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Tuesday, 25 December 2018

सिद्धांत !!!

सिद्धांत !!

इतना आसान नहीं होता किसी सिद्धांत को ललकारना, चुनौती देना, क्योंकि सिद्धांत यूँ ही नहीं उग आते, कुकुरमुत्ते की तरह या गाजर घास के झुंड की तरह।
सिद्धान्त जन्मते हैं अस्तित्व के पत्थर की पीठ पर, वास्तविकता की पथरीली भूमि पर, प्रकट सत्य की तेज़ आँच सहकर। सिद्धांत महज़ नियम नहीं होते, जिन्हें सहूलियत के अनुसार बदल जा सके। सिद्धांत तो अटल होते हैं, जैसे सदियों से अपनी जगह खड़ा कोई गिरी, न अपनी जगह छोड़ेगा, न ही झुकेगा। उन्हें बदलना उतना ही मुश्क़िल है जितना कि गुज़रे वक़्त को लौटा पाना।

बस यही विशिष्टता होती है सिद्धांतों की, फ़र्क इतना है कि इनमें कुछ प्रकृति के समन्वय से पैदा होते हैं और कुछ होते हैं जगत व्यवहार की उपज !!

पर इन बातों की चिंता आप न करें, आप तो बस सावधानी इतनी रखें कि किसी भी या किसी की बुद्धि जनित विचार को या नियम को सिद्धांत न मानें!! बुद्धि, नियम, विचार, चिंतन की सीमा है किंतु सिद्धांत उस मणि से होते हैं जो हर गज के मस्तक में नहीं बस्ती, 
निश्चय की पराकाष्ठा से भी ऊपर उगने वाली सुदुर्लभ अमृत बूटी से होते हैं।
सिद्धांत, वही होते हैं...जो बार-बार कसे जाते हैं कसौटी पर। चाहे कसौटी समय की हो, या परिस्थिति की।
जिन्हें परीक्षा की आग पर सदा जलना होता है, जो सदा परखे जाते हैं, जाँचे जाते हैं, आँके जाते हैं।
सिद्धांत वही कहलाते हैं तो चोट को सहकर पाषाण से प्रतिमा बनते हैं, ताप को झेल कुंदन बनते हैं, इसी में उनका गौरव है।
तो आप भी कभी समय की कसौटी पर घिसे जाएँ, परिस्तिथि के पत्थर पे पीसे जाएँ तो याद रखें, स्वयं को साधुवाद कहना न भूलें।
इसलिए कि आपमें कुछ बात है। क्योंकि, यही प्रकृति का सिद्धांत है!!

-अंशुल तिवारी।

किस्से !!!

किस्से...
सुना था जब ज़िन्दगी में कुछ समझ न आये...तो कोई किस्सा पढ़ो या सुनो।
किस्से तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हे तुम्हारी तनाव भरी दुनिया के चंगुल से निकाल कर ले जाएंगे अपनी दुनिया में...किस्सों की दुनिया में।
जहाँ तुम देखोगे वो सब जो कभी देखा ही नहीं तुमने, या सुना भी नहीं...कभी-कभी वो जो तुम चाहते थे हमेशा ही...जिसे पाने के लिए चल भी पड़े थे, पर एक कड़क आवाज़ सुनकर वापस लौट आये थे।
दिखेगा वो सपना भी जो हमेशा तुम्हारे भीतर पलता रहा, अमरबेल की तरह तुम्हारे विचार का थोड़ा-सा पानी पीकर ज़िंदा रहा, मरा नहीं।
जिसे तुमने हमेशा किसी पुराने कपड़े की तरह मन के दराज़ में सबसे नीचे ठूस दिया था!
किस्से तुम्हें ले जाएँगे वहाँ जहाँ तुम रहोगे, किसी नए इंसान की तरह, जैसे नए देश में नया नागरिक हो बिना पहचान पत्र के, या नए स्कूल में आया बच्चा बिना रोल नम्बर के। केवल तुम और तुम...न अतीत होगा, न भविष्य...सिर्फ तुम्हारे ख़्याल, चाहतें, तमन्नाएं वो भले जितनी असम्भव हों...मुक़म्मल होंगी....।
किस्से तुम्हें यकीन दिलाएंगे तुम्हारे अस्तित्व का,तुम्हें तुम्हारे होने का अहसास कराएंगे!! जिसे तुम भूलने लगे हो।
किस्से तुम्हारे साथी बनेंगे, साथ बैठकर बातें करेंगे तुमसे...तुम्हारी बातें! दूसरों की बातें! इधर की बातें! उधर की बातें!

मैंने ये सुना है...कभी तुम भी अकेलापन महसूस करो तो आना किस्सों की दुनिया में!!
कहानियों के लोक में!!

-अंशुल तिवारी।

Sunday, 23 December 2018

रचनाकार!!

सुबह-सुबह,
जब सब शुरू कर रहे थे...
अपने-अपने काम!!
वो भी उठा..
और लग गया
अपने काम में...
वो भागने लगा...और,,
तेज़ी से भागता रहा!!

कभी आँगन में,
दौड़ती धूप के पीछे!!

कभी खिड़की पे फुदकती,
चिड़िया के पीछे!!

कभी, खेत में नाचती,
लहराती, सरसों को पकड़ने!!
कभी, गुनगुनाती,
बलखाती, नदी को जकड़ने!!

कभी,
गरजते, घुमड़ते बादल को थामने!!
या, इंद्रधनुष पर कोई डोरी बांधने!!

कभी,
क्षितिज की दूरी नापने! या,
अनगिन तारों की संख्या भाँपने!!

