hamarivani badge

a href="http://www.hamarivani.com/update_my_blogg.php?blgid=4653" target="_blank">www.hamarivani.com

Monday, 1 July 2019

हर एक आदमी!!!


इस भीड़ में अनजान है, हर एक आदमी।
इस शहर में मेहमान है, हर एक आदमी।

शोहरत का शहर है यहाँ है रंग की बहार,
फिर भी तो परेशान है, हर एक आदमी।

किस्से हैं यहाँ हर गली, इंसाँ की फ़तह के,
अंदर से पशेमान है, हर एक आदमी।

जिसमें न हैं जज़्बात, वफ़ा, दोस्ती ज़रा,
दुनियावी वो सामान है, हर एक आदमी।

दुनिया में मेरा नाम बड़ा है, वजूद है,
कितना बड़ा नादान है, हर एक आदमी।

ऊपर से ज़िन्दगी के जश्न, रोज़ दिखावे,
अंदर से तो बेजान है, हर एक आदमी।

बाज़ार की रौनक में इतना डूब गया है,
अब खो चुका पहचान है,हर एक आदमी।

सच्चाई, वफ़ा, इश्क़, सभी तो निकल गए,
ख़ाली-सा अब मकान है,  हर एक आदमी।

-अंशुल तिवारी
28.06.19
21:44 (मुम्बई)

Sunday, 16 June 2019

कभी ऐसा हो जाए!!

कभी ऐसा हो जाए, हाँ!!
कभी ऐसा हो जाये!
कभी ऐसा हो जाए, हाँ!!
कभी ऐसा हो जाये!

धड़कन ये तेज़ चलने लगे,
साँसों की लय बढ़ने लगे।
आँखें टिकी हों रास्ते पर,
नींद से लड़ने लगें।

फिर नींद से लड़ते हुए,
आँखें ये देखें ख़्वाब वो।
जिसमें हों तू और मैं लिए,
फिर दोस्ती की शराब को।

अभी ख़्वाब में है तू खड़ा,
जो सामने आ जाए गर।
एक पल में ये दिल हँस पड़े,
सपना सच्चा हो जाए!!!

कभी ऐसा हो जाए, हाँ!!
कभी ऐसा हो जाये! X 2....

जो सामने आ जाए तू,
तुझको गले से लगा लूँ मैं।
यारी को रक्खूँ याद बस,
सारे जहाँ को भुला दूं मैं।

तेरे साथ बातों-बात में,
फिर गुज़रे वक़्त में चल पड़ूँ।
फिर दिन पुराने मैं जिऊँ,
मैं फिर सफ़र पे निकल पड़ूँ।

हम साथ में फिर हँस सकें,
तुझे मैं ये फिर से कह सकूँ!
जो यार तुझसे ना मिलूँ,
जीना मुश्किल हो जाए!!!

कभी ऐसा हो जाए, हाँ!!
कभी ऐसा हो जाये! X 2....

अभी सामने आया नहीं,
आई है बस इसकी ख़बर।
सुनकर जिसे ही है ख़ुशी,
मैं हो गया हूँ बेसबर।

जिस दिन तुझे मिल जाऊँगा,
दिल चैन ये पा जाएगा।
फिर दोस्ती का दिल जो है,
उसको क़रार आ जाएगा।

आँखों में फिर होगा सुकूँ,
जब ख़्वाब सच हो जाएगा।
अब इंतजारी है यही,
तू जल्दी से आ जाए!!

कभी ऐसा हो जाए, हाँ!!
कभी ऐसा हो जाये! X 2...

- अंशुल।

Thursday, 13 June 2019

Prophecy

Prophecy....

The question is not of today,
But will be asked later some day...
When the mother will ask,
And you will have to say...

You will have to reply,
For all that u did..
That will be stuck to your soul,
U can't get rid...

The scars which u gave,
That mother will save...
Those will be shown to you,
O lusty, greedy, slave...

You won't even get,
The time to repent...
You won't get an extra,
Minute to be spent...

It will be un-viable,
For you to even cry...
And there will be no scenario,
Left to even try...

For all u did life long,
Will come to you in misery...
As you harmed nature,
Made the destruction triggery....

-Anshul Tiwari

Sunday, 9 June 2019

श्री राधा चरण विन्याष्टक

।। श्री राधा चरण विन्याष्टक।।

हौं अति हीन मलीन मति, नहिं जानत हौं कछु कर्म पसारो।
जानत हौं नहिं बेद पुरान न, ग्रंथन्ह को कछु सार बिचारो।।
नाहिं असो बड़ भाग कि पावहुँ, संत को संग, न सद्गुरु द्वारो।
मोरे बिलोकत एक गति, सोई भानुसुता तव एक सहारो।।

कर्म न जानउँ, धर्म न जानउँ, और न मर्म की बात सम्भारो।
पाई जनम नर देह सुपावन, भूलि गयो हरि नाम बिसारो।।
केतिक काल बिताई दियो, जग प्रीति में आपनो आप को हारो।
हे गिरिराजप्रिया! अब एक ही मोर भरोस है तोर सहारो।।

कृष्णसखी ब्रजराज प्रिया, तुम्ह हो हरिदास की नित्य दुलारी।
ठकुरानी बरसाने की, ठाकुर बाँके बिहारी को हो अति प्यारी।।
कृष्ण के प्राण की स्वामिनी हो, रसराज के चित्त पे छाप तिहारी।
तुम्हरी कृपाबल ते दुर्लभ गति पावत होवत जीव सुखारी।।

कृष्ण भए जग के गुरु, देवत ज्ञान, तबै गीता दियो गाई।
हौं अज्ञान की खान हमै कछु बात बड़ी नहिं बूझे बुझाई।।
दीन मलीन हौं बुद्धि से हीन, ये ज्ञान कथा हमको न सुहाई।
श्री हरिदास ने हेतु यही, श्री राधिका नाम की कीरति गाई।।

कान सुनै कितने तरि गै, जिन्ह राधिका नाम को कण्ठ बसायो।
कोई न जग्य न जोग कियो, बस राधे ही राधे को गीत सुनायो।।
बात यही सुनिके मोसों पाँवर, पाप परायण जीव लुभायो।
हाथ पसारके द्वार तिहारे श्री श्यामा जू आपन कष्ट सुनायो।।

