hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Tuesday, 6 December 2016

जब चुप था...

मैं चुप था,
तब तक अच्छा था।
जब बोल पड़ा,
तो बुरा हुआ।
पर मेरा इसमें दोष नहीं,
तुमने ज़िद की,
मुझसे बोले,
जो बात है दिल में,
साफ़ कहो।

मैं कह दी,
तुम सह न सके।
मुँह फुला के मुझसे रूठ गए।
अब मैं बोला,
क्यूँ रूठे हो?
तो बोले,
बड़े बुरे हो तुम।

इससे पहले ही अच्छे थे,
इतना कहकर तुम चले गए,

मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा,
जब चुप था तब ही बेहतर था।

-अंशुल तिवारी।

Saturday, 26 November 2016

भाषण...

भाषण, वक्तव्य विधा का सबसे सरल प्रकार है (व्यंगात्मक रूप से)।
अक्सर लोग इसे बड़ी सहजता से दे भी देते हैं।
शायद देने में यही वो पहली वस्तु होगी लोग जिसे किसी दूसरे को देने को हमेशा, एक पैर पर तैयार रहते हैं।
एक ख़याल इस बात पर,
----------------------------------
सुना हमने जो भाषण, कहा उनसे ठहर जाओ।
के जो समझा रहे हो तुम, वो ख़ुद करके दिखाओ।

जो है अंगार पे चलना, कदम पहले बढ़ाओ।
लटकना है जो सूली पर, तो हाथ अपना उठाओ।

ज़हर का घूँट पीना है, तो तुम प्याला उठाओ।

मियाँ हँसकर ज़रा बोले, न यूँ हमको फ़ँसाओ।
इन्हें बातें ही रहने दो, हकीकत न बनाओ।

अगर कुछ फ़ायदा चाहो, हमारे साथ आओ।
चढ़ो मंचों पे हाँको, ख़याल के घोड़े दौड़ाओ।

जो श्रोता हैं उन्हें वादों का घिस, चन्दन लगाओ।
ज़माना है सुनो मत, सुनाकर life बनाओ।

- अंशुल।

Tuesday, 22 November 2016

उलझन...

सुनता आया हूँ
हमेशा कि, काफ़ी है
समझदार को इशारा ही।
मगर मैं सोचता हूँ,
वो जो समझदार है,
उसे क्यूँ चाहिए इशारा??
क्यूँ नहीं वो समझ सकता,
हालत को देखकर,
या महसूसकर??
और यदि फिर भी चाहिए,
इशारे का सहारा,

तो नासमझ करे क्या बेचारा??

-अंशुल।

Wednesday, 9 November 2016

काश...

काश, 
बस कुछ देर और
जो नींद नहीं टूटती।
तो,
तैरता मैं सपनों की झील में,
उड़ता ख़्याल के बादल पर,
टहलता ख़्वाबों के समंदर किनारे,
कुछ देर और भीग लेता,
ख्वाहिशों की बारिश में।
मगर करूँ क्या??

रात जब भी हसरतें थपकियाँ देकर सुलाती हैं, 
ज़रूरतें झंझोड़कर जगाने चली आती हैं।


- अंशुल।

Saturday, 5 November 2016

वो...

बातें होती ही रहती हैं, होती भी रहेंगी...
बातों का क्या है,
पर ये ख़्याल समर्पित है उन्हें जो बात को समझे तो नहीं हैं पर समझाते खूब हैं।
------------///----------

वो कहते रहे,
मैं सुनता रहा,
सिलसिला चलता रहा।

सुनते-सुनते फिर शाम ढली,
जब शाम ढली तो पता चला।

जो बात वो मुझसे कहते हैं,
वे ख़ुद भी नहीं समझते हैं।

फिर क्यों वे कहते रहते हैं,
न उन्हें पता, न मुझे पता।

मैं उठा,
उठे वो साथ मेरे, मैं इधर गया,
वो किधर गए?

कुछ नहीं पता, कुछ नहीं पता।

-अंशुल।

Friday, 4 November 2016

वेदना...

वेदना कहती है मुझको,
आज तो अभिव्यक्त कर दो।
शब्द का देकर सहारा,
आज मुझको मुक्त कर दो।

कह भी दो अब वह कथा,
कब जन्म था मैंने धरा।
क्यूँ मुझे धारण किए हो,
आज कह भी दो ज़रा।

क्यूँ किए मन को व्यथित,
चलते हो शूलों की डगर।
पाओगे परित्राण राही,
मुझको मन से त्याग कर।

पर मैं कहता वेदना से,
त्यागकर तुझको भला।
चैन से क्या रह सकूँगा??
त्राण क्या पाऊँ भला??