कभी,
चमकते, चढ़ते चाँद को रोकने!! या,
जल्दी में चलती रात को टोकने!!

कभी, इतनी जल्द आ-जाने पर,
सूरज को डाँटने!
कभी,
सुबह उगी, ताज़ी-ताज़ी किरणें, छाँटने!
या,
बिखरी रोशनी में अपना हिस्सा बाँटने!!

वो भागता रहा, पर नाकाम रहा!
हर कोशिश का हार ही अंजाम रहा!!

सफ़लता, जब उसके हाथ न आई,
दुखी हो, इस छलावे से,
उसने ये तरकीब लगाई,
योजना बनाई!!
लेने इस पराजय का प्रतिशोध,
कलम उठाई,
कागज़ पर शब्दों की, सेना बनाई!!
और इन ख़यालों पर कर दी चढ़ाई!!
छंद, बंध के व्यूह में आख़िर,
ये ख़्याल उलझ गए।

जाल में कविता के आख़िर, फँस गए,
सदा-सदा के लिए, डायरी में बस गए।

इस तरह, उदासी का वो पल बीत गया,
कल्पना हार गई ,रचनाकार जीत गया।

- अंशुल तिवारी।
23.12.18
हरिद्वार।

Thursday, 6 December 2018

वह जवानी क्या??

वह जवानी क्या? के जो ना कर रही निर्माण हो।
वह जवानी क्या? के जो ना चढ़ रही परवान हो।
जो डिगा ना दे, गिरि को अपनी बस हुंकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना कर रही उत्थान हो।

जो न बेड़ी डाल दे अविजित रिपु के पाँव में।
चीर धरती जो निकाले सुख, दुःखों की छाँव में।
जो न दहला दे अरिदल को महज़ ललकार से।
वह जवानी क्या? के जो ना शौर्य का परिमाण हो।

जो उठाये हाथ ना ढोने किसी के भार को।
जो न कर पाए प्रकाशित तेज से संसार को।
जो न आए सामने, निर्भीक हो प्रतिकार से।
वह जवानी क्या? के जिसका ध्येय ना परित्राण हो।

-अंशुल।

परित्राण- कष्ट से मुक्ति दिलाना।
परिमाण- मात्र, या नाप।
प्रतिकार- विरोध।
अरिदल- शत्रु का समूह।
अविजित रिपु- अजेय शत्रु।
ध्येय- लक्ष्य।

एक तरफ़ ज़िन्दगी का है जोखम..

उलझनें ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा होती हैं, ऐसा हिस्सा जो न हो तो भी मुसीबत और हो तो भी....

एक तरफ़ ज़िन्दगी का है जोखम,
एक तरफ़ शायरी का पेचो ख़म।

एक तरफ़ चोट, दर्द,आहें हैं,
एक तरफ़ ज़ख़्म के लिए मरहम।

एक तरफ़ ठेस, गर्म साँसें हैं,
एक तरफ़ बरसता सुकूँ हरदम।

एक तरफ़ सूख गया दरिया भी,
एक तरफ़ बारिशों का है मौसम।

एक तरफ़ गर्म लू के झोंके हैं,
एक तरफ़ ठंडी हवा, है मद्धम।

जाऊँ किस ओर यही सोचता हूँ,
फ़ैसला जंग से नहीं है कम।

-अंशुल।

छलावा...

रात गए,
कुछ ख़याल आ गए,
बस बेखटके,
बिना कहे कुछ,
अनचाहे मेहमानों जैसे।

आ धमके कमरे में मेरे,
धरना देकर बैठ गए फिर।

मैं तो बस सोने वाला था,
नींद में जा खोने वाला था।
दिनभर की सब दौड़-भाग,
और उठा-पटक से बचकर, छुपकर।
थके, परेशाँ चहरे को, अंधियारे से,
धोने वाला था।

लेकिन इन कम्बख्तों ने,
पुरज़ोर कोशिशें करके,
मुझको जगा दिया।

पास आ रही निद्रा, को भी भगा दिया।

मैं भी उठा, तैश में आया,
आज क़ैद कर लूँगा इनको,
सोच के काग़ज़ क़लम उठाया।

लेकिन तब ये मैंने पाया......

ख़याल मुझे फिर चकमा देकर चले गए थे,
बेक़सूर, हम रोज़ की तरह छले गए थे।

अब कमरे में मैं था, काग़ज़ क़लम वहीं थे,
निद्राहीन नयन थे, लेकिन शब्द नहीं थे।

- अंशुल तिवारी।
11.05.2017

यहाँ राहों में जो कोहरा...

यहाँ राहों में जो कोहरा घना है,
शहर के वास्ते किसने चुना है?

जहाँ देखो पड़ी है, गाँठ कोई,
ये ताना इस क़दर किसने बुना है?

शहर में बन गया कानून कैसा?
कहे जो सच वही बस अनसुना है।

जिसे हम-सब मसीहा मानते थे,
वही क़ातिल हमारा क्यूँ बना है??

जो डूबा है, वही तैरा यहाँ पर,
ये क़िस्सा हमने, माझी से सुना है।

कहाँ ले जाएँगी राहें तुम्हें ये?,
सफ़र बोलेगा जो तुमने चुना है।

कहें क्या?? तुम तो सबकुछ जानते हो,
मेरी चुप्पी को भी तुमने सुना है।

- अंशुल।

तुम्हारा साथ...

