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Tuesday, 27 October 2026

माँ

माँ कहीं नहीं जाती,
माँ सिर्फ़ दिखाई नहीं देती,
दरस्ल वो ढल जाती है,
घर कि चौखट में,
रम जाती है सिलबट्टे में,
घुल जाती है तीज त्यहारों,
की तैयारियों में,
बस जाती है नाती-पोतों के,
शोर-शराबे में,
रहती है बच्चों की,
तरक्की में छुपकर,
घर में बरक्कत की तरह,
फैल जाती है,
माँ उग आती है,
क्यारी में तुलसी बनकर,
माँ बच्चों से कहाँ,
अलग हो पाती है!!!

- अंशुल।






महायोगी

आँख धुंधली है,
भरे हैं अश्रु इनमें,
है भरा क्रंदन, रुदन,
हर कंठ में ही,
किन्तु इस भीषण रुदन,
के हिमगिरि के पार देखो,
घोर गर्जनमय, गहरते,
अश्रु सागर पार देखो,

किसी हिम की कंदरा में,
दिख रहे हैं मुझे तो वे,
मुस्कुराते, शांत, स्थिर, गंभीर,
ध्यानासन्न बैठे.....
कभी,
लेकर बांसुरी स्तुति गान गाते,
वंशिकाधर को मनाते....
कभी,
खोले ग्रन्थ पढ़ते, और 
समझाते हुए वेदांत, 
दैवी लोक में भी....

गौर से देखो,
यहाँ ये शयन रत जो दिख रहा है,
वस्त्र है केवल...जिसे अब त्यागकर,
हाँ उस तरफ़, निज कर्म करने,
बढ़ चला है 'कर्मयोगी',
बढ़ चला है 'महायोगी'...

- सादर 

अंशुल....

Friday, 24 April 2026

papa ke liye

 कभी आफ़ताब, कभी चाँदनी बनकर।
कभी चिराग़, कभी रोशनी बनकर।

या, कभी तपाकर अपने आप को भी,
आप कैसे भर देते हैं मेरी आँखों में उजाले।

हाँ, दृश्य जो मैं देखता हूँ,
उसके कारक आप ही हैं।

आप कैसे ये घनी धूप सहकर भी,
बाँटते हैं केवल शीतल छाँह।

शायद मैं इसे कभी समझ नहीं पाऊँगा,
किन्तु मेरे लिए इतना ही जानना काफ़ी है,

कि मैं, आपका ही विस्तार हूँ।

जन्मदिन की अनेक शुभकामनाएँ, पापा।
श्री हनुमान जी हमेशा कृपालु रहें.....#जाके गति है हनुमान की.....

Friday, 19 January 2024

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'..

भिन्न देह एक प्राण,
प्रेमी, अद्भुत, महान।

शारदेय, ज्ञान निधि,
दैवी सामर्थ्यवान।

कविकुल की आन-बान,
दिनमणि से तेजवान।

स्नेह को अपने फिर भी,
जीवन भर रखा गुप्त।

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'...

गंगा-सी थी तरंग,
चलते थे संग-संग।

संगम की धार से थे,
एक रूप और अभंग।

नूतन करते प्रसंग,
रमते थे एक रंग।

मित्रता अनोखी थी,
शीतल सुगंध युक्त।

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'...

आज खिले होंगे फिर,
दोनों के ही अंतर।

देवधाम में होगी,
अद्भुत आभा प्रखर।

मित्रों का मिलन देख,
देव नत हुए होंगे।

पुष्प लुटाते होंगे,
अंजुलियाँ भर-भर कर।

बरसों के बाद आज, 
बंधु के घर बंधु गए।

देख दृश्य ये पावन,
मन के छिड़ तार गए।

नयनों का नीर जगा,
अब तक था जो प्रसुप्त।

'बच्चन' घर गए 'मुक्त'।
- अंशुल।

Tuesday, 9 January 2024

धनुष भंग

उठो हे राम!
अब उठकर धनुष,
संधान कर लो !!
ज़रा देखो खड़ी हैं,
जानकी कर में लिए,
जयमाल सुंदर, 
दुलारी जनक की देखो तनिक, व्याकुल बड़ी है!! 
प्रतीक्षारत, विकल है, और ये कब से खड़ी है!!
नयन का धीर खोता जा रहा है!
हृदय गम्भीर होता जा रहा है!
तुम्हें टेढ़ी नज़र से देखती है,
झुकाए सर यूँ फिर कुछ सोचती है।
मनाती गणपति को हाथ जोड़े!
खड़ी है चुप, है सर पर शील ओढ़े।
लिया था जन्म तुमने तो,
सभी सन्ताप हरने को ,
तो क्यूँ फिर यूँ जनक का,
ताप अब हरते नहीं हो।
उठो रघुवंशियों में,
सूर्य के प्रतिरूप राघव,
उठो अब जानकीवल्लभ कहाओ,
जनक का शोक, सीता की विकलता,
धनुष के साथ जाकर तोड़ आओ।