ओ ब्रजराज की प्राण प्रिया, अभिराम हो श्याम के नैनन को।
तुम्ह तो बरसाने की वासिनी हो, हिय में हो धरे वृंदावन को।।
अब हौं पे कृपालु मयालु बनौ, मन जोड़ दो श्री हरि चरनन सों।
तुम्ह दीनदयालु कहावत हो, अब दीजो कृपा कछु दीनन को।।

श्री कृष्णप्रिया, वृषभानु लली, सब हाथ तिहारे सम्भारो तुमै।
बिगरे-सुधरे सब भाग मोरे, अब हाथ तिहारे सुधारो तुमै।।
करुणानिधि कर करुना सुधि मोरि करो, हतभाग्य सँवारो तुमै।
यह जीवन नाव समर्पित राधिके! पार करो या मारो तुमै।।

कलि सागर पार उतार दिए, जिन राधिका नाम की नाव चढ़े।
तन, मन, धन, जीवन ,सौंप किशोरी को ,राधे ही राधे को नाम रटै।।
अब कीजो कृपा वृषभानु सुता, मन कृष्ण के चरनों से जाई मिलै।
ठकुरानी निवेदन है इतनो, तुम्ह साथ रहो जोई नाम रटै।।

दोहा:-
राधा मेरी स्वामिनी, मैं राधे को दास।
अब कृपालु हो राधिका, ब्रज में दीजो वास।।

।।इति श्री राधा चरण विन्याष्टक सम्पूर्ण।।
।।श्री राधिकार्पणमस्तु।।

-अंशुल।

Tuesday, 28 May 2019

हे सागर!!!

हे अथाह! निःसीम,
जगत के ओर-छोर तक,
फैले सागर,
ओ!! अगाध तुम...
आज बोल दो!!
भेद खोल दो!
मुझे बताओ..…
तुम किस कारण,
क्षण-क्षण में इतने भीषण,
रौरव स्वर में,
क्रंदन करते हो??

क्यूँ इस तरह हुए व्याकुल,
इन चट्टानों पर भाल,
पटकते बस रहते हो??

तुम तो रत्नाकर,
महासिंधु हो!
तुम्हें कमी है कौन बताओ??
पास तुम्हारे संचित कितने रत्नकोश हैं!!
मुक्तामणियों के अगणित आगार,
तुम्हारे चरणों में बेकार पड़े हैं।

ओ ! दुर्लभ तथा अलभ्य वस्तुओं, के रखवाले,
तुम क्यों इतनी बेचैनी से,
यूँ तट तक आकर,
बिन बोले कुछ लौट रहे हो??

मैं बड़ी दूर से आया हूँ,
यों देख तुम्हें, भरमाया हूँ!
ये सोचा नहीं कभी मैंने,
यूँ सब कुछ पाकर भी कोई,
क्या इतना व्याकुल होता है!
क्रंदन करता है ,रोता है??
मैं हतप्रभ होकर,
देख रहा हूँ!
सोच रहा हूँ!
दो पल पास तुम्हारे बैठूँ और सुनूँ तुमसे,
क़िस्सा इस परम वेदना का,
व्याकुलता का, अधीरता का।

पर, मैं तो अभी स्वयं की,
व्याकुलता में डूबा,
भावों के झंझा में उलझा,
भटक रहा हूँ।
विवश भागता फिरता हूँ,
दुर्लभ रत्नों की ही तलाश में!!

मैं फिर आऊँगा पास तुम्हारे,
सुख-दुख सभी सुनूँगा सारे!
तुम धैर्य युक्त हो,
तब तक निज को रोके रखना,
रस्ता तकना!!

-अंशुल तिवारी।

Saturday, 25 May 2019

Mother's agony

Mother's agony...

O my child!
O beloved child!
How I wish I could give you,
The treasures, I used to...
How I wish I could give you,
The gems, I had once....
How I wish I could tell you,
I love you the most!!

O beloved child!!
I wish I could give you,
The sweetest of the fruits,
The purest of the breeze,
All which is precious to keep,
But I'm unable to,
so, as a mother I weep!!

Today I'm forced to live,
with scars on my face!!
Waiting since ages,
for you to embrace!!

Son,
Once I was also pretty and charming,
But now I'm burning in global warming!!
With a burst of population,
Arrived a situation!!
That boosted the heat,
Which is invincible to beat!!
I wish I could fulfill your needs,
But I'm helpless with your deeds!!
You killed forests,
Destroyed greenery,
Turned the Greenlands,
Into a tragic cemetery!!

The gases of green house,
Are rising like a snake...
The crust is depleting!
Resources are at stake!!
O child,
There are so many of you,
But no one to care,
The scene is degrading,
And you will have to stare!!

I despair to see you with meagre,
Shelter ,clothes and food!!!
With such a big population,
You have lesser source of livelihood!!!

I weep to see you lacking,
Long for basic needs,
Fighting each other for,
Casts and creed!!

I wish for all that, I gave,
only a woo...
A small single step,
A favour from you!!

Son,
be kind and control the,
Population,
Or else we will be trapped in,
Such a situation....

We will be ailing in pain,
With nothing to live,
I will be exhausted,
With nothing to give...

-Anshul Tiwari

Tuesday, 14 May 2019

दुविधा

शौक कहता है न सोचूँ ,

बस कहा जो,

कर दिखाऊँ!

और सोचा जो उसे,

हासिल करूँ!

मैं जीत जाऊँ।

ख़्वाब जो भी और जैसा भी,

हुआ,

उसको हक़ीक़त में,

बदलकर,

झोंक कर ख़ुद को इसी,

उत्तेजना में,

स्वप्न गागर, भर सकूँ,

मैं रीत जाऊँ!

पर अगर ऐसा हुआ भी,

घर जला कर,

रौशनी पाई चिराग़ों ने मेरे,

तो क्या हुआ फिर??

आँख ही जब न रहेगी,

कौन देखेगा,

सुहाने ख़्वाब को सच में बदलते।

तो कहो ये दौड़ फिर किसके लिए है?

जान की बाज़ी लगाए,

कोशिशें मुमकिन सभी किसके लिए हैं?

ज़िन्दगी, 

क्या ये लड़ाई है जिसे बस जीतना है?

या, के बस,

हर शौक पूरा कर मुझे यूँ रीतना है?

शौक, सपने, ख़्वाब, चाहत, आरज़ू के,

दरम्याँ मैं हूँ खड़ा,

ये सोचता हूँ!

क्या करूँ मैं, क्या बताऊँ???

-अंशुल तिवारी।

15.05.19

Thursday, 9 May 2019

Mahindra anthem !!