तुम्हारा साथ है,
जैसे भरोसा,
भरोसा जो भी होगा,
ठीक होगा।।

तुम्हारा साथ है,
जैसे दिलासा,
दिलासा ये कि मंज़िल,
मंज़िल पास होगी।

तुम्हारा साथ है,
मंदाकिनी-सा,
भरी है जिसमें शीतलता,
अनोखी।

तुम्हारा साथ है,
तारावली-सा,
प्रकाशित जिससे जीवन,
का ये पथ है।

तुम्हारा साथ है,
गीतावली-सा,
है गुंजित गीत-सा हर,
शब्द जिसका।

तुम्हारा साथ है,
जीवन का संबल,
है मुश्किल राह भी,
आसान जिससे।

- अंशुल।।

हिंदी दिवस!!!

हिंदी दिवस की सह्रदय बधाई....
हिंदी हम सबके मन की भाषा है ,विचारों की आत्मा है, शब्दों का प्राण है और अभिव्यक्ति का वरदान है। फिर भी हम हिंदी का दिन मनाते हैं ,ये अफ़सोस की बात है।

आज के अवसर पर एक व्यंग्यात्मक कविता...(शायद हम सब की सत्यता पर आधारित),
********************

बड़ा गर्व है आज हमें,हम हिंदी दिवस मानते हैं।
सुनकर, पढ़कर, हिंदी को हम आज बड़े हर्षाते हैं।

वसे हम हैं बड़े मॉडर्न पर संस्कारी भी तो हैं,
हिंदी की महिमा मण्डित करने में ज़ोर दिखाते हैं।

व्हाट्सएप्प हो या फ़ेसबुक के स्टेटस में या स्टोरी में,
अच्छी-अच्छी चार पंक्तियाँ, शिद्दत से चिपकाते हैं।

हिंदी के बिन क्या होगा, इस सकल जगत का सोचो तो,
कुछ ऐसे गंभीर प्रश्न कर, चिन्ता ख़ूब जताते हैं।

भीड़ जुटा, संगठन बनाकर, आयोजित एक बैठक कर,
पारंपरिक ढंग से सजने, कुर्ता प्रेस कराते हैं।

खादी की 'बादामी' अचकन, अपने तन पर धारण कर,
हिंदी समारोह में जाने को, तत्पर हो जाते हैं।

वहाँ बुलाकर किसी वृद्ध लेखक को, मंचासीन बना,
कितने हम भाषा प्रेमी हैं, लोगों को दिखलाते हैं।

और इस तरह कुछ घंटों में प्रेम जताकर हिंदी पर,
खाना खा-कर, छुट्टी पा-कर, अपने घर को जाते हैं।

बड़ी ख़ुशी की बात है हम, अपनी भाषा पर मान करें,
पर है दुःखप्रद बात अन्य दिन उसका हम अपमान करें।

बड़ा ढिंढोरा पीटें, दिन एक उत्सव खूब मनाएँ हम,
और अन्य दिन उस भाषा को बोलें और लजाएँ हम।

सोचो यदि होटल में जाकर हिंदी हम बोलेंगे,
सुनने वाले क्या सोचेंगे, हमको कैसे तौलेंगे।

और पार्टियों में जाकर जब हिंदी में बतियाओगे,
अपनी इज़्ज़त को क्या ख़ुद ही मिट्टी में मिलवाओगे,
ताने देंगे 'सुधिजन' तुमको, अनपढ़ ही कहलाओगे।

ऐसे क्षुद्र विचार लिए, हम समुन्नत कहलाते हैं,
प्रगत बुद्धि पर अपनी देखो, रह-रहकर इठलाते हैं।

सम्मेलन करने से बेहतर है संकल्प उठाएँ हम,
निज भाषा पर गर्व करें, मन से हिंदी अपनाएँ हम।

- अंशुल तिवारी।
(हिंदी दिवस विशेष)
...१४.०९.२०१७....

Wednesday, 5 December 2018

तलाश

पराये इस शहर में दिल चला फिर ढूंढने अपना कोई,
तलाश-ए-अंजुमन फिर रह गयी बेकार ही, बेज़ार ही.

किया क्या कुफ्र जो नादान ने खुद को ज़रा बहला लिया,
के बस चाहा था करना ज़िन्दगी गुलफाम ही, गुलज़ार ही.

मुक़द्दर के लिफाफे में था क्या रक्खा मेरी खातिर सनम,
नियामत बताकर दे गया सुलगे हुए अंगार ही.

रह-ए-गुज़र पर थे मिले जो चेहरे मुझको यहाँ,
ग़म बांटने के बस लगे थे सबपे इश्तेहार ही.

मिला न कोई अपना इस भरे बाजार की सी भीड़ में,
चला था साथ जिसके रह, गयी बस साथ में तन्हाई ही.

मैं भागता हूँ!!

मैं भागता हूँ।।

कभी कुछ पा जाने को,
किसी का हो जाने को।
कभी तो रूठ जाने को ,
कभी उसको मनाने को।
कभी दिल की सुनाने को,
कभी कुछ गुनगुनाने को।
कभी आंसू बहाने को,
तो कभी मुस्कुराने को।

मैं भागता हूँ,,

बाहों में सामाने को,
या पलकों पे उठाने को।
कभी कुछ पल चुराने को,
या फिर सब कुछ लुटाने को।
कभी बस डूब जाने को,
या उठ कर पार जाने को।
कभी कुछ याद करने को,
कभी कुछ भूल जाने को।

मैं भागता हूँ,,

कहीं पर पहुँच जाने को,
या वापस लौट आने को।

मैं भागत हूँ,,

कभी सब छोड़ जाने को,,

और कभी,,,......खुद से ही।

Tuesday, 4 December 2018

प्रतिशोध!!!