साथ तेरा लिए मैं चलता रहा, लिखता रहा,
भावनाएँ व्यक्त कर नव गीत मैं रचता रहा।
तू बनी साथी मैं जब भी दुःख से आतप्त था,
छोड़कर तुझको बता कैसे रहूँगा मैं भला??

सच है तपकर वेदना से जन्म पाता गीत है,
वेदना मन की सखी है, और ये ही मीत है।
वेदना अनिवार्य है, जीवन गति का मूल है,
वेदना का ताप सहना मनुज के अनुकूल है।

- अंशुल तिवारी

Wednesday, 2 November 2016

इंतज़ार...

मेरे सवाल कब से इंतज़ार कर रहे हैं,
तुम्हारे जवाब का।
कब टूटेगी तुम्हारी चुप्पी??
ख़ामोशी की घनी मेघावली से,
कब छिटकेगी तुम्हारी मुस्कान?
ख़ैर,
सवाल कितने भी क्यों न हों,
मैं प्रतिबद्ध, प्रतीक्षारत खड़ा हूँ।
इस उम्मीद में कि,
लहरें तोड़ मर्यादाओं की बेड़ियाँ,
कभी तो आ मिलेंगी साहिल से।

-अंशुल।

Wednesday, 26 October 2016

कागज़....

(चिट्ठियाँ महज़ कागज़ का एक टुकड़ा नहीं होतीं, कभी कभी जीने का सहारा भी होती हैं.
मगर वक़्त बड़ा बेरहम है, कमबख्त खुद बढ़ता है तो औरों की कीमत घटा देता है (समय के साथ चीज़ों का महत्त्व कम हो जाता है).
पर जज़्बात से मजबूर इंसान कीमत घटने के बाद भी गले से लगाए रखता है यादों को/ चिट्ठियों को.
एक ख़याल समर्पित, किताबों के पन्नों के बीच दम तोड़ती और एक अर्से से सम्भाल कर रखी गई उन चिट्ठियों को...)

उम्र कहाँ लंबी होती है काग़ज़ की,
कभी गल जाता है और
मिट जाती है स्याही भी आँखों के पानी से।
कभी सुलग उठता है, हथेली की गर्मी से।
या कभी यूँही ज़ाया हो जाता है ,
कटकर, टुकड़े-टुकड़े होकर।
सुनो,
यहाँ हर नज़र समेटे हुए है, न जाने कैसी आग।
जिसके आगे भाप बनकर उड़ जाएँगे अल्फ़ाज़ तुम्हारे।
और काग़ज़, जिसे तुम मानकर बैठे हो अपना संसार,
बस, राख हो जाएगा देखते देखते।

-अंशुल तिवारी।

Tuesday, 25 October 2016

आईना...

आईना।
मेरी दीवार की,
खूंटी पर टंगा है।
एक पुराना-सा, आईना।
लकड़ी की गली हुई फ़्रेम में सजा।
न जाने कितनी सदियाँ देख चुका है।
मैंने पहली बार इसे देखा था,
बाबा के सामान में।
उनका बड़ा ख़ास था,
हर जगह उनके साथ ही जाता।
अक्सर,
इस आईने से मेरा सामना होता।
जब बाबा दाढ़ी बनाते।
मैं बड़ा हैरान होता देख इसे,
और, परेशान होता सोच-सोच कर।
कि, बाबा कहाँ से लाए इसको??
कौन बैठा है इसमें??
मैं एक ही हूँ, फिर आईने में दिखने वाला
ये दूसरा कौन है??
दिन भर घिरा रहता मैं ऐसे कई,
झाड़ियों जैसे सवालों में।
पर, हल नहीं पता।
उलझता चला जाता।
फिर,
समय बीता, सब कुछ बदला।
हालात बदले, ख़्यालात बदले।
मैं भी काफी बदल गया।
पर, ये आज भी वैसा ही है।
हाँ उम्र की कुछ झाईयाँ,
इसके चेहरे पर उभर आई हैं।
पर न तो इसकी तासीर बदली है,
न ही इसकी तदबीर।
जहां मैं सीख गया तरक्की के नाम पर,
झूठ बोलना, दुनिया से, भगवान् से, अपने आप से भी।
वहीँ,
आज भी किसी सुधारक की तरह,
मूक वैरागी की तरह।
किसी कर्मयोगी के तरह।
ये दिखा रहा है लोगों को सच।
उनका सच,
जिसके अस्तित्व को वे नकार चुके हैं।
मुझे यकीन हुआ अब की क्यों था ये,
बाबा का चहेता।
और, इसीलिए शायद मैं देख सकता हूँ,
उनका चेहरा आज भी इसमें साफ़ साफ़।
- अंशुल तिवारी।

आज नहीं पाता हूँ मैं....