Mahindra anthem song!!

हाँ हम हैं, हाँ हम हैं...x2
हम जोश भरा एक सागर हैं, हिम्मत की एक मिसाल हैं,
हम जो भी करते काम यहाँ, करते हम उसे कमाल हैं।
दुनियाभर में पहचान है ऊँची, ऊँचा अपना नाम है।
हर नामुमकिन को मुमकिन करना, यही हमारा काम है।
सपने सच कर दिखलाए हैं, ऐसी अपनी रफ़्तार है।
है गर्व हमें, सर ऊँचा है, हम महिंद्रा परिवार हैं।।

हम युवा और आज़ाद हमेशा, रग़ में भरे उबाल हैं।
है ख़ून गर्म सर चढ़ बोले, हर क़तरे में ललकार है।
हम लहराते सागर से हैं, हम बहते तेज़ हवाओं से।
मुश्क़िल के पर्वत हार गए, अपनी कोशिश के पाँवों से।
है ज़िम्मेदारी कंधों पर, हिम्मत की हम दीवार हैं।
है गर्व हमें, सर ऊँचा है, हम महिंद्रा परिवार हैं।।

Set the road on fire... x 2

Rap....
(हाँ हाँ ये दुनिया भी, जानती है हमको,
ये मानती है हमको, पहचानती है हमको।
ये ताक़त है हमारी, ये इबादत ही हमारी,
ये क़यामत की है बारी, ये अलामत है हमारी।
जो भी हम कहते हैं वो कर के दिखाते।
हम झंडा india का ऊँचा उठाते।
हम कहते हैं live young live free,
दुनिया को, शोले जीत के दिल में जलाते।
हम राज करें इंडस्ट्री पे,
हैं shark से तेज़ marazzo बनाते।
हम xuv 3oo से,
सड़कों पे देखो आग लगते।
हम रुकते नहीं हैं, हम झुकते नहीं हैं,
हम पत्थर पर उम्मीद उगाते।
हम चीर के दरिया सा सबको दिखाते
हम सबको झुकाएँ, इतिहास बनाते।)

तकनीक नई अपनाते हैं, उत्पादन में सबसे आगे।
हम नए-नए परिकल्प लिए, हर competitor से हैं आगे।
हम कर्म क्षेत्र में अव्वल हैं, दिल में भारत का प्यार है।
है गर्व हमें, सर ऊँचा है, हम महिंद्रा परिवार हैं।।

जो लिया देश से लौटाकर, भारत की शान बढ़ाते हैं।
हम मानवता की सेवा में, ख़ुद अपने हाथ बढ़ाते हैं।
दुनिया में नाम हमारा है, पाया हमने सम्मान है।
US, europe, africa, Australia में ऊँचा नाम है।
हम साथ-साथ बढ़ने का,
हरदम करते सफल विचार हैं।....है गर्व हमें... महिंद्रा परिवार हैं।

अब बात करें हम हरिद्वार की, यहाँ महिंद्रा छाया है।
अपने कर्तव्य और कर्मों से, हमने नाम कमाया है।
गंगा की धरती पर, गंगा-सी, ले तरंग हम चलते हैं।
हरदम आगे बढ़ते रहते, हर कदम rise हम करते हैं।
आँधी, बारिश, तूफानों में भी, पैर न पीछे करते हैं।
TPM  और crusade निभाकर, ख़ुद को बेहतर करते हैं।
है गर्व हमें, हम सभी महिंद्रा, का ही एक विस्तार हैं।
है गर्व हमें, सर ऊँचा है,
हम महिंद्रा हरिद्वार हैं।।
हम महिंद्रा परिवार हैं...

-अंशुल तिवारी।

Saturday, 4 May 2019

ग़ज़ल...गुज़ारिश।।

ग़ज़ल...गुज़ारिश।।

तुम अपने दिल के चराग़ों को तेल तर रक्खो,
भला न सिर्फ़ हवाओं पे ही नज़र रक्खो।

बड़ी हैं मुश्किलें, दुश्वारियाँ भी बेहद हैं,
कठिन है हौसला रखना यहाँ, मग़र रक्खो।

ये है बाज़ार यहाँ, बोलियाँ भी ऊँची हैं,
यहाँ ईमान को अपने टटोलकर रक्खो।

तुम्हें दुनिया सिखा रही है ते उसूल नया,
जो शय है आख़िरी ,उसको ही पेश-तर रक्खो।

बदल गई है रवायत यहाँ पे जीने की,
ज़ुबाँ पे फूल रखो, जिगर में नश्तर रक्खो।

- अंशुल तिवारी।
हरिद्वार
04-05-19

Saturday, 27 April 2019

गाँव!!

मेरी ही तरह,

वो जो मेरा गाँव था ना,

जब छोटा था,

तब अबोध था,

नादान था,

लेन-देन की दुनियावी रिवायत से,

अनजान था।

बड़ा होकर कस्बा बन जाने के,

सपने सजाता था!

अपने गाँव होने पर,

ज़रा सकुचाता था।

पर मजबूर था...क्या करता??

ख़ैर मुझे क्या...!

मैं तो चल पड़ा था, शहर की तरफ़,

तक़दीर से लड़ने,

किस्मत बदलने!!

पर, आज जब अर्से बाद!!

मैं शहर की धूप से जलकर,

दुनियादारी से झुलसकर,

गाँव पहुँचा!!

तो देखा....

अब वो भी शहर बन गया था!!

उसका सपना था, सच हो गया था...

पर,

अब वो शाम ढले भी नहीं सोता है!

आँखों में कोयला भरे,

अकेले में रोता है।

किसी से कुछ नहीं कहता,

बस मुझे जताता है।

मेरी ही तरह, हर-साँस में,

पछताता है!!

-अंशुल तिवारी।

27.04.19

हरिद्वार।।

Friday, 26 April 2019

बदलाव!!

मेरा...
वो छोटा शहर,
वो ख़ुशबाश लोग,
ठंडक देती दीवारें,
हरी-भरी सड़कें,
शहर को जोड़ते पुल,
चूने की  छज्जेदार इमारतें,
पुराने छायादार दरख़्त,
वो हरियाले मैदान,
ज़रूरत को भरते बाज़ार,
पुराना यादगार टॉकीज़,
चाय-बिस्कुट की ठेलियाँ!!!

अब नए हो चुके,
इस शहर में कुछ भी नहीं बचा!