अपने भीतर छुपे तेज का होना बोध ज़रूरी है,
जीवन है रण सघन जगत में, तो प्रतिशोध ज़रूरी है।

सरल हृदय ने, मधुर वचन से, अब तक था संवाद किया,
सुनकर इसने कठिन शब्द भी, हँसकर ही प्रतिवाद दिया।

कुंद मना जन लेकिन इसको दुर्बलता ही मान गए,
मन के शुभ संकल्पों को ये, कायरता ही जान गए।

शांति, प्रेम की बोली को ये, हार तुम्हारी मान गए,
और विनयनत ग्रीवा को लाचार, तुम्हारी मान गए।

शब्द शिष्टता की सीमा से जब आगे बढ़ जाते हों,
तब निज स्वाभिमान के ख़ातिर, कुछ प्रतिरोध ज़रूरी है।

वो टूटा तारा!!

वो चमका था अंधेरी, स्याह शब में,
किसी को उसने था रस्ता दिखाया,
किसी का वो था बिछड़ा मीत जैसे,
किसी की रात का वो था सहारा,
किसी की मौज-ए-ग़म का था किनारा,
किसी के दिल का था वो एक टुकड़ा,
किसी की आँख का था नूर शायद,
किसी का वो सुनहरा ख़्वाब ही था,
किसी की ज़िंदगी की था वो मंज़िल,
किसी के दिल बहलने की वजह था,
किसी सीने को ठंडक की तरह था,
किसी आवारगी का था वो साथी,
किसी बुझते दिए कि था वो हिम्मत,
किसी उजड़े हुए खंडहर की रौनक,
किसी जलती शमाँ का हौसला था,
किसी के लिए बस इक सिलसिला था,

मग़र, वो था नहीं बस एक तारा,
किसी की थी वो जैसे सारी दुनिया।

कई धागे जुड़े थे उससे सबके,
सभी के ही जुड़े उससे थे रिश्ते।

मेरी भी थी उसी से एक ख़्वाहिश,
जो मैं चाहूँ वही दे जाए मुझको।

यही बस सोचकर देखा जो मैंने,
मेरी चाहत को ही करने मुकम्मल,
फ़लक से टूटकर यों गिर पड़ा वो,
मिला यों धूल में टूटा वो तारा,

मैं था हैरान के ये क्या हुआ था??
मेरी ख़्वाहिश हुई थी क्या मुकम्मल??
या टूटी थी, न जाने कितनीं दुनिया?

-अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 04.12.18

Sunday, 2 December 2018

धूलि ब्रजधाम की!!

देवन्ह को दुर्लभ, सुर को सुलभ नाहिं,
ईश्वर को इच्छित है, धूलि ब्रजधाम की।
हरिपद अवतरी, गंग सम भावति है,
कृष्ण पद राजति ये, धूलि ब्रजधाम की।
चौदह भुवन तीन, लोक सब हारि गए,
हरि मन भाई है ये, धूलि ब्रजधाम की।
जप, तप, यज्ञ, दान, जेते कर्म ये महान,
फल योग सबको है, धूलि ब्रजधाम की।

- अंशुल तिवारी
(ब्रजधाम दर्शन)

Friday, 30 November 2018

ब्रज माटी

जिस माटी को बालकृष्ण ने अपने तन पर स्थान दिया,
ब्रजवासी, ब्रजराज कहाए, जिसको चिर सम्मान दिया।
उसका दर्शन स्वयं कृष्ण के दर्शन से कम होगा?
जिस माटी ने भारत को केशव सा तनय महान दिया।

-अंशुल।

(01.12.18// वृंदावन दर्शन)

Wednesday, 28 November 2018

ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे!!

कहानी जंग की सारी कहेंगे,
ये दीपक रात भर यूँही जलेंगे।

सियाही रात की सारी धुलेगी,
ये झरने रौशनी के जब बहेंगे।

अकेला दीप जब देगा चुनौती,
अंधेरे हाथ बस अपने मलेंगे।

ख़ुदा! इस नर्म दिल पे वार तीखे,
बता तू ही भला कब तक सहेंगे।

कभी तो चाँद बन के आओगी तुम,
कभी तो आशिक़ों के दिन फिरेंगे।

निशाने पे लगी है जान फिर भी,
क़दम अपने नहीं पीछे करेंगे।

मुहब्बत बस किताबों में बची है,
तेरे इस कौल को झूठा करेंगे।

ग़ज़ल कहने में यों तो मुश्किले हैं,
मगर कोशिश मुसलसल हम करेंगे।

किसी दिन ख़्वाब ये होगा मुक़म्मल,
ख़ुशी के फूल घर-घर में खिलेंगे।

सुबह की इंतजारी शाम से है,
कल उनसे हम बहाने से मिलेंगे।

अगर तुम हाथ थामे चल पड़ोगी,
नहीं हम ज़िन्दगी में फिर गिरेंगे।

ज़रा तुम छेड़ दो तो बात ही क्या?
ये नदिया, पेड़, भी बातें करेंगे।

तुम्हें देखा, खिले कुछ फूल दिल में,
जो मिलने आओ... बागीचे खिलेंगे।

तुम अपनी राह चलते जाओ प्यारे,
खड़े हर मोड़ पर हम ही मिलेंगे।

मुहब्बत का मज़ा है डूबने में,
गधे हैं क्या, जो हम इससे तरेंगे?

सुहानी शाम बन बैठो कभी तो,
सितारे माँग में उजले जड़ेंगे।

डरे हैं जब से शादी हो गई है,
वगरना, हम किसी से क्या डरेंगे??

-अंशुल तिवारी
धनतेरस/ 05.11.18/हरिद्वार।

(रंगोली: Vanshika Awasthi Tiwari)

अजीब आदमी है वो!!

