शौर्यगाथा भाग 05:
सैनिकों का शीष विच्छेदन और उरी हमला।
(वो डसने की काकचेष्टा कभी नहीं पर छोड़ेगा।
विष काला वीरों के ऊपर, सदा-सदा ही छोड़ेगा।।)
….…
लड़कर-लड़कर जब बार-बार भी उसने जीत नहीं पाई।
हार पे अपनी बार-बार दुश्मन की सेना झल्लाई।।
तब झल्लाहट और जलन से भरकर पाप किया भारी।
जाने-अनजाने में ख़ुद कर ली विनाश की तैयारी।।111/188
ये केवल दुष्कृत्य न था, ये न्योता महाकाल को था।
न्योता अरिमर्दन अभ्यासी सैन्यशक्ति विकराल को था।।
ऐसा काम किया निंदित, गिरने की हद हो आई थी।
इंसानी जज़्बातों की हत्या, ही बस करवाई थी।।112/189
जब होकर हत बार-बार, कश्मीर न हथिया पाए।
तब वो इंसानी अस्मत की, सीढ़ी से नीचे आये।।
सारी मानवता को रखकर ताक, काम ये नीच किया।
सिंहों को धोखे से मारा, शीष काटकर भेज दिया।।113/190
हाय! दुःख कैसा भारी, उस माँ के हिस्से आया था।
जिसके सुत का शीष हीन शव उसके ही घर आया था।।
काँप उठी मानवता भी, ये देख दृश्य भीषण भारी।
रोई माता बिलख-बिलख कर, रोई जनता ही सारी।।114/191
सारा भारत अपने शेरों को खोकर ही रोता था।
दुख के इस सागर में, हर जन हृदय हार कर खोता था।।
दुःख यही था, हमने जिनको दिया सहारा, साथ दिया।
पीठ दिखकर हमें उन्होंने, हाथ हमारा काट दिया।।115/192
हमने जिनको अपनी रोटी में हिस्सा दे, खाया था।
बाँट-बाँट कर दिया सभी कुछ, समझा नहीं पराया था।।
उनकी नीयत लेकिन इतनी गिरी हुई थी, ये जाना।
नज़र सदा कश्मीर पे उनकी जमी हुई थी, ये जाना।।116/193
हमने ताकत होते भी जिनपर न खड्ग उठाया था।
उन लोगों ने भ्राताओं का शव घर तक पहुँचाया था।।
क्या समझे थे, हम केवल नम्रता की बोली बोलेंगे।
अगर ज़रूरत पड़ी शत्रु को तलवारों ओर तौलेंगे।।117/194
अरे! काटकर टुकड़े-टुकड़े कर देंगे समझाते हैं।
ये न समझो हिंदुस्तानी, केवल वेद उठाते हैं।।
अब सेना की शक्ति बना, हर जन के नैनों का आँसू।
और नसों में लावा भरता, भारत माता का आँसू।।118/195
हम जिसकी ख़ुशहाली के हित जीवन त्याग सदा कर दें।
उसे रुलाया जिसने उसको कैसे माफ़ ज़रा कर दें।।
दो हज़ार सोलह में फिर दुश्मन घर घुसकर आया था।
काश्मीर के उरी कैम्प में घात लगाजर आया था।।119/196
चुपके-चुपके, गीदड़ बनकर सिंह गुफ़ा में आ बैठे।
और भोर में सोते शेरों पर सत्रह गोले फैंके।।
हुआ अचानक हमला इससे शेर सम्भल न पाए थे।
और शत्रु पूरी तैयारी करके घात लगाए थे।।120/197
उरी कैम्प में मौका पाकर, फिर धोखे से वार किया।
सोते सिंहों को अवसर पाकर, वैरी ने मार दिया।।
इस हमले में सत्रह शेरों ने अपना बलिदान दिया।
लड़ते-लड़ते चढ़े वीरगति माँ को अंत प्रणाम किया।।121/198
दुश्मन ख़ुश था, जैसे वह तो भारत से हो जीत गया।
बड़ा दुःख देकर ये पल भी जैसे-जैसे बीत गया।।
अबकी बार नहीं लेकिन भारत ने खड्ग रखा अंदर।
जाग उठा था महातेज, जागी पौरुष की ज्वाल प्रखर।।122/199
अब करुणाकर ने खोला था, नयन तीसरा क्रोध भरा।
और किया निश्चय लेंगे, बदला भीषण, प्रतिशोध भरा।।
ढूंढ-ढूंढ कर मारेंगे, वैरी के प्राण सुखाएँगे।
तभी शहीदों के तर्पण को पूरा हम कर पाएँगे।।123/200
जब तक वैरी बचा रहा, हम सुख से ना रह पाएँगे।
भारत से धोखा करने का पाठ उन्हें पढ़वाएँगे।।
भारत ने तानी थी आँखें, जिनमें अद्भुत ज्वाला थी।
महाकाल ने मुँह खोल, अरि सेना बनी निवाला थी।।124/201