-अंशुल।

Sunday, 14 August 2022

ध्वज वंदन (15 aug 2022)

हे! शक्ति शांति के चिर प्रतीक,
समृद्धि गति के संवाहक,
हे! न्याय दंड पर जड़े अडिग,
स्वतंत्र हिंद के संभाषाक।

अगणित बलिदानों से निर्मित,
अगणित मुस्कानों के कारक,
हे! कर्म और पुरुषार्थ प्रखर,
भारत की अस्मिता के धारक।

तुम नहीं हो केवल ध्वज अपितु,
तुम जन गण मन का मान भी हो,
तुम ही से सब, तुम ही सब कुछ,
तुम पूरा हिंदुस्तान भी हो।

तुम से गंगा, तुम से जमुना,
तुम से ही हिमालय है प्रचंड,
तुम से केसरिया काश्मीर,
तुम से दक्षिण के तट अखंड।

हर भारतवासी के कर में,
तुम हो काशी के हर हर में,
मथुरा की राधे राधे में,
चट्टानी अटल इरादे में।

तुम अमृतसर के अमृत में,
पंजाब के पांचों नीर में हो,
हरियाणा की हरियाली में,
गुजरात के अविचल धीर में हो।

तुम अवध के जय श्रीराम में हो,
संकट मोचन हनुमान में हो,
सरयू के जल की कल जल में,
तुम काशी के विश्राम में हो।

तुम गौरवमय, तुम अति विराट,
तुम आदि मध्य अवसान भी हो,
तुम ही से सब, तुम ही सब कुछ,
तुम पूरा हिंदुस्तान भी हो।

राणा प्रताप का गौरव तुम,
तुम पृथ्वीराज का अटल शौर्य,
तुम छत्रसाल के बल स्वरूप,
तुम गुप्त वंश के शीर्ष मौर्य।

गीता का दैवी ज्ञान भी तुम,
हर मर्यादा का मान भी तुम,
रामायण का विधान भी तुम,
गुरुओं का ग्रंथ महान भी तुम।

तुम ही गांधी की लाठी में,
तुम चंद्र बोस की काठी में,
तुम शेखर की कुर्बानी में,
तुम भगत की वीर जवानी में।

तुम ही झांसी की रानी में,
तुम शिवा वीर तूफानी में,
तुम ही अशफ़ाक ओ बिस्मिल में,
तुम खुदीराम बलिदानी में।

तुम क्या हो कैसे कहा जाए?
तुम तो हम सब के प्राण भी हो,
तुम ही से सब, तुम ही सब कुछ,
तुम पूरा हिंदुस्तान भी हो।

हम सबका ये ही गौरव है,
हम छांह तुम्हारी पा जाएं,
ये जीवन है इस आस में बस,
कुछ काम तुम्हारे आ जाए।

तुम ही हो हमारा परम लक्ष्य,
तुम ही उसका संधान भी हो,
तुम ही से सब, तुम ही सब कुछ,
तुम पूरा हिंदुस्तान ही हो।

- अंशुल तिवारी

Sunday, 17 July 2022

kahani...quote!!!

एक कहानी मैं ख़ुद को रोज़ सुनाता हूं!!

वो जिसमें, सब ठीक हो जाता है...

वो जिसमें, सच्चाई जीत जाती है...

वो जिसमें, मंज़िल मिल जाती है...

....

और वो बहुत अच्छी "कहानी है"!!!

- अंशुल।

Monday, 21 March 2022

तलाश!