अजीब आदमी है वो....
बातें भी अजीब करता है!
बेगाना, बेपरवाह,
अलमस्त अपनी दुनिया में!

कभी उसकी बातें सुनकर,
लगता है,
उसने चाँद को देखा है,
बातें करते,
सड़कों पर टहलते,
छत पे चलते,
दरीचे से झाँकते,
छज्जे से ताकते!!
वो सबसे यही कहता,
लोग मान भी लेते हैं,
उसकी बात!

अजीब आदमी है वो....
लगता है उसने,
सुनी है हवा की बोली!
वो पढ़ लेता है,
क्या लिखा है, हवा के आँचल पे,
कोई नाम, कोई पैग़ाम!
फिर, चुपके से पढ़कर,
रख लेता है अपने सन्दूक में।
और, हवा को,
छोड़ देता है,
अपनी गिरफ़्त से!!

अजीब आदमी है वो....
लगता है उसकी मुंडेर पर,
जो डिब्बे रखे हैं,
उनमें रखी है उसने,
धूप, बारिश, फ़ुहारें, बौछार,
बर्फ़, शबनम, पतझर, बहार।
सुना है, वो जब जी चाहे,
मौसमों को आज़ाद कर देता है।
खेलता है उनसे, जी भर कर।
और फिर क़ैद कर लेता है।

अजीब आदमी है वो....
लगता है, वो जानता है,
जादू-टोना भी।
सुना है,
उसने भर रखी है,
एक इठलाती, बलखाती,
गुनगुनाती, मुस्कुराती नदी,
खिड़की के पास रखे घड़े में।
वो जब चाहे उसे छेड़ता है,
बहाता है, जी भर नहाता है।

अजीब आदमी है वो....
लगता है, वो समझता है,
पंछियों की भाषा भी,
मैंने देखा है उसे,
गोरैया से बतियाते,
तितलियों संग खिलखिलाते,
पेड़ों, फूलों से गप्पें लड़ाते।

अजीब आदमी है वो....
लगता है,
उसे आती है उड़ने की कला,
वह जब चाहे, किसी बादल को,
पकड़कर, उड़ चलता है।
सुदूर, अनन्य लोकों की सैर पर!

बादलों पर उड़कर यहाँ से वहाँ,
वो देख चुका है, ये दुनिया!!
और किसी अन्वेषक की तरह,
लिख देता है जो देखा है!!
सुना है, वो सब कुछ जानता है!!

सच में,
अजीबआदमी है वो....
पर उससे अजीब ये बात है!
कि, जो दिन में इतना कुछ,
कर जाता है!
कौतूहल रच जाता है!
असंभव, अकल्पित को,
परिभाषित कर जाता है।
शाम ढलते ही न जाने,
उसे क्या हो जाता है?
आज शाम ढलते ही,
मैंने उसे देखा...
वो चुपचाप, अकेला,
एक खाट की गोद में,
थककर सो जाता है!
काग़ज़ पर कुछ लिखता-लिखता,
खो जाता है।
मुझे नहीं पता ये कौन है??
ये,
ख़ुद को कवि बतलाता है।

- अंशुल तिवारी।
हरिद्वार/ 28.11.18

Wednesday, 21 November 2018

राम(राज)नीति!!!

हे राम!
सुना है आज,
तुम्हारी प्रतिमा भव्य बनेगी।
द्रुतगति से दावानल-सा,
ये समाचार हर ओर गया है।
भू स्थापित होगी प्रतिमा,
व्योम पर होगा शीष तुम्हारा।

हे राम! सुना है ये कि,
अवध में उत्सव होगा भारी।
गूँजेगी जयकार तुम्हारी,
आनंदित होंगे नर-नारी।
एक लक्ष्य हो, शासन सारा,
कमर कस रहा, करे तैयारी।

मंचों से ये हो उठी घोषणा,
झोंकेंगे हम शक्ति सारी।

मैं भी तो खुश बहुत हूँ,
मैं हूँ भक्त तुम्हारा।
हृदय परम् उत्साही है,
मन सोच का मारा।

सोच रहा हूँ, ये जो प्रतिमा बनवाते हैं,
ज़ोर-ज़ोर से नाम तुम्हारा चिल्लाते हैं।
क्या बनने के बाद भी तुमको याद रखेंगे?
क्या विराट प्रतिमा का किञ्चित ध्यान धरेंगे?

क्या कोई देखेगा इसपर धूल जमेगी?
किसी चौक पर निपट अकेली खड़ी रहेगी??
क्या पश्चात स्थापना के भी, कोई शीष नवाएगा??
या केवल बस देख इसे, दृग झुका चला वह जाएगा?

शुष्क सुमन क्या सजे रहेंगे? मस्तक पर रघुनन्दन के,
सूखे टीके लगे रहेंगे! क्या कुमकुम के, चन्दन के??

क्या चुनाव के बाद भी कोई तथाकथित जन नेता,
इसपर पुष्प चढ़ाने या,
मानस की पंक्ति सुनाने आएगा?
क्या कोई विषभरा शीष षड्यंत्र रचयिता,
श्रद्धा से भर जाएगा??

और नीचता तजे राम की चरण शरण में आएगा?