अब यहाँ बस ,
कंक्रीट ही कंक्रीट है,
सड़कों में,
दीवारों में,
इमारतों में,
बाज़ारों में,
शायद,
इंसानों में भी!!

-अंशुल तिवारी
26।04।19
हरिद्वार।।

Friday, 19 April 2019

अगला दृश्य!!

अगला दृश्य!!

हम सोचते कहाँ हैं?
कि आज जो है,
वो कल कैसा होगा!
क्या होगा??
हाँ सोचने की ज़रूरत भी,
किसे महसूस होती है?
बस दिल कहता है,
यूँही सब कुछ चलता रहे।
बिना बदले!
फिर एक दिन अचानक,
ज़िन्दगी...
बदलती है पटरियाँ।
किसी रेल की तरह,
हमें आज से दूर ले जाती है,
बहुत दूर।
ऐसी किसी जगह,
जहाँ कल की कोई परछाई,
तक नहीं होती।
जहाँ हम, तुम, मैं,
पूरी तरह बदल चुके होते हैं,
इस तरह जैसे रंग बदल लेता हो,
गिरगिट!!
और फिर खुलता है,
ज़िन्दगी के रंगमंच का पर्दा,
नाटक के अगले दृश्य का!!!

-अंशुल।

Sunday, 24 March 2019

।।विनय चतुष्पदी।।

दुइ जोरि के हाथ, नाववहुँ माथ, प्रणाम करूँ जिमि दण्ड परै।
मन माँहि मनावउँ, सीस धरूँ, रज चरनन से तव जो निझरे।।
तुम दीन सखा, हम दीन को दीन, इहै हम जानत माँहिं उरै।
हमको निज दास को दास करौ, दरबार खरे हम अर्ज करें।।

सब लोक के नाथ, हो भूतपति, सबके हित के रखवार तुमै।
सब के प्रिय हो, सबके प्रियतम, सबही का धरै हौ भार तुमै।।
सबके भीतर, सबके बाहर, सबही का भए बिस्तार तुमै।
निज भक्तन के तुम प्राण प्रभो, तिनके तो सकल आधार तुमै।।

नहिं रिक्त गए, अभिषिक्त भए, तव द्वार गुहार कियो जिन ने।
जिन जोड़ लिए बन्धन तुम्ह से, भवसागर पार कियो तिन ने।।
तुम्हरी किरपा जिन्ह पाई प्रभो दुख सागर पार कियो तिन ने।
जिनके तुम बन्धु, सखा, स्वामी, निज का उद्धार कियो तिन ने।।

अति दीनदयाल, कृपालु परम्, करुणानिधि, पालक, नाथ तुमै।
तिन को नहिं काम बिचारन को, जिन के हर पग हो साथ तुमै।।
तिन्ह को सागर, कुइयाँ सम है, जिन्ह का गहि लीनो हाथ तुमै।
निज चरनन आश्रय दीन्ह कियो, भक्तन को नाथ, सनाथ तुमै।।

।।इति श्री वृन्दावनचन्द्र चरणे विनयपद निवेदन सम्पूर्ण।।
।।श्री राधिकावल्लभ प्रेरणोत्पन्न:।।
।।श्री श्री श्यामश्यामर्पणमस्तु।।

-अंशुल तिवारी

Friday, 22 March 2019

कबीरा सरारारा

रंगोत्सव की पिचकारियाँ..

जली होलिका, उड़ा अबीरा,
सुन भई साधो, कहत कबीरा!
घाम बढ़ी ,अब काटो खीरा,
मुँह पे नमक लगाए,
जो कड़ुआ बोलें, तिनको भी,
दीजो इहै उपाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

खेलो अपना पर्व मनाओ,
भर पिचकारी रंग उड़ाओ!
तनिक न तुम इसमें सकुचाओ,
जो कोई बाँटे ज्ञान,
गाल लाल उनके कर दीजो,
देसी चपत लगाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

बोले हर्बल रंग लगाओ,
200 रुपए किलो मंगवाओ!
बात ठीक पर, ज़रा बताओ,
जो घर में बनवाएं,
65 रुपए किलो बन जावे,
भर भर हाथ उड़ाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

रंग चले, पाछे फिर हाला,
भैंस बराबर अक्षर काला!
समझें, बैठे पहने माला!
कवि उत्तम कहलाएँ,
गीत लिखें टूटे-फूटे सब,
हमें रहे समझाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

कविता रोई, छंद गुहारे,
शेर गए कितने ही मारे!
पर शायर हिम्मत ना हारे,
कविता को लजवाए,
काग़ज़ काला किये हुए हैं,
बैठे कलम उठाय!
कबीरा सारारारा!! कबीरा सारारारा!!

-अंशुल तिवारी।

Tuesday, 19 March 2019

होली!! 2019

कौन कहता है?.
ज़रूरत है मुझे...
भीड़ की, या किसी हुजूम की ही!
टोलियाँ अब जो मेरे पास नहीं,
न हों वे!
लोग अब जो सभी अनजान हैं,
अनजान रहें!
कौन कहता है?
बिन समूह रंग उड़ते नहीं!!
कौन कहता है?
बिन हुजूम रंग खिलते नहीं!!
मैंने अपने घर में,
आज बनाए हैं रंग,
अपनी मेहनत के साथ,
लिए तुम्हारा ही संग!
कल है होली,
इनको ख़ूब मैं लुटाऊँगा,
रंग जितने हैं, भरे हाथ से,
उड़ाऊँगा,
लाल, पीले, हरे, नीले,
सभी मिलाकर मैं,
कल के दिन,
ख़ूब तयारी से मैं,
ख़ुद अकेला ही,
एक दुनिया को रँग आऊँगा!!

-अंशुल।

Monday, 18 March 2019

बुज़ुर्ग!!

मैंने देखा उनको,
लोग कुछ अजब से हैं!
ज़िन्दगी के सुनहरे रंग लिए,
चाँदनी सर पे ओढ़ रक्खी है!
वक़्त को हाथ में पकड़कर यों,
साथ में उम्र के टहलते हैं।
ज़िन्दगी धूप में गुज़ारी पर,
छाँव जैसे वो मगर लगते हैं।
वो जिन्हें गीत पुराने सारे,
मुँह-ज़बानी हैं याद कितने ही!
आज भी जब कभी अकेले हों,
गुनगुनाते हैं धुन सुनाते ही!
वो जो हर काम सही करते हैं,
वो जो अब नाम भूल जाते हैं।
मैंने देखा उनको.....