मैं ढूंढता हू‍ं,
ख़ुद के अंदर...वो लड़का,
जो लड़ सकता था,
अपने सपनों के लिए,
दुनिया के हर एक शख़्स से!!!
वो जो आवाज़ उठा सकता था,
होते हुए अन्याय को देखकर!!
वो जो सबके बीच,
चमकता हीरे-सा!
या बुद्धिमानों की सभा में 
उद्दीप्त होता, सूर्य की तरह!!
और, वो जो मुहब्बत में, 
जान की बाज़ी लगा देता!
.......
मैं अब तक उस लड़के को,
अपने अंदर ढूंढ रहा हूं!!
जो शायद दबा हुआ है,
ज़रूरतों के दलदल में!...
दुनियावी रिवाजों के,
कोयले के नीचे...
नीति-नियम, तथाकथित,
सभ्यता के पत्थरों से!
मैं ढूंढ रहा हूं...
इसी उम्मीद में,
कि, किसी दिन वो मिलेगा,
मेरे भीतर सर उठाएगा!
उंगलियां चटकाएगा,
बाहर निकलेगा,
कुछ कर दिखाएगा!...
बस तब तक मुझे ख़ुद को,
बचाना है, 
प्रौढ़ हो जाने से!!

-अंशुल।

Wednesday, 10 November 2021

बचपन

मेरा बचपन मुझे अक्सर, यूँ रह-रहकर सताता है!
पुराने सब वही किस्से, ये अक्सर ही सुनाता है!
कभी लुका-छिपी का खेल, कभी वो दौड़ बेफ़िक्री,
कभी वो आम की चोरी,  मिठाई मीठी वो गुड़ की!
कभी वो नाव काग़ज़ की, कभी तालाब में डुबकी,
कभी वो स्कूल से छुट्टी, किसी भी बात पर कट्टी!
वो क्या यारों की थी टोली, वो शैतानों की थी टोली,
उधम जी भर मचाना वो, थी बदमाशियाँ भोली।
मेरे बचपन में हर मौसम बहुत ही ख़ूबसूरत था,
मुझे बचपन मेरा अक्सर बहुत ही याद आता है,
मेरा बचपन मुझे अक्सर, यूँ रह-रहकर सताता है!

-अंशुल तिवारी

Sunday, 7 November 2021

इन पहाड़ों में (reels)

Reel
पता है...कभी-कभी दिल करता है कि इस बड़े शहर को छोड़कर कुछ दिन पहाड़ों में ही गुज़ारूँ,
क्यूंकि शहर की हवा में oxygen तो बहुत ज़्यादा है, पर ज़िंदगी बहुत कम....
और इन पहाड़ों में, oxygen भले ही कुछ कम हो, लेकिन ज़िंदगी बहुत ज़्यादा है!!! 

Wednesday, 27 October 2021

मेरी फ़िक्र क्यूँ करते हो?

ये उनको लग रहा होगा!
मेरा होगा क्या? क्या होगा?
जो चिंतामग्न हैं,मेरे लिए,
ये सोचकर शायद, मैं हूँ किस काम का आख़िर!
तो, मैं उनसे ये कहता हूँ,
अजी! इस बात में भी क्या भला,
रक्खा है? क्या रक्खा?
न ख़ुद को कष्ट दो,
मुझको, मेरे ही हाल पर छोड़ो,
भले ही राख से हूँ जो ढँका,
ठंडा नहीं समझो,
अगर इतराओगे, मुझको उठाकर,
खेल समझोगे, ज़रा-सी बस हवा छूकर,
मैं चमकूंगा सितारे-सा, तुम्हारे हाथ,
जल जाएँगे, आँखें चुँधिया जाएँगी,
मेरी रौनक, चमक और तेज से,
सुलगोगे, दहकोगे...
इसी को जानकर मैं कह रहा,
तुमको है क्या करना ??
तुम अपने दिल, दिमाग़ में,
बस यही एक बात बैठा लो,
तुम्हारी झूठ से लबरेज़,
फ़िकर जो है दिखावे की,
इसे अपने ही तक रक्खो,
रहो तुम भी, मुझे भी और सुकूँ से, 
यार रहने दो..
न सोचो मेरे बारे में, न सोचो मेरे बारे में!
-अंशुल।

Saturday, 23 October 2021

किसलिए लिखोगे तुम???