निर्वाचन उपरांत राम को कौन पूछता आएगा?
इस विराट प्रतिमा पर बलि-बलि जाएगा??
उत्सव कुछ दिन होगा, फिर सब जन स्मृति से हट जाएगा।
नकली ये आवरण भक्ति का, बहुत जल्द फट जाएगा।

दुख है ये, जिस परमपुरुष ने इस भारत में,
मर्यादा को परिभाषा दी।
थके हुए ,बोझिल नैनों को, भटके, व्याकुल,
लोगों को फिर आशा दी।

जिसने, नरता का जग में आदर्श दिया था,
जिसने जन कल्याण हेतु ही कष्ट सहा था।
जिसने अपने चरणों से,
पाषाण हुई गौतम पत्नी को,
मुक्त किया था, शुद्ध किया था।
आज उसे ही क्षुद्र लाभ हित,
तुम पत्थर में, बांध रहे हो।
अति विराट रघुकुल भूषण को,
सीमित कद में साध रहे हो!!

जिस दिन तुम प्रतिमा बनवा कर,
मर्यादापुरुषोत्तम को पत्थर में चुनवा कर।
हिन्दू गौरव, दम्भ वेदी पर बली चढ़ाकर।
कर्मकांड से प्राण प्रतिष्ठा करवाओगे,
जग को अपनी भक्ति कदाचित दिखलोगे।
स्मरण रखो ये,
राम नहीं आएँगे, इस प्रतिमा में रहने,
राम न आएँगे किञ्चित अन्याय ये सहने।

राम न ठहरेंगे विराट इस छत्र के नीचे,
राम चले जाएँगे, अपनी आंखें मीचे।
राम चले जाएँगे, शबरी की कुटिया में,
नहीं रहेंगे इस सत्ता लोलुप दुनिया में।

अरे राम के भक्तों! अपनी आँखें खोलो,
नहीं राष्ट्र आदर्श ज़रा, सत्ता से तोलो।
सुनो राम के भक्त तभी कहलाओगे,
जब निरीह, निर्धन को गले लगाओगे।

-अंशुल।

Sunday, 18 November 2018

बन्दे की शिकायत

बन्दे ने शिकायत की, ऐ पीर! ऐ ख़ुदाया!
मैंने दुआएँ मांगी, क्या क्या नहीं लुटाया?
लेकिन जवाब उनका आख़िर तू दे न पाया,
कहता रहा कि दूँगा, ये हौसला दिलाया,
आये थे जो गए सब, मैं ही रहा बकाया,
पर आरज़ू जो थी वो, पूरी क्यूँ कर न पाया?
इतने सवाब मैंने जो कर रखे थे उनके,
बदले में मुझको तूने बस आदमी बनाया??

(सवाब: पुण्य)

-अंशुल।

Thursday, 8 November 2018

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 02

करुणा समेटे हृदय में, नयनों में अश्रु भरे हुए,
अतिदीन हो कुंतीतनय ने, ये वचन हरि से कहे।

सुनकर वचन ये वीर के, निज सखा से हरि ने कहा,
हे शूरवीर शिरोमणि! तुझको अचानक क्या हुआ??
किस मोह से पीड़ित हुआ, तू हो गया अति दीन है,
ये आचरण तेरे लिए, अति त्याज्य है, अति हीन है।

तू दीनता को त्याग दे, न कीर्तिपथ अवरुद्ध कर,
कुछ ध्यान कर सद्धर्म का, तू वीरता से युद्ध कर।
ये है नपुंसकता सखे, तुझको न शोभा दे रही,
अपना प्रबल साहस जगा, है रास्ता तेरा यही।

अर्जुन पुनः कहने लगा, हे कृष्ण! ये बतलाईए,
क्या राज लिप्सा के लिए यह कृत्य करना चाहिए?
इक भूमि के टुकड़े को पाने के लिए, केशव कहो,
गुरु, तात का वध मैं करूँ, क्या है उचित बोलो प्रभो?

इससे बहुत अच्छा है, जा कर तप करूँगा मैं कहीं,
मैं भीख लेकर खाऊंगा, कुल का करूँगा वध नहीं।**
इस तरह सबको मारकर , केशव भला क्या पाऊँगा??
जो भी मिले रण जीत कर, पर हाथ खाली जाऊँगा।

अतएव क्यों मैं तुच्छ निज हित के लिए पापी बनूँ??,
क्यों मैं सकल संसार में, निजवंश का घाती बनूँ??
हे कृष्ण! मैं अति दुःख से होकर ग्रसित, करता विनय,
निज शिष्य मुझको जानिए, ले शरण में कीजै अभय।

संजय उवाच-
राजन्!!कहे जब पार्थ ने भगवान से ऐसे वचन,
हँसते हुए कहने लगे उससे, पुनः मोहन मदन।

श्रीभगवानुवाच-
हे वीर! कैसी तू अनोखी बात करता है भला,
सुनकर जिसे उत्पन्न होता है मुझे अचरज बड़ा।
तू पंडितों-सी बात करता है सखा मेरे, मगर,
फिर मन दुखाता है स्वयं का, शोक में यूँ डूबकर।

ये लोग जिनको तू सगा अपना समझता है यहाँ,
ये सोचकर मुझको बता गत जन्म में ये थे कहाँ?
क्या तू इन्हें पहचानता भी था, तुझे क्या है पता??
इस जन्म के उपरांत, जाएँगे कहाँ मुझको बता??

