवल ये ही, सेवा के बदले में पा जाना चाहें।।
चाह नहीं कोई भी केवल, भारत ये आबाद रहे।
जननी फूले-फले, बाँटती अपना सदा प्रसाद रहे।।
यही निवेदन दाता से, हम गीत राष्ट्र के गा पाएँ।
उपने भारत की गाथाएँ दुनिया भर में पहुँचाएँ।।
देश प्रेम मेें भरे रहें, हम बस इसका ही ध्यान करें।
इसका ऊँचा नाम करें, कुछ ऐसे कर्म महान करें।।
जो माता का शीष सदा, हम उसको ऊपर रख पाएँ।
उसके निर्मल आशीषों से अमृत जय का चख पाएँ।।
जब तक जीवित रहें, सदा जय-जय भारत ही हम गाएँ।
इसकी रक्षा, सेवा में निज को भी भेंट चढ़ा पाएँ।।68।।145
इसी तरह इस रण का भी, पहले जैसा अंजाम हुआ।
दुश्मन लौटा पीठ दिखाकर, ताज हिन्द के नाम हुआ।।
भारत ने इस विजय हेतु कितने-कितने सुत वारे हैं।
जो भारत माता के प्यारे, और नयन के तारे हैं।।69।।146
वे हैं पूज्य हमारे उनको शीष झुकाएँ सदा-सदा।
जिनका है हम सब के ऊपर, कितना ये उपकार बड़ा।।
अजर-अमर सुत बलिदानी, भारत के सिंह निराले थे।
जो अँधियारी रातों में, जग-मग दीपक उजियाले थे।।70।।147
श्री विक्रम बत्रा, योगेंदर सिंह यादव, संजय कुमार।
वीर अनुज नैय्यर, संग कैप्टन पांडे श्री मनोज कुमार।।
और न जाने परम वीर कितने इस रण में विदा हुए।
माँ के प्यारे पुत्र युद्ध में, जब उस से ही जुदा हुए।।71।।148
हहर उठी धरती की छाती, सीना काँपा अम्बर का।
चीख, अश्रुओं का, विलाप का, बह निकला जब सागर सा।।
निश्चय विजयी हुआ था भारत, दुर्गम रण विख्यात हुआ।
किन्तु जीत के हर्ष की जगह, दुःख देश में व्याप्त हुआ।।72।।149
देशवासियों ने नैनों से भागीरथी बहाई थी।
देख जिसे, भारत माता की आँख सजल हो आई थीं।।
खोकर अपने लाल युद्ध में माता बड़ी बिलखती थी।
रण की निकली ज्वाला से, जनता जल रही, सुलगती थी।।73।।150
सच है रण से होता है, उत्पन्न दुःख कितना भारी।
जनता रोती, रोता भारत, रोती मानवता सारी।।
भरे अश्रु अपने नयनों में, हम जब लगे सम्भलने थे।
राष्ट्र सशक्तिकरण हेतु, छोटे-छोटे पग चलने थे।।
कुछ दिन वैरी शांत रहा, अपने विनाश पर हाथ मले।
पर जिनकी दुम टेढ़ी हो, वो कैसे बात ज़रा समझे।।
उनको तो बस बात दण्ड की सिर्फ़ समझ में आती है।
उनके कर्मों पर मनुष्यता बार-बार, पछताती है।।
जब वैरी ने ये जाना, रण नहीं सामने का सम्भव।
भारत को रण में परास्त करना सर्वदा नहीं सम्भव।।
तब यों करके साँठ गाँठ षड्यंत्रों की नव नीति गढ़ी।
वैमनस्य फैलाने की कुत्सित-सी, काली चाल चली।।76।।153
तब रस्ता आतंकवाद का पुनः चुना, दुश्मन दल ने।
और नए ही रूप लिए, फिर वार किया उसके छल ने।।
अब छुपकर, लड़ने की गहरी चाल गई अपनाई थी।
भेस बदलकर भारतजन का, टुकड़ी भी पहुँचाई थी।।
जम्मू में, कश्मीर में, आतंकी कितने फैलाए थे।
और जलाने शांति व्यवस्था, बम ही बम बिछवाए थे।
कभी धमाका श्री रघुनाथ राम के घर में करवाया।
मंदिर को भक्तों समेत, बारूद में था तब नहलाया।।
बार-बार यों ज़हर उगलकर, घाटी को बेहाल किया।
आग लगाकर फूलों में, गुलशन को यूँ बदहाल किया।।
जहाँ हवाएँ बहती थीं, ख़ुशबू से सनी बहारों की।
अब थी उनमें गन्ध, जले बारूद, और हथियारों की।।79।।156
कभी वैष्णों देवी के मंदिर को लक्ष्य बनाया था।
अमरनाथ के जत्थे में, आतंकी दल पहुँचाया था।
उनकी कोशिश यही रही, विश्वास हमारा तोड़ सकें।
और आस्था के मंन्दिर प्राचीन उन्हें वो तोड़ सकें।।
पर हैं महामूढ़ वो इतनी बात समझ ना पाते हैं।
भारत की सेना में सैनिक नहीं सिंह ही आते हैं।।
एक-एक योद्धा भारत का सौ के जैसा होता है।
सवालाख से लड़ सकता है, ले प्राण हथेली सोता है।।
जिनके लोहू में उबाल, ऐसा है आँच लगे जिसकी।
कितनी अमर कथाएँ, बीते वर्ष बाँचते हैं जिसकी।।
हुआ पराजित शत्रु सदा भारत भू पर, निस्तेज हुआ।
लेकिन विजयी कभी न दुश्मन, उपने दल को भेज हुआ।
यही बताते हैं युग कितने, ये ही अमर कहानी है।
बच्चा-बच्चा पढ़ता ऐसी, बातें आप ज़बानी हैं।।83।।160
No comments:
Post a Comment