तुरत हुआ आदेश प्रमुख ने सेना को सन्देश दिया।
शस्त्र बनी बदले की ज्वाला, नस-नस में आवेश लिया।।
और परम घातक रणधीरों को अपने तैयार किया।
दुश्मन को उसकी ही भाषा में उत्तर इस बार दिया।।125/202
महावीर अब छद्म रूप में दुश्मन से जा जूझे थे।
ऐसा हमला हुआ, स्वप्न में वैरी जिसे न बूझे थे।।
मारा-काटा भून दिया, दुश्मन जितने भी पाए थे।
सिंह बहुत गुस्से में भर, अब महिष झुंड में आए थे।।126/203
छिन्न-भिन्न कर दिया सभी को, दुश्मन का संघार किया।
जो भी मिला शत्रु उसको, बस एक वार में मार दिया।।
समय देखता रहा थमा सा, तांडव रण का ये भारी।
जिसके आगे ध्वस्त हुई, मर गई शत्रु सेना सारी।।127/204
आतंकी बन बैठे थे जो, आतंकित उनको बहुत किया।
खून शत्रुओं के दल का, रणचंडी को फिर भेंट किया।।
अस्त्र-शस्त्र कर दिए नष्ट, तोड़े-फोड़े उनके बंकर।
नाश नाचता रहा झूमकर दुश्मन दल के हर शव पर।।128/205
ऐसा हुआ विनाश शत्रु की हिम्मत टूट गई सारी।
भारत से लोहा लेना कितनी थी भूल बड़ी भारी।।
जब तक दुश्मन को इसका कुछ भान हुआ, था बोध हुआ।
नाशयज्ञ सम्पूर्ण हुआ, पूरा तब तक प्रतिशोध हुआ।।129/206
भारत ने खमठोंक दिया आतंकवाद का उत्तर था।
सारा ज़िम्मा महानाश का बस दुश्मन के ही सर था।।
गर्वोन्नत, हर्षोन्नत भारत की सेना जब लौट आई।
जलते दिल को त्राण मिला, ज़ख्मों पर लेप लगा आई।।130/207
शत्रुदेश की धरती पर ध्वज अपना, प्यारा लहराया।
दुश्मन की छाती पर गाड़ा, और तिरंगा फहराया।।
अब जो जग के सम्मुख था वो भारत का था रूप नया।
स्वाभिमान से और भरा, अपने पैरों पर अडिग खड़ा।।131/208
सीना फूल हुआ दुगना था, भारत के हर जन-जन का।
आँखों में उत्कर्ष विजय का, गर्व भरा बस हर मन था।।
ख़ुश थे हम के भारत ने दुश्मन को पाठ पढ़ाया था।
छल करने का, और शत्रुता का प्रतिबिंब दिखाया था।।132/209
दुनिया याद रखे इस से, हम यों तो कुछ भी सहते हैं।
पर जब सीमा टूटे तो तट तोड़, प्रलय बन बहते हैं।।
हम सहेज कर रखते हैं तो जान वार भी देते हैं।
और मिटाने पर आएँ तो, व्योम फाड़ भी देते हैं।।133/210
क्षमा, शक्ति से पहले है हम, यही सीखते आए हैं।
हम विवाद में लक्ष्मण रेखा सदा खींचते आए हैं।।
वसुधा ही परिवार हमारा, हम ये ध्यान सदा रखते।
एक-दूसरे से हिलमिल कर चलते, मान सदा रखते।।134/211
अपने पहले हम दूजे का ध्यान हमेशा रखते हैं।
अपनी तरह सभी का हम सम्मान हमेशा करते हैं।।
हम झुकते हैं पहले, ये ही धर्म हमारा कहता हैं।
प्रेम मनुज से सदा करो ये मर्म हमारा कहता है।।135/212
सार्वभौम में हम तो दर्शन सिर्फ़ हरि का करते हैं।
ध्यान, भक्ति में लीन रहें, हम भजन सदा ही करते हैं।।
पर अपने रक्षण के हित हम जाने शस्त्र उठाना भी।
इस गुण को भारत के दुनिया ने जाना भी, माना भी।।135/213
हम इतने हैं विनयशील, हम गाल पे चाँटा सहते हैं।
पर ना भूलो उत्तर देने की क्षमता भी रखते हैं।।
दुनिया में दूसरी बड़ी सबसे भारत की सेना है।
हम ये कहते नहीं अपितु दुनिया का ही ये कहना है।।134/214
फिर भी हम अपनी तलवारें सदा म्यान में रखते हैं।
अपनी ज़िम्मेदारी को हम सदा ध्यान में रखते हैं।।
जियो और जीने दो, ये ही बस संकल्प हमारा है।
शांति विश्व की बनी रहे, ये ही अभिकल्प हमारा है।।135/215
सुख की धूप सुनहरी घर-घर लहराए, ख़ुशहाली हो।
क्लेश, दुःख की गागर सूखे, वैमनस्य से खाली हो।