ये ध्यान रख ये सब यहाँ जो हैं तुझे दिखते खड़े,
अनगिनत जन्मों से इसी संसार में उलझे पड़े।
तू भी नहीं नूतन, पुरातन जीव है तू भी सखा,
इस तत्व को ले जान, यूँ मत शोक इनका कर वृथा।

जिनको यहाँ तू देखकर, है मोह बंधन में पड़ा,
तू जानता क्या है उन्हें सत रूप में मुझको बता?
इस देह के भीतर छुपा है, भेद क्या? सुन भी ज़रा,
हाँ समझ जिसको नष्ट होगा, शोक ये सारा तेरा।

यह देह तो है यन्त्र केवल, एक जैसे म्यान है,
इसमें जो रहता जीव है, उसका न तुझको ज्ञान है।
वह तत्व जो निर्जर, अमर है, जीव-आत्मा है सखा,
शाश्वत, अलौकिक है, अजर है, जो यहाँ रहती सदा।

हाँ, दुःख-सुख का भान केवल देह को होता सदा,
पर यह अनश्वर जीव-आत्मा ,एक-सी रहती सदा।
यह जन्मती-मरती नहीं, ये न बदलती रूप है,
इस भेद तू कर गृहण, ये ज्ञान दिव्य अनूप है।

जो मर नहीं सकती कभी, क्या कोई उसका वध करे?
फिर क्यों सघन संताप लेकर, व्यर्थ तू मन में डरे??
जैसे मनुज तजकर पुराने वस्त्र, लेता है नए,
वैसे ही जीवात्मा बदलती है, पुरानी देह ये।

फिर नए वस्त्रों की तरह, यह देह नव धारण करे,
इस तथ्य को तू जान क्यों संदेह बिन कारण करे?
ना शस्त्र इसको छेदता, ना कष्ट देता है अनल,
न जल डुबोता है इसे, न सुखा सकता है अनिल।

यह तो अछेद्य, अदाह्य है, अशोष्य है, अक्लेद्य है,
मेरी समझ से भेद यह अति गूढ़ है,दुर्भेद्य है।
अव्यक्त है, ये अचिन्त्य है, है यह विकारों से परे,
जो नष्ट होता है नहीं, तू शोक उसका क्यूँ करे??

यदि जीव-आत्मा के विषय में तू नहीं कुछ जानता,
तब भी तेरा यह शोक है अनुचित, यही हूँ मानता।
यह हैं तेरे परिवारजन, पर इसी जीवन में सखा,
पिछले या अगले जन्म में, ये थे कहाँ मुझको बता??

जिसका हुआ है जन्म उसका अंत भी निश्चित समझ,
जो मर चुका, फिर जन्म लेगा, सोच में तू मत उलझ।
तू तो अलौकिक वीर है, क्यूँ हो रहा भयभीत है??
ये रास्ता तेरा नहीं, न क्षात्रकुल की रीत है!!

हर तरह से यह युद्ध तेरे धर्म के अनुकूल है,
तू त्याग करता है इसे, कितनी बड़ी यह भूल है।
यदि इस समय होकर दुखी तू छोड़ देगा रण सखा,
संसार तुझको स्मरण रख, कायर पुकारेगा सदा।

अपमान से क्या और भीषण वीर का है दुख बता?
क्यों शत्रुओं को दे रहा तू, ये अलौकिक सुख बता?
तू हो सबल धनु थाम ले, चिंता से तू क्या पाएगा?
यदि युद्ध में मर भी गया तो धाम मेरे आएगा।

सुख-दुःख को सम जानकर, रण के लिए तैयार हो,
जिससे धरा संतुष्ट हो, इसका तनिक उद्धार हो।
जो कुछ कहा मैने अभी वह ज्ञान का विस्तार है,
सुन, अब तुझे समझा रहा, क्या कर्म का आकार है।

इस गूढ़ कर्मरहस्य को, कुछ लोग ही हैं जानते,
अन्यान्य जन तो भोग को ही हैं यहाँ पहचानते।
जो स्वर्ग और अपवर्ग की लिप्सा में ही उलझे रहें,
वे कर्म के सिद्धांत की अनुशीलना कैसे करें??

जो सार है इस योग का, उसको समझना है तुझे,
अन्यत्र अवरोधों का रखकर ध्यान, बचना है तुझे।
बस है तेरा अधिकार केवल कर्म पर यह जान ले,
फल क्या मिलेगा कर्म से, इस पर तनिक मत ध्यान दे।

आसक्ति का कर त्याग, तू संबुद्ध होकर कर्म कर,
सब ओर से मन को हटा, निर्वाह अपना धर्म कर।
जो है हुआ अब तक नहीं, उसपे तेरा क्या ज़ोर है,
विधि की अलग ही चाल है, जिसका न कोई ठौर है।

तू है धनंजय, रणकुशल, है लक्ष्य भेदन में अटल,
धर धीर, मन को साध ले, कर्तव्य पथ पर हो अचल।
सुख-दुःख, लाभालाभ में, जय-पराजय में, एक हो,
मत शोक, चिन्ता, दुःख में, अपना विलक्ष विवेक खो।

अब समझ ले इस भेद को, जो तुझे बतलाता हूँ मैं,
संसार में ही मुक्ति का यह, मार्ग दिखलाता हूँ मैं।
जो कर्मफल आसक्त है, रुचिहीन निज उद्धार में,
वह तो सदा रहता फँसा, इस व्यूह-से संसार में।

जो आस में फल की हुआ हो, कर्म वो निःसार है,
यह काम योगी का नहीं, ये तो जगत व्यापार है।
जो कर्म के उपरांत करता, कर्मफल की मांग है,
छलता स्वयं को ही, स्वयं के साथ करता स्वांग है।

हाँ है उचित यह,कर्म का फल प्राप्त होना चाहिए,
पर मन न कर्ता का तनिक यूँ, आप्त होना चाहिए।
जो लालसा में है सना वह कर्म तो फलता नहीं,
ज्यों अश्व कोई काठ का ,पग एक भी चलता नहीं।