बदलते वक़्त के साथ सबकुछ बदल जाता है. 'नया' जन्म पाता है, 'पुराना' भुला दिया जाता है/ मिटा दिया जाता है.
किन्तु, अगर कुछ नहीं मिटता तो वो हैं 'यादें' बीते कल की...यादें बचपन की...यादें उम्र के उस सुहाने मौसम की...
पर शायद बदलाव के  तेज़ ज्वार में वो अनमोल यादें, निशानियाँ, कहानियाँ, खो गई हैं।
अब बहुत कुछ है लेकिन फिर भी एक खालीपन है. एक कोशिश उन्हीं यादों के तालाब में गोता लगाने की...और  कुछ देर ज़िन्दगी की कड़ी धूप से बचकर ठंडक पाने की.....
*********************************************************************************

आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।
टूटी-फूटी कुछ चीज़ों का एक वो गट्ठर,
जिसे सहेजा था बचपन में,
किसी ख़ज़ाने से बढ़कर।

टुकड़े कुछ रंगीन काँच के,
कुछ इमली की घिसी गुठलियाँ।
कुछ भटके शतरंज के मोहरे,
रेत से चुनकर रखी सीपियाँ।
ज़ंग लगी पिस्तौल,
जो शायद किसी दिवाली पाई थी,
टूटी लकड़ी की तलवारें जो मेले से लाईं थी
आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।

अलमारी के ऊपर बैठा वो डिब्बा,
जिसके खुलते ही आमों का मौसम,
फिर ताज़ा हो जाता था।
और अमावट मुँह में घुलकर,
बाग़ीचे के मीठे किस्से याद दिलाता था।
आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।

आँगन को ढँकता अपनी ठंडी छाया से,
दिनभर धूप के ताप में जलता,
था दरख़्त एक बरगद का।
घर के किसी बुज़ुर्ग की भाँति,
जिसकी गोदी में चढ़कर,
मैं दुनिया से छिप जाता था।
आज नहीं पाता हूँ मैं घर में अपने।

- अंशुल तिवारी

Monday, 24 October 2016

सफ़र...

(नसीहतें काम आती हैं, लेकिन बेवजह दी जाएँ तो केवल उलाहना लगती हैं.
यदा-कदा हमें भी ऐसे लोग मिल जाते हैं जो शायद सफ़र-ए-मंज़िल की दुश्वारियों से वाकिफ़ नहीं हैं लेकिन फिर भी नसीहतें देने का लोभ छोड़ नहीं पाते... प्रस्तुत संबोधन उनसे....)
उगेगा फिर वो सूरज, जो बुझा था कल समंदर में,
के मंज़िल तक पहुँचने का सफर, ये रोज़ होता है.

वाबस्ता इस किस्से से दुनिया की किताबें हैं,
गुज़रता पर जो है इस से, वो बस ख़ामोश होता है.
जो पाता और खोता है, यहाँ पर रोज़ मंज़िल को,
कहे वो क्या शिकस्तों से, हमेशा दोज़ होता है.
नसीहत बन सहारा रास्ते का चल नहीं पाती,
के बस राही  के काँधों पर सफ़र का बोझ होता है.

- अंशुल तिवारी

Sunday, 23 October 2016

बिसात..

( अक्सर वे लोग जो बिन कुछ सोचे टिप्पणियाँ देकर किसी का आकलन करते हैं, छींटे कसते हैं, ताने देते हैं.
किन्तु जीवन मार्ग पर हो रहे प्रतिपल संघर्ष की दुरूह परिस्थियियों से अंजान ही रहते हैं
उनसे मेरा संबोधन...)

तुम,
तुम जो हर हार पर मेरी,
चैन पाते हो।
हर ठोकर पर हो खुश,
इतराते हो।
जब भी बिखरता हूँ मैं,
मुस्कुराते हो।

बड़े नादान हो,
शायद भूल जाते हो।

बैठे तुम भी हो ,
वक़्त की बिसात पर।
न चाल पर तुम्हारा वश है,
न हालात पर।

तुम भी प्यादों की तरह,
चले जाओगे।
वक़्त के हाथों ही,
छले जाओगे।

बिसात फिर बदलेगी,
फिर नई बात होगी।
आज गर शह हुई है,
तो कल मात होगी।

-अंशुल तिवारी

कभी-कभी...