सवाल ये अजीब है, कि किसलिए लिखोगे तुम?
अगर किसी ने बस कहा है, यार कुछ सुनाओ तो!
तो दूसरों की थाप पर पिटोगे बनके ढोल ही!!
रहोगे भेड़ की तरह कि जिस तरफ़ कहा,
वहीं को चल पड़े या रुक गए!
अगर है ये वजह के मेरे पास कुछ भी है नहीं,
यहाँ जो और हैं खड़े हैं शोहरतों के ढेर पर,
बड़ी इमारतों में उनके नाम हैं गुदे हुए!
जिन्हें है जानता शहर का बच्चा-बच्चा, हर बशर,
तो क्यूँ न उनके बीच मैं भी, नाम कुछ कमा ही लूँ!!
और इसलिए ही लेखनी को साफ़ कर चला ही लूँ!!
तो उनके बीच झोलियाँ उठाए से दिखोगे तुम!
बिना ही भिक्षापात्र एक भिक्षुक लगोगे तुम!
जो स्वाभिमान को जला के पेट भर रहा है बस,
दया पे दूसरों की जी रहा है और मर रहा!
अगर चले कहे पे दूसरों के ख़ुद को हारकर,
अगर बिके जो शोहरतों के दाम यूँ दुकान पर,
तो तुम कहाँ रहोगे फिर, जो आज तुम हो इस घड़ी,
जिएगा तुम में, रेंगता-सा शोहरतों का कीट ही!
इसीलिए ही कह रहा, जवाब पहले सोच लो!
सवाल ये अजीब है! कि किसलिए लिखोगे तुम!!

-अंशुल।
(23.10.21)
हरिद्वार

Thursday, 21 October 2021

वो लिखो जो बिक सके

बाज़ार की ये मांग है, तुम वो लिखो जो बिक सके,
जो बिका नहीं बाज़ार में, बेकार है! बेकार है!
तुम जो भी लिखते हो यहाँ, उसे अपने हाल पे छोड़ दो।
बाहर चलो, बाज़ार में, देखो दुकानों में सभी,
क्या-क्या सजा है, तैयार है, बिक जाने को बेकरार।
तुम भी लगाओ बोलियाँ, बाज़ार का अंदाज़ लो।
अब मोल-भाव को देखकर, अपने लिखे का स्मरण करो।
सोचो इसी बाज़ार इक दुकान हो जो तुम्हारी भी,
तुम भी खड़े हो धूप में, कितना बिकोगे अब कहो?
बेचोगे कैसे लिखा हुआ? क्या फ़ायदे बतलाओगे?
तुमने लिखा जो भी यहाँ, उसमें हैं बस कड़वाहटें!
दुनिया की असली शक्ल है, पर ये किसे रास आएगी!!
लोगों को तो भाती है बस, शब्दों की मीठी चाशनी,
या चट-पटी बातें, मसालेदार-सी छींटा-कशी!
ये सब तुम्हारे कहन में तो है नहीं , बिल्कुल नहीं!
फिर कौन पैसे ख़र्च कर, ए यार! तुमको ख़रीदेगा,
तुम अपने घर वापस चलो, फिर से अकेले बैठकर,  
इस हाल पर भी कुछ लिखो, तुम अपने सच को ही लिखो!
अब कोशिशें भी मत करो, कि वो लिखो जो बिक सके!!

-अंशुल।
22.01.21
(हरिद्वार)

Thursday, 17 June 2021

पथभ्रष्ट

सुनी सुनाई, जो बात सुनकर,
बड़े ये आलिम बने हुए हैं!
ये जानते हैं तो क्या जानते हैं?
ये बस चुराकर कहीं से कुछ भी,
या सुन-सुनाकर कहीं से कुछ भी,
ज़माने में पीटते ढिंढोरा,
बिना ज़मीं के खड़े हुए हैं!
न इनके पैरों के नीचे कुछ है,
न इनके होश-ओ-हवास कायम!
ये झूठ को मानकर सच यहाँ पर,
उठाए परचम भटक रहे हैं,
कहाँ पे जाना ये चाहते हैं?
कहाँ पहुँचकर ये दम भरेंगे!
-अंशुल।

Tuesday, 23 March 2021

फाग गीत

उड़े-उड़े अवध में रंग, राम जी रंग खेलें!
उड़े-उड़े अवध में रंग, राम जी रंग खेलें!
सिया, लखन, संग हनुमंत, राम जी रंग खेलें!

सोने की है पिचकारी, जी बन्यो फूल को रंग,
लाल, गुलाबी, नीला, पीला, सबै देख हैं दंग!
नाचें लोग निहाल भए, घर-घर में है आनंद!
सब भूले, सुध-बुध, ढंग! राम जी रंग खेलें!

अवध पुरी लौट रघुनंदन, बरसों बाद बधाई!
पहली होली घर में खेलें राजा राम, बधाई!
पुनः हुई सुख वर्षा देखो, घर-घर खुशियाँ छाईं!
सब बाँटो आज मिठाई! राम जी रंग खेलें!