प्रेम और सौहार्द परस्पर जन-जन का आधार बने।
परहित, परसेवा जन-जन के ही जीवन का सार बने।।136/216
सभी सुखी हों, दुखी न कोई, यही प्रार्थना करते हैं।
मंगलमय, आनंदित हो जग ,यही कामना करते हैं।।
हम जीते हैं स्वाभिमान से, देते हैं सम्मान सदा।
यथाउचित सब का ही मन से करते हैं हम मान सदा।।137/217
देख तरक्क़ी औरों की हम नहीं कभी भी जलते हैं।
बढ़ता देख अन्य देशों को हाथ कभी ना मलते हैं।।
नहीं किसी को अपने से कम, कभी आँकते हैं जानो।
औरों के घर की सीमा में नहीं झाँकते हैं जानो।।138/218
हम सभ्यता बनाने वाले सभ्य बने रहना चाहें।
स्वाभिमान धारण करते हैं बात यही कहना चाहें।।
जियो और जीने दो इतना ही तो कथन हमारा है।
ऊँचा हो संकल्प सदा बस ये ही ध्येय हमारा है।।139/219
इसीलिए हम कितने अंधड़, तूफानों में जमे रहे।
ऊँचे संकल्पों के बल पर अचल, अडिग हो थमे रहे।।
सदियाँ बीतीं पर भारत की शान, अभी तक वैसी है।
इसकी प्रखर प्रभा अद्भुत है, सूर्य किरण के जैसी है।।140/220
भारत गुरु है सकल विश्व का ये कहने बात नहीं।
इसीलिए संकट के आगे कभी भी पाई मात नहीं।।
ये देवों की धरती जग में अधिक और ही चमकेगी।
दुनिया के माथे पर बनकर बिंदिया सुंदर दमकेगी।।141/221
प्रबल शौर्य की अद्भुत गाथा इसकी गाई जाएगी।
सुनकर जिसको भारत माता, और अधिक हर्षायेगी।।
जिस गाथा में वीरों का गुणगान अनोखा आएगा।
वो भारत की तरुणाई को, फिर सतपंथ दिखाएगा।।142/222
अतः, शौर्यगाथा भारत की पाती है विश्राम यहाँ।
लेकिन रुकी नहीं है, ये गतिशील रहेगी, सदा रवाँ।।
जब-जब वीर मातृभूमि पर, होने को बलि जाएँगे।
हम अपना कर्तव्य निभाकर उनकी जय-जय गाएँगे।।143/223
उनकी बिरुदावलियाँ गाकर दुनिया में पहुँचाएँगे।
उनके यश की गाथा, जन-जन के सुपुर्द कर जाएँगे।।
भाव रत्न उनके चरणों में नित-नित बहुत लुटाएँगे।
अपने शब्द पुष्प लेकर पथ उनका धवल सजाएँगे।।144/224
यही निवेदन करते हैं भारत का गुंजित गान रहे।
जब तक नभ है, धरती है, तब तक इसका यह मान रहे।।
इसकी नदियों में जीवन यूँ ही बहता अविराम रहे।
धूप सुनहरी भरी सुबह, शीतल बयार सी शाम रहे।।145/225
भारत भाग्य हमेशा चमके, ज्यों सूरज की लाली हो।
घर-घर सुख समृद्धि छाए, खेतों में हरियाली हो।।
गलियों में नाचे आनंदित, झूम रही ख़ुशहाली हो।
होली रँगीली हो इसकी, दीपों भरी दिवाली हो।।146/226
आशा करते हैं रण भीषण कभी न ये माटी देखे।
अब न युद्ध सीमा पर हो, न फिर हल्दीघाटी देखे।।
भारत वासी केवल अपनी उज्ज्वल, परिपाटी देखें।
अपना आज सजाएँ हम पुरखों की शुभ थाती देखें।।147/227
अतः, नमन मैं भारत भू को शीष झुकाकर करता हूँ।
और नमन वीरों को गौरव गाथा गाकर करता हूँ।।
शौर्य कथा अमृतपुत्रों की, माँ के पग पर धरता हूँ।
इसके शब्द-शब्द को मैं उसके न्यौछावर करता हूँ।।148/228
एक निवेदन अंतिम है, जन-जन के चरणों में सादर।
भूल हुई हो अगर कोई मन हल्का करना बिसराकर।।
अनुचित जो कुछ लगे जान अज्ञानी क्षमा मुझे करना।
अवगुन कंटक दूर हटाकर, गुण इस रचना के धरना।।149/229
जो भी लिख पाया हूँ, सबकुछ सादर अर्पित करता हूँ।
राष्ट्रभक्ति के पुष्प सुगंधित, सहज समर्पित करता हूँ।।
इसे करो स्वीकार हिन्द की ये जयगाथा उज्ज्वल है।
इसमें निहित भक्ति भारत की, धर्म-धारणा निर्मल है।।150/230
।।इति श्री दिविभूमौ भारतस्य वीरस्य शौर्यगाथा सम्पूर्णम।।