कभी-कभी अच्छा लगता है,
बिन बोले कुछ, तुमको दिल की बात सुनाना।
या फिर यूँ ही तुम्हें देखना, देखे जाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
बेसरपैर की बातें करना , तुम्हें हँसाना।
और तुम्हारी मृदुल हँसी का लुत्फ़ उठाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
किसी खेल में बेईमानी से तुम्हें जिताना।
और जीत का जश्न मनाना, तुम्हें रिझाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
छोटी-छोटी बातों पर भी तुम्हें सताना।
और रूठ जाने पर, मेरा तुम्हें मनाना।

कभी-कभी अच्छा लगता है,
कलम उठाकर, अल्फ़ाज़ों से तुम्हें सजाना
तुमपर अपने लफ्ज़ लुटाना, लिखते जाना 

-अंशुल तिवारी


मैं कौन हूँ???

बस समय की हूँ कथा,
या, जय-पराजय की व्यथा।
या, कि उसका आकलन,
जो था कभी, और जो न था।

मध्य प्राप्त-अप्राप्त के,
निस्त्राण-सा जो है खड़ा।
भूल कर निज की निधि,
वन-वन फिरा, वन-वन चला।

स्वांग रचकर नित नए,
मद में सदा डूबा हुआ।
स्वयं को इस भाँति से बस,
छल रहा 'मैं कौन हूँ'???

-अंशुल तिवारी

कविता...

(कविता के सन्दर्भ में विचार... 
कविता कहाँ रहती है? कहाँ से आती है? कैसी आती है?
यह जानना तो संभव नहीं है, फिर भी एक छोटा-सा प्रयास इन प्रश्नों का उत्तर खोजने का... )


चट्टानों का हृदय चीरकर,
ज्यों उग आता है नव अंकुर।
उस अंकुर की हरी दूब-सी,
मन में स्वयं उभरती कविता।

भोर भए ललकार तिमिर को,
सूरज की मद्धम किरणों-सी।
जैसे जगत प्रकाशित करती,
नभ से स्वयं उतरती कविता।

साँझ ढले आकाश में ऊँचे,
एक छोर से परम क्षितिज तक।
साथ परिंदों का लेकर के,
खुले गगन में उड़ती कविता।

और कभी बूंदों में ढलकर,
मेघों की गोदी से गिरकर।
बूँद-बूँद से सागर बनकर,
कागज़ तले मचलती कविता।

सच है, वो मिलने आती है,
दबे पैर और चोरी-चोरी।
अपनी ही मर्ज़ी की मालिक,
खुद मनमानी करती कविता।

- अंशुल तिवारी
  24.10.2016

Sunday, 16 October 2016

क़िस्से, सपने, बातें.....

इतने क़िस्से, इतने सपने,इतनी बातें,
तुम,
कैसे, किधर, कहाँ रखती हो???

क्या, इन छोटी-सी आँखों में??
पलकों के किवाड़ लगाकर,
सब सहेजकर रखती हो।

और, बनाती हो उनसे तुम,
अपना एक अलग ही बादल।

फिर,
आकुल-व्याकुल मुझसे मिलकर,
बिन देरी के, पलक झपकते।

मुझ पर बरसाती हो जाने,
कितने क़िस्से, कितने सपने, कितनी बातें।

मैं नख-शिख तक भीगा तुमसे,
ठगा खड़ा सुनता रहता हूँ।

और तभी लग जाती हो तुम,
पुनः संजोने, क़िस्से, सपने, बातें.....।

- अंशुल तिवारी, पुणे।
  16.10.2016

Thursday, 13 October 2016

तुम्हारी तरह

मुझे तुम सी ही लगती हैं,
ये बारिश की बेबाक बूँदें।
पारदर्शी शीशे की तरह,
शीतल, तृप्तिदायक।
जो भिगो देती हैं मुझे, तुम्हारी तरह।

हाँ, मुझे तुम सी ही लगती है,
ये सुबह की भीनी भीनी रौशनी,
बादलों की हथेलियों से छिटक रही ये धूप।
जैसे सहलाती है मेरे चेहरे को, तुम्हारी तरह।

हाँ, मुझे तुम सी ही लगती है,
साँझ की ये ठंडी बयार,
जो घूमती है मेरे इर्दगिर्द, और 
तेज़ी से कुछ कह जाती है मुझसे,
तुम्हारी तरह।

हाँ, मुझे तुम सी ही लगती है,
ये रात की खामोशी।
मानो वह चुपचाप मेरे काँधे पर सर रखकर सो गई हो,
तुम्हारी तरह।

-अंशुल तिवारी