जन के राजा, सिंहासन पर, देखो पुनः बिराजे,
सभी ओर श्री रामचन्द्र के गूँजे गाजे-बाजे!
सोभा देख अवधपुर की, देवता स्वर्ग में लाजे!
सिय, लखन, पवनसुत साजे! राम जी रंग खेलें!

अबकी होली ऐसी होगी सोचा नहीं कभी था,
रघुवर के संग देखो आनंद दुगना हुआ सभी का,
राजमुकुट पहने सियवल्लभ, सिर अबीर का टीका,
हर रस लागे अब फीका, राम जी रंग खेलें!

उड़े-उड़े अवध में रंग, राम जी रंग खेलें!
सिया, लखन, संग हनुमंत, राम जी रंग खेलें!

-अंशुल तिवारी।

Monday, 14 December 2020

दुनिया सारी ये ख़्वाब है!

"दुनिया सारी ये ख़्वाब है!"

वाइज़ ने कल कुछ यूँ कहा, 
दुनिया ही सारी ख़्वाब है!
ये ख़्वाब ही है अगर कहो,
तो किसलिए लड़ते हो तुम?
जीते तो भी क्या पाओगे?
गर दुनिया सारी ये ख़्वाब है!!!
तुमने कहा तो ये भी था,
ये हर घड़ी है मिट रही,
ये एक दिन खो जाएगी,
तो जो ख़ुद-ब-ख़ुद मिट जाएगी,
उसे अपनी तरह बनाने की,
इन कोशिशों में लगे हो क्यूँ?
गर दुनिया सारी ये ख़्वाब है!!!
तुम कह रहे थे ये भी तो,
ये जो दौलतों के ढेर हैं,
ये जो शोहरतों के मक़ाम हैं,
मिट्टी हैं सब, मिट्टी हैं सब!
तो ये अपनी जेब में धूल ही,
लेकर ग़ुरूर में गुम हो क्यूँ?
तुम पहले अपनी बात पर,
अपना यकीं कायम करो,
न के सिर्फ़ तख़्त पे बैठ कर,
झूठे दिलासे दिया करो।
जो बात मेरी चुभे अगर,
तो ग़मज़दा होना नहीं,
के दुनिया सारी ही ख़्वाब है!
और ख़्वाब का क्या वजूद है!

-अंशुल।

Wednesday, 2 December 2020

ये लिखने वालों की भीड़ है!

ये लिखने वालों की भीड़ है,
ये लिखने वालों की भीड़ है!
ये सिर्फ़ हाथ में ले कलम,
लिखने की होड़ में है लगी,
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
ये है खो चुकी अपनी समझ,
ये वमन ही करना है जानती,
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
इस भीड़ की है शकल नहीं,
गुमनाम इसके निशान हैं!
इसे सिर्फ़ ख़ुद से ही प्यार है,
अपने ही ऊपर निसार है,
ये न पढ़ना, सुनना ही जानती,
बस लिखना, लिखना ही चाहती!
जो भी लिखे, जैसा लिखे,
बस 'दाद' उसपे है मांगती।
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
यही मंच पर आसीन है,
श्रोताओं में यही शुमार भी!
जो सुन रहा, जो सुना रहा,
सब इसी भीड़ का भाग हैं!
तुम मेरे छंद पे दाद दो,
बदले में मेरी वाह लो!
सौदा बड़ा सीधा सरल,
करके तो देखो इक दफ़ा।
जो कवि न तुमको बना ही दें,
तो ये नाम अपना बदल दें हम।
ये जो भीड़ है, ये जो भीड़ है,
इसे सिर्फ़ नाम ही चाहिए,
इसे वाह-वाही है पसंद,
ये है झूठ में खोई हुई,
ये जो लिखने वालों की भीड़ है!

-अंशुल।

Tuesday, 1 December 2020

जो लिखी नहीं गई!

वो एक कविता...
जो लिखी ही नहीं गई अब तक,
जो चलती रहती है ज़हन में,
साथ-साथ हर पल!
इस तमन्ना में, कि कभी तो काग़ज़ पे उतरेगी,
ठीक वैसे ही!
जैसे उतरी थीं कभी,
ब्रह्मकमण्डल से प्रवाहमयी गंगा,
गंगा जब उतरी थीं,
तो दबाती चली गईं थी पृथ्वी को,
रसातल में अपने वेग से!
तब इस कष्ट से
मुक्ति देने, बीच में आ गए थे,
गंगाधर शंकर!
फैलाए अपनी जटाएँ, चतुर्दिक!
बाँध चुके थे गंगा को,
धार चुके थे उसके वेग को,
धरती बच गई थी, उस वक्त!
और यहाँ,
मेरे पास भी कुछ है,
जो उतरा नहीं है काग़ज़ पर,
ये भी हिला सकता है पृथ्वी को,
कम्पित कर सकता है
दिक्पालों को, धँसा सकता है ज़मीन को रसातल में,
यहाँ भगीरथ भी मैं हूँ,
और शंकर भी!
प्रयासरत हूँ कि कभी तो उतरे,
विचाराकाश से वो गंगा/कविता,
जो लिखी ही नहीं गई,
आज तक।

-अंशुल।

Friday, 27 November 2020

वो क्या कोई कवित्त है?