वो जो खेतों में थे, जवान हुए।
आज़माने नसीब शहरों में,
गाँव की छाँव छोड़ आए थे।
वो जिनके थे उसूल ऐसे ज्यों,
पत्थरों पे लकीर आई हो।
उलझनें ज़िन्दगी की हों या फिर,
जोड़ने या की गुणाभाग की हो,
चंद लम्हों में वो सुलझाते हैं।
जब कभी पूछना चाहूँ कुछ तो,
कोई किस्सा मुझे सुनाते हैं।
उम्र भर राह में चलते-चलते,
अपनी झोली में तजुर्बे कितने,
कीमती पत्थरों-से रक्खे हैं।
जिनको दो हाथ से लुटाते हैं!
मैंने देखा उनको...

जिनको अब याद नहीं ज़्यादा कुछ,
भूलते पर नहीं बहुत कुछ जो!
वक़्त बीता वो याद करते हैं,
अपनी अच्छी-बुरी कहानी को,
बारहा शौक से दोहराते हैं।
सीख देते हैं, कभी डाँटते हैं,
प्यार बेमोल कभी, बाँटते हैं।
मैं परेशान जो हो जाता हूँ,
ज़िन्दगी से मैं जो घबराता हूँ!
बैठते साथ मेरे कुर्सी पर,
ज़िन्दगी फिर मुझे समझाते हैं!
मैंने देखा उनको...

शौक उनके नहीं बाकी अब कुछ,
सिर्फ़ अपनों का साथ काफ़ी है!
जिनकी आँखों ने वक़्त को देखा,
रंग औ' रूप बदलते देखा,
देख रक्खी है ज़िन्दगी सारी,
अब न जिनको कोई ख़ुमारी है,
लड़खड़ाते हैं मगर,
कदम हैं मज़बूत बड़े,
जिनको अपनी न ख़बर हो शायद,
पर वो बाहोश हुए जीते हैं!
घर की पक्की दीवार जैसे वो,
छत टिकाए हुए अपने ऊपर,
बन के जैसे दुआएँ रहते हैं।
घर में होने से जिनके,
महक बनी रहती है,
जैसे लोभान, धूप और,
हवन की ख़ुशबू।
धीरे-धीरे टहलते हुए,
धीमे कदमों से,
दर-ओ-घर सबको ही महकाते हैं।
मैंने देखा उनको....

-अंशुल तिवारी
(पौत्र: श्री रामप्रकाश तिवारी)

Monday, 11 March 2019

उपदेश!!

उपदेश!!
इस समय की माँग है,
तुम अब गला दो....,
भेंट कर दो अग्नि को,
अपने सभी आभूषणों को,
और पिघला कर बनाओ,
शस्त्र तीखे,
हाथ की चूड़ी गला दो!
चक्र तुम उसका बना लो,
और अंगूठी बना कर,
धार उसमें तुम सजा दो।
तुम गले के हार,
पिघला कर बनाओ खड्ग अपना।
करधनी, पिघलाओ उसको,
रूप दो यमपाश का ही!
पाँव की पाज़ेब, को,
ख़ंजर बनालो।
झोंक झुमके और झूमर,
हवन कर के नाक नथनी,
पैर के बिछुए मिलाकर।
तुम बनाओ एक बरछा,
उड़ रहे अपने धवल,
आँचल को थामो!
ध्वज बनाओ।
साथ ही अपमान की,
अवहेलना की आग पीकर।
नयन का अमृत सुखाओ।
और ये संकल्प कर लो!
अब न बाँटोगी,
कभी, जीवन किसी को,
चीर छाती या उदर को।
अब न दोगी जन्म,
यों कर नष्ट ख़ुदको।
मारकर ख़ुद को,
नहीं इस सृष्टि की रचना करोगी।
प्रण करो,
अब छोड़ दोगी रूप,
ममता से भरा ये!
और धारण अब करोगी
दशभुजाएँ!
रूप गौरी का छिपाकर,
फिर धरोगी रूप काला।
फिर करोगी रक्त से अभिषेक अपना।

-अंशुल तिवारी।

Tuesday, 5 March 2019

सागर!!

उछलता है, मचलता है,
गरज कर, सर उठाता है,
बिफ़रता है, बिखरता है,
सब्र जब छूट जाता है,
तो ढलकर बूँद बनता है, ,
लरज़ता, टूट जाता है।
मगर फिर भी सहेजे ख़ुद,
क़दम रोके हुए अपने,
तट की दहलीज़ का,
बिन कहे पालन करता है,
सागर नहीं तोड़ता, अपनी मर्यादा कभी!

घोर करता विलाप,
रोज़ ही न जाने क्यूँ,
चीखता है, ये गरजता है,
न जाने किस पर,
तटों के बन्ध में जकड़ा हुआ,
महासागर!
पत्थरों पर पटकता हाथ,
सर पटकता है।
लगाए शक्ति समूची, जो भरी भीतर है,
तटों को तोड़ बह निकलने को,
तड़पता है।
मगर न सोच के क्या,
हाथ खींच लेता है,
अपने हर ज़ोर को मुट्ठी में,
भींच लेता है।
लौट आता है, वो दहलीज़ में,
हमेशा ही,
और सागर नहीं तोड़ता,
अपनी मर्यादा कभी!!

वो जानता, उसे कौन रोक सकता है?
जो बहना चाहे उसे, कौन टोक सकता है?
मगर वो जानता है ये,
अगरचे बह निकला,
न जाने कितने घोंसले भी टूट जाएँगे,
आशियाने बने हैं, जो वो बिखर जाएँगे,
कितने कितने ही लोग, जड़ से उखड़ जाएँगे।
इसलिए, रोक अपने आँसूओं को पी-पीकर,
जितनी बेताबियाँ हैं, जज़्ब उन्हें ख़ुद में कर,
वो निगल जाता है, ग़म के दरिया ही सभी,
पर,
सागर नहीं तोड़ता, अपनी मर्यादा कभी!!

-अंशुल।

यार!!