फल ही जिसे बस चाहिए, वह तो बड़ा दुर्बुद्ध है,
हर कर्म उसका हीन है, है निंदनीय, अशुद्ध है।
वह कर्मबन्धन में फँसा फिर मुक्त होता है नहीं,
पथभ्रष्ट होता, ज्ञान से फिर युक्त होता है नहीं।

जो इंद्रियों का दास बनकर कर्म करता है यहाँ,
वह मुक्ति की इस राह पर फिर पाँव धरता है कहाँ??
हे मित्र मेरे! हे परंतप! मोह तज, स्थितप्रज्ञ हो,
जिससे बने हर कर्म पावन, दिव्य जैसे यज्ञ हो।

है वीर वह, क्षत्रिय वही, मन से न माने हार जो,
संकट पड़े जो सामने, उसको करे स्वीकार जो।
तू वीरकुल भूषण है मेरे सखा, इसका ध्यान धर,
जो आ पड़े स्वीकार ले बस ईश आज्ञा मानकर।

तू वीर है! तू श्रेष्ठ है! ये अतः तेरा धर्म है,
संसार का उद्धार हो जिससे वही शुभकर्म है।
निःशंक होकर तू वरण कर इस सुअवसर का सखा,
संसार को दे त्राण का वरदान ,निज साहस जगा।

जो स्वार्थपरता से विलग होकर, निबाहे धर्म को,
वह सिद्ध योगी ही, समझ पाता जगत के मर्म को।
मत चेतना से हीन बन, निजलाभ केवल साधकर,
नर जन्म पाकर दिव्य तू, मत घोर ये अपराध कर।

मन अश्व की वल्गा पकड़, कर वश इसे हे वीरवर!
भटके यदि सद्धर्म से, ला सुपथ पर फिर खींचकर।
पशुबुद्धि का है काम बस, निजलाभ केवल साधना,
तू है प्रबुद्ध सखा ज़रा, कर सिद्ध परहित कामना।

इस कीच से जब बुद्धि तेरी मुक्ति को पा जाएगी,
यह ज्ञान की गंगा ह्रदय तेरा विमल कर जाएगी।
स्थिर बुद्धि जब धारण करेगा, मुक्ति तू भी पाएगा,
फिर लौट कर संसार के भवबन्ध में ना आएगा।
अर्जुन उवाच-

केशव बताओ थिर मति, क्या आचरण करता भला?
क्या बोलता, क्या सोचता, लक्षण कहो उसके ज़रा।
कहते किसे स्थिप्रज्ञ हैं, मुझको तनिक बतलाइए,
यह तत्व क्या है, कर कृपा मुझको तनिक समझाइए।

सुनकर विनय पृथुपुत्र की, फिर कृष्ण यों कहने लगे,
ज्यों द्रवित हो निर्झर किसी, गिरिगुहा से बहने लगे।
हे मित्र! जो निज कामना कर भस्म, करता यज्ञ है,
संसार में निष्काम कहलाता, वही स्थितप्रज्ञ है।

उद्विग्न जो दुख में नहीं ,सुख में न खोता धीर है,
निज राग, भय, को जीतता, जग में कहाता वीर है।
लेकिन बड़ी उस वीर से भी एक ऐसी शक्ति है,
करती पराजित जो उसे, उसकी छुपी आसक्ति है।

आसक्ति के आधीन होकर, बुद्धि नर खोता सदा,
पर मोल इसका अंततः होता चुकाना है बड़ा।
भ्रम में फंसा आसक्त नर, स्वाधीन रहता है नहीं,
वह दास होकर दुःख फिर क्या-क्या कहो सहता नहीं।

अतएव नर को चाहिए, वह इंद्रियों पर वश करे,
अधीन कर के इंद्रियों को, सुलभ जग में  यश करे।
अन्यथा माया में उलझकर बुद्धि तो फिर जाएगी,
सद्धर्म से तुझको हटाकर, कुपथ पर ले जाएगी।

अब मंत्र जो मैं दे रहा हूँ ,मित्र उसको जानकर,
तू स्वयं हो जा सजग, विषयों का तनिक मत ध्यानकर।
यदि विषय का चिंतन करेगा, मोह में फंस जाएगा,
आसक्ति का तब नाग तेरे चित्त को डस जाएगा।

फिर कामना का विष हृदय में जन्म तेरे पाएगा,
जो समय के फिर साथ ,बनकर क्रोध आगे आएगा।
ये सत्य है जब कामना निज लक्ष्य से है चूकती,
बनकर अनल वह क्रोध की, नर का हृदय है फूँकती।

इस तीव्रतम क्रोधाग्नि से, सद्बुद्धि होती भ्रष्ट है,
खोकर स्वयं की बुद्धि को होता मनुज पथभ्रष्ट है।
पथभृष्ट होकर अंततः वह, प्राप्त होता नाश को,
आसक्ति के फलरूप वो, होता सुलभ यमपाश को।

बस इसलिए हे वीरवर, हूँ मैं तुझे समझा रहा,
कर्तव्य तेरे योग्य क्या? इतना तुझे बतला रहा।
निज बुद्धि के इस दीप को, भ्रम की हवाओं से बचा,
कर ध्यान निज सामर्थ्य का, स्थितप्रज्ञ तू हो जा ज़रा।

तुझको प्रभावित भाव कोई भी न जब कर पाएगा,
एकाग्र होकर चित्त तेरा, शक्ति अद्भुत पाएगा।
एकाग्रता से शक्ति पा कर, योग जैसे कर्म कर,
चिंता हृदय से त्याग से, होकर अटल स्व-धर्म पर।

।।द्वितीयोध्याय सम्पूर्ण।।