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो चित्त को जला-जला के राख-राख कर गया,
जो चैन, शांति, प्रेम, धैर्य, औ' सौहार्द हर गया!
जो जन्मते ही दम्भ के गहन तिमिर में खो गया,
जो बोध के नयन को मूंद कुरूपति-सा हो गया!
जो अपने लाभ के लिए सभी नियम भुला गया,
जो नीति, तथ्य और विवेक को समूल खा गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मानवों को मानवों का शत्रु ही बना गया,
जो मोहरों की भाँति उनको साथ में लड़ा गया!
जो अग्नि वैमनस्य की समाज में जला गया,
के जिसके हाथ से हरेक आदमी छला गया!
जो शांति की सुधा छुड़ा के वैर विष पिला गया,
जो सत्य, स्नेह, मित्रता की नींव को हिला गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?
जो मुझमें अहंकार को जगा गया, जगा गया,
हूँ सर्वश्रेष्ठ मैं ये मेरे कान में बता गया!
जो मुझको बोध पथ से सर्वथा ही दूर कर गया,
के जिसके जन्मने से मन में द्वेष भाव भर गया।
जो मुझको आत्मवन्दना की होड़ में लगा गया,
जो ज्ञान मूल को उखाड़ धूल में मिला गया।

वो क्या कोई कवित्त है, वो क्या कोई कवित्त है?

कवित्त वो जो है, जो भरे मनुज के मन को धीर से,
जो आत्म को करे सुपुष्ट, ज्ञान गंग नीर से।
जो चित्त में भरे सदा ही शांति, अनुराग को,
जगाए जो स्वतः ही शुद्ध त्याग को, विराग को।

कवित्त क्या जो माँगता हो जग से भीख मान की,
किसी से वाह-वाह की, किसी से निज प्रमाण की।

-अंशुल।

Wednesday, 25 November 2020

उन्मुक्त स्वर।

न मुझको दान चाहिए, न मुझको त्राण चाहिए,
न मैं के वो जो झोलियों में डालकर के पंक्तियाँ,
फिरूँ यहाँ गली-गली, के सिर्फ़ एक दाद पर,
लुटा दूँ अपने आप को, बिछा दूँ अपने आप को!
न मुझको दाद चाहिए, न मुझको वाह चाहिए,
के तुम जो अपने आप से भी झूठ ही हो बोलते,
न आईने में देखते, न ख़ुद को ही हो तोलते!!
तुम्हें वही पसंद है, जो है तुम्हारे काम का,
तुम्हें तो झूठ भावते, हो सच से तुम तो भागते,
तुम्हें तो तृप्तिकर है लगती बस तुम्हारी वन्दना,
अगर कहे कोई के तुमने की है जो भी वंचना!
तो शत्रु मानकर उसे न झेल पाओगे कभी,

मैं क्यूँ तुम्हारे सामने पड़ा रहूँ, खड़ा रहूँ,
हो कौन तुम, क्या जानते हो??
क्यूँ तुम्हारी इक फ़िज़ूल दाद पे मैं मर मिटूँ!
नहीं ये मेरे योग्य है...
मुझे न दाद चाहिए, मुझे न वाह चाहिए...
मैं मुक्त स्वर, मैं हूँ गगन, मैं भेद से रहित पवन,
मैं छंद में स्वच्छन्द, लेखनी का आत्मब्रह्म हूँ,
मैं बंजरों में गीत की नदी को मोड़ लाऊँगा,
मैं पत्थरों को फूल की कली से तोड़ जाऊँगा।
मैं क्षण में सृष्टि का सृजन, मैं क्षण में हूँ महाप्रलय,
मैं कल्प के भी पार हूँ, कभी हूँ एक पल में लय।
मुझे ज़रा बताओ गर जो तुम में कोई बात है,
तुम्हारी क्या बिसात है, तुम्हारी क्या बिसात है?

-अंशुल।