यार कैसा होता है?
यार होता है,
परछाईं-सा!
दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब जैसा!
कदम के निशान की तरह!
वो रहता है हरदम साथ,
बिन कहे, बिन बताए,
जैसे पैरों के नीचे की ज़मीन हो।
वो आधार बनकर भी,
ख़ामोश ही रहता है,
शोर नहीं मचाता।
यार होता है,
पर्स में पड़े छुपे हुए,
बचत के रुपयों जैसा,
वक़्त पड़ने पर काम आता है।
और फिर छुप जाता है,
उसी जगह।
यार होता है,
शराब जैसा,
पुराना हो तो नशा,
और भी बढ़ जाता है जिसका।
ज़ख़्म बाहर के हों, या भीतर के!
दुआ और दवा दोनों ही बन जाता है!
यार लाजवाब होता है,
और ज़रूरी भी!
जैसे जिस्म को साँस।

-अंशुल।

Sunday, 3 March 2019

अस्तित्व

मैं मिट्टी की पैदावार हूँ!
पड़ा था अंश मैं बनके धरा का,
मिला आकार मुझे कुम्हार से,
तपाया काल की भट्टी ने मुझको,
दृढ़ तभी हो सका शायद,
अन्यथा बह गया होता,
समय की जलधार से!!

जो नहीं होता यहाँ पर,
और मैं होता कहीँ तो!
रूप लेकर मैं नया ख़ुद,
खोजता ख़ुद को कहीँ तो!

तब कहानी और होती,
तब रवानी और होती,
भाग्य ये होता अलग,
ये ज़िंदगानी और होती।

कुछ पलों के फेर ने, ये कर दिखाया,
यूँ दिया आकार, यूँ मुझको बनाया।

याद है सबकुछ, कहूँगा,
फिर कभी विस्तार से!!....(समय की जलधार से)....

मैं हुआ जो भी,
हुआ मुझसे यहाँ जो भी!
महज़ संयोग है,
ये योजना मेरी नहीं है!!

है किसी की प्रेरणा,
ये है किसी की योजना,
मुझको चलाता राह जो,
अंजान-सी है।

कोई है जो फ़ैसले लेता है मेरे,
कोई है जो राह में है फूल रखता,
या कभी कंटक उठाकर फेंकता है।

जानता हूँ मैं नहीं हूँ बस अकेला,
खेलता है साथ मेरे, कोई तो उस पार से!!

अतः, मैं ही बस नहीं हूँ, एक कारण,
है नहीं एकाकी ये अस्तित्व मेरा।

कोई मेरे साथ हरदम जी रहा है,
साँस लेता साथ मेरे ही रहा है।

मैं नहीं हूँ जानता वह कौन है जो,
चल रहा है साथ फिर भी मौन है जो।

क्या पता, यूँ छुप रहा, वह कौन है??
रू-ब-रू जो है, सदा मेरी कथा के सार से!!

सत्य बस मेरा यही है,
मैं धरा का एक हिस्सा।
लिख चुका विधिकार जिसका,
अनगिनत में एक किस्सा।

उस कथा पर चल रहा,
मैं पार उसको कर रहा हूँ।
जेब में अनुभव, भले या,
अनभले सब भर रहा हूँ।

जो मिला मुझको, कथा में,
था मेरी लिक्खा हुआ वो।
क्या किया मैंने अभी तक,
जो कि ख़ुद सोचा हुआ हो??

ये महज़ संयोग है,
जो मैं बना हूँ!

हो गया था तय बहुत पहले ही जैसे,
कुछ किया मैंने नहीं तो क्या कहूँ अधिकार से!!

-अंशुल तिवारी।



Friday, 8 February 2019

वृक्ष तुम!!

तुम नहीं हो वृक्ष केवल,
किन्तु तुम इस से परे हो।
भाव के जल से हो सिंचित,
कल्पना के थल खड़े हो।
तुम विचारों की हवाओं,
में सदा ही झूमते हो।
तुम सृजन के मंद झोंकों,
को सदा ही चूमते हो।
कितने अंधड़ सह चुके तुम,
ताप भी कितना सहा है?
मौन रहकर, ही सदा,
संताप भी कितना सहा है?
हाँ अभी हो, तुम पड़े,
माना, धरा में तुम गड़े हो!
पर न भूलो, निश्चयी,
संकल्प में कितने बड़े हो?
वह घड़ी, आएगी जब फिर,
तोड़ सीमाएँ बढोगे!
नव सृजन, की नव कथाएँ,
हाथ से अपने गढ़ोगे!
मौन होकर सृष्टि भी,
देखेगी ये नूतन कहानी!
वृक्ष तुम पा जाओगे,
नव रक्त जब, नूतन जवानी।।

फिर बढ़ोगे, नभ छुओगे,
पात सब होंगे हरे तब।
रस नया, भीतर बहेगा,
तेज से होगे भरे तब।।

-शुभकामनाओं समेत, सादर
अंशुल तिवारी

Monday, 28 January 2019

शौर्यगाथा भाग 05

शौर्यगाथा भाग 05:

सैनिकों का शीष विच्छेदन और उरी हमला।

(वो डसने की काकचेष्टा कभी नहीं पर छोड़ेगा।
विष काला वीरों के ऊपर, सदा-सदा ही छोड़ेगा।।)
….…
लड़कर-लड़कर जब बार-बार भी उसने जीत नहीं पाई।
हार पे अपनी बार-बार दुश्मन की सेना झल्लाई।।
तब झल्लाहट और जलन से भरकर पाप किया भारी।
जाने-अनजाने में ख़ुद कर ली विनाश की तैयारी।।111/188

ये केवल दुष्कृत्य न था, ये न्योता महाकाल को था।
न्योता अरिमर्दन अभ्यासी सैन्यशक्ति विकराल को था।।
ऐसा काम किया निंदित, गिरने की हद हो आई थी।
इंसानी जज़्बातों की हत्या, ही बस करवाई थी।।112/189

जब होकर हत बार-बार, कश्मीर न हथिया पाए।
तब वो इंसानी अस्मत की, सीढ़ी से नीचे आये।।
सारी मानवता को रखकर ताक, काम ये नीच किया।
सिंहों को धोखे से मारा, शीष काटकर भेज दिया।।113/190

हाय! दुःख कैसा भारी, उस माँ के हिस्से आया था।
जिसके सुत का शीष हीन शव उसके ही घर आया था।।
काँप उठी मानवता भी, ये देख दृश्य भीषण भारी।
रोई माता बिलख-बिलख कर, रोई जनता ही सारी।।114/191

सारा भारत अपने शेरों को खोकर ही रोता था।
दुख के इस सागर में, हर जन हृदय हार कर खोता था।।
दुःख यही था, हमने जिनको दिया सहारा, साथ दिया।
पीठ दिखकर हमें उन्होंने, हाथ हमारा काट दिया।।115/192

हमने जिनको अपनी रोटी में हिस्सा दे, खाया था।
बाँट-बाँट कर दिया सभी कुछ, समझा नहीं पराया था।।
उनकी नीयत लेकिन इतनी गिरी हुई थी, ये जाना।
नज़र सदा कश्मीर पे उनकी जमी हुई थी, ये जाना।।116/193

हमने ताकत होते भी जिनपर न खड्ग उठाया था।
उन लोगों ने भ्राताओं का शव घर तक पहुँचाया था।।
क्या समझे थे, हम केवल नम्रता की बोली बोलेंगे।
अगर ज़रूरत पड़ी शत्रु को तलवारों ओर तौलेंगे।।117/194

अरे! काटकर टुकड़े-टुकड़े कर देंगे समझाते हैं।
ये न समझो हिंदुस्तानी, केवल वेद उठाते हैं।।
अब सेना की शक्ति बना, हर जन के नैनों का आँसू।
और नसों में लावा भरता, भारत माता का आँसू।।118/195

हम जिसकी ख़ुशहाली के हित जीवन त्याग सदा कर दें।
उसे रुलाया जिसने उसको कैसे माफ़ ज़रा कर दें।।
दो हज़ार सोलह में फिर दुश्मन घर घुसकर आया था।
काश्मीर के उरी कैम्प में घात लगाजर आया था।।119/196

चुपके-चुपके, गीदड़ बनकर सिंह गुफ़ा में आ बैठे।
और भोर में सोते शेरों पर सत्रह गोले फैंके।।
हुआ अचानक हमला इससे शेर सम्भल न पाए थे।
और शत्रु पूरी तैयारी करके घात लगाए थे।।120/197

उरी कैम्प में मौका पाकर, फिर धोखे से वार किया।
सोते सिंहों को अवसर पाकर, वैरी ने मार दिया।।
इस हमले में सत्रह शेरों ने अपना बलिदान दिया।
लड़ते-लड़ते चढ़े वीरगति माँ को अंत प्रणाम किया।।121/198

दुश्मन ख़ुश था, जैसे वह तो भारत से हो जीत गया।
बड़ा दुःख देकर ये पल भी जैसे-जैसे बीत गया।।
अबकी बार नहीं लेकिन भारत ने खड्ग रखा अंदर।
जाग उठा था महातेज, जागी पौरुष की ज्वाल प्रखर।।122/199

अब करुणाकर ने खोला था, नयन तीसरा क्रोध भरा।
और किया निश्चय लेंगे, बदला भीषण, प्रतिशोध भरा।।
ढूंढ-ढूंढ कर मारेंगे, वैरी के प्राण सुखाएँगे।
तभी शहीदों के तर्पण को पूरा हम कर पाएँगे।।123/200

जब तक वैरी बचा रहा, हम सुख से ना रह पाएँगे।
भारत से धोखा करने का पाठ उन्हें पढ़वाएँगे।।
भारत ने तानी थी आँखें, जिनमें अद्भुत ज्वाला थी।
महाकाल ने मुँह खोल, अरि सेना बनी निवाला थी।।124/201

तुरत हुआ आदेश प्रमुख ने सेना को सन्देश दिया।
शस्त्र बनी बदले की ज्वाला, नस-नस में आवेश लिया।।
और परम घातक रणधीरों को अपने तैयार किया।
दुश्मन को उसकी ही भाषा में उत्तर इस बार दिया।।125/202

महावीर अब छद्म रूप में दुश्मन से जा जूझे थे।
ऐसा हमला हुआ, स्वप्न में वैरी जिसे न बूझे थे।।
मारा-काटा भून दिया, दुश्मन जितने भी पाए थे।
सिंह बहुत गुस्से में भर, अब महिष झुंड में आए थे।।126/203

छिन्न-भिन्न कर दिया सभी को, दुश्मन का संघार किया।
जो भी मिला शत्रु उसको, बस एक वार में मार दिया।।
समय देखता रहा थमा सा, तांडव रण का ये भारी।
जिसके आगे ध्वस्त हुई, मर गई शत्रु सेना सारी।।127/204

आतंकी बन बैठे थे जो, आतंकित उनको बहुत किया।
खून शत्रुओं के दल का, रणचंडी को फिर भेंट किया।।
अस्त्र-शस्त्र कर दिए नष्ट, तोड़े-फोड़े उनके बंकर।
नाश नाचता रहा झूमकर दुश्मन दल के हर शव पर।।128/205

ऐसा हुआ विनाश शत्रु की हिम्मत टूट गई सारी।
भारत से लोहा लेना कितनी थी भूल बड़ी भारी।।
जब तक दुश्मन को इसका कुछ भान हुआ, था बोध हुआ।
नाशयज्ञ सम्पूर्ण हुआ, पूरा तब तक प्रतिशोध हुआ।।129/206

भारत ने खमठोंक दिया आतंकवाद का उत्तर था।
सारा ज़िम्मा महानाश का बस दुश्मन के ही सर था।।
गर्वोन्नत, हर्षोन्नत भारत की सेना जब लौट आई।
जलते दिल को त्राण मिला, ज़ख्मों पर लेप लगा आई।।130/207

शत्रुदेश की धरती पर ध्वज अपना, प्यारा लहराया।
दुश्मन की छाती पर गाड़ा, और तिरंगा फहराया।।
अब जो जग के सम्मुख था वो भारत का था रूप नया।
स्वाभिमान से और भरा, अपने पैरों पर अडिग खड़ा।।131/208

सीना फूल हुआ दुगना था, भारत के हर जन-जन का।
आँखों में उत्कर्ष विजय का, गर्व भरा बस हर मन था।।
ख़ुश थे हम के भारत ने दुश्मन को पाठ पढ़ाया था।
छल करने का, और शत्रुता का प्रतिबिंब दिखाया था।।132/209

दुनिया याद रखे इस से, हम यों तो कुछ भी सहते हैं।
पर जब सीमा टूटे तो तट तोड़, प्रलय बन बहते हैं।।
हम सहेज कर रखते हैं तो जान वार भी देते हैं।
और मिटाने पर आएँ तो, व्योम फाड़ भी देते हैं।।133/210

क्षमा, शक्ति से पहले है हम, यही सीखते आए हैं।
हम विवाद में लक्ष्मण रेखा सदा खींचते आए हैं।।
वसुधा ही परिवार हमारा, हम ये ध्यान सदा रखते।
एक-दूसरे से हिलमिल कर चलते, मान सदा रखते।।134/211

अपने पहले हम दूजे का ध्यान हमेशा रखते हैं।
अपनी तरह सभी का हम सम्मान हमेशा करते हैं।।
हम झुकते हैं पहले, ये ही धर्म हमारा कहता हैं।
प्रेम मनुज से सदा करो ये मर्म हमारा कहता है।।135/212

सार्वभौम में हम तो दर्शन सिर्फ़ हरि का करते हैं।
ध्यान, भक्ति में लीन रहें, हम भजन सदा ही करते हैं।।
पर अपने रक्षण के हित हम जाने शस्त्र उठाना भी।
इस गुण को भारत के दुनिया ने जाना भी, माना भी।।135/213

हम इतने हैं विनयशील, हम गाल पे चाँटा सहते हैं।
पर ना भूलो उत्तर देने की क्षमता भी रखते हैं।।
दुनिया में दूसरी बड़ी सबसे भारत की सेना है।
हम ये कहते नहीं अपितु दुनिया का ही ये कहना है।।134/214

फिर भी हम अपनी तलवारें सदा म्यान में रखते हैं।
अपनी ज़िम्मेदारी को हम सदा ध्यान में रखते हैं।।
जियो और जीने दो, ये ही बस संकल्प हमारा है।
शांति विश्व की बनी रहे, ये ही अभिकल्प हमारा है।।135/215

सुख की धूप सुनहरी घर-घर लहराए, ख़ुशहाली हो।
क्लेश, दुःख की गागर सूखे, वैमनस्य से खाली हो।
प्रेम और सौहार्द परस्पर जन-जन का आधार बने।
परहित, परसेवा जन-जन के ही जीवन का सार बने।।136/216

सभी सुखी हों, दुखी न कोई, यही प्रार्थना करते हैं।
मंगलमय, आनंदित हो जग ,यही कामना करते हैं।।
हम जीते हैं स्वाभिमान से, देते हैं सम्मान सदा।
यथाउचित सब का ही मन से करते हैं हम मान सदा।।137/217

देख तरक्क़ी औरों की हम नहीं कभी भी जलते हैं।
बढ़ता देख अन्य देशों को हाथ कभी ना मलते हैं।।
नहीं किसी को अपने से कम, कभी आँकते हैं जानो।
औरों के घर की सीमा में नहीं झाँकते हैं जानो।।138/218

हम सभ्यता बनाने वाले सभ्य बने रहना चाहें।
स्वाभिमान धारण करते हैं बात यही कहना चाहें।।
जियो और जीने दो इतना ही तो कथन हमारा है।
ऊँचा हो संकल्प सदा बस ये ही ध्येय हमारा है।।139/219

इसीलिए हम कितने अंधड़, तूफानों में जमे रहे।
ऊँचे संकल्पों के बल पर अचल, अडिग हो थमे रहे।।
सदियाँ बीतीं पर भारत की शान, अभी तक वैसी है।
इसकी प्रखर प्रभा अद्भुत है, सूर्य किरण के जैसी है।।140/220

भारत गुरु है सकल विश्व का ये कहने बात नहीं।
इसीलिए संकट के आगे कभी भी पाई मात नहीं।।
ये देवों की धरती जग में अधिक और ही चमकेगी।
दुनिया के माथे पर बनकर बिंदिया सुंदर दमकेगी।।141/221

प्रबल शौर्य की अद्भुत गाथा इसकी गाई जाएगी।
सुनकर जिसको भारत माता, और अधिक हर्षायेगी।।
जिस गाथा में वीरों का गुणगान अनोखा आएगा।
वो भारत की तरुणाई को, फिर सतपंथ दिखाएगा।।142/222

अतः, शौर्यगाथा भारत की पाती है विश्राम यहाँ।
लेकिन रुकी नहीं है, ये गतिशील रहेगी, सदा रवाँ।।
जब-जब वीर मातृभूमि पर, होने को बलि जाएँगे।
हम अपना कर्तव्य निभाकर उनकी जय-जय गाएँगे।।143/223

उनकी बिरुदावलियाँ गाकर दुनिया में पहुँचाएँगे।
उनके यश की गाथा, जन-जन के सुपुर्द कर जाएँगे।।
भाव रत्न उनके चरणों में नित-नित बहुत लुटाएँगे।
अपने शब्द पुष्प लेकर पथ उनका धवल सजाएँगे।।144/224

यही निवेदन करते हैं भारत का गुंजित गान रहे।
जब तक नभ है, धरती है, तब तक इसका यह मान रहे।।
इसकी नदियों में जीवन यूँ ही बहता अविराम रहे।
धूप सुनहरी भरी सुबह, शीतल बयार सी शाम रहे।।145/225

भारत भाग्य हमेशा चमके, ज्यों सूरज की लाली हो।
घर-घर सुख समृद्धि छाए, खेतों में हरियाली हो।।
गलियों में नाचे आनंदित, झूम रही ख़ुशहाली हो।
होली रँगीली हो इसकी, दीपों भरी दिवाली हो।।146/226

आशा करते हैं रण भीषण कभी न ये माटी देखे।
अब न युद्ध सीमा पर हो, न फिर हल्दीघाटी देखे।।
भारत वासी केवल अपनी उज्ज्वल, परिपाटी देखें।
अपना आज सजाएँ हम पुरखों की शुभ थाती देखें।।147/227

अतः, नमन मैं भारत भू को शीष झुकाकर करता हूँ।
और नमन वीरों को गौरव गाथा गाकर करता हूँ।।
शौर्य कथा अमृतपुत्रों की, माँ के पग पर धरता हूँ।
इसके शब्द-शब्द को मैं उसके न्यौछावर करता हूँ।।148/228

एक निवेदन अंतिम है, जन-जन के चरणों में सादर।
भूल हुई हो अगर कोई मन हल्का करना बिसराकर।।
अनुचित जो कुछ लगे जान अज्ञानी क्षमा मुझे करना।
अवगुन कंटक दूर हटाकर, गुण इस रचना के धरना।।149/229

जो भी लिख पाया हूँ, सबकुछ सादर अर्पित करता हूँ।
राष्ट्रभक्ति के पुष्प सुगंधित, सहज समर्पित करता हूँ।।
इसे करो स्वीकार हिन्द की ये जयगाथा उज्ज्वल है।
इसमें निहित भक्ति भारत की, धर्म-धारणा निर्मल है।।150/230

।।इति श्री दिविभूमौ भारतस्य वीरस्य शौर्यगाथा सम्पूर